तमाम प्रतिक्रियाएं इस वाल पर आईं। इसीलिए मैंने इस वाल को पुन शेयर किया है। किसी विशाष दत्त ने लिखा कि आपने इस वाल पर यशवंत व्यास और अजय उपाध्याय का जिक्र क्यों नहीं किया क्या आप उन्हें पत्रकार नहीं मानते हैं। हालांकि बाद में पता नहीं क्यों उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया डीलिट कर दी। मैंने इस वाल में उन्हीं लोगों का जिक्र किया है जिन्होंने सन् २००० के बाद के दशक में हिंदी अखबारों को टीवी के मुकाबले मजबूती से खड़ा किया।
जहां तक शशि शेखर की बात है उनका कद बड़ा है। न्यूज की उन्हें समझ है। अखबार निकालना उन्हें आता है लेकिन उन्होंने अपने जिन सहयोगियों को संपादक के पद से नवाजा उनमें से ज्यादातर इसके लायक नहीं थे। अभी कुछ ही दिनों पहले उनके एक संपादक पर एक स्ट्रिंगर ने साढ़े पांच लाख रुपये लेकर वापस नहीं करने का आरोप लगाया है। यही नहीं जब उसने पैसे मांगे तो उसे हटा दिया। भड़ास फॉर मीडिया ने उन संपादक के बारे में उस स्ट्रिंगर संदीप नागर (मेरठ की तहसील मवाना के ब्यूरो चीफ) का पत्र और संपादक को भेजी गई लीगल नोटिस भी छापी थी। संदीप नागर एक अच्छे और समर्पित पत्रकार हैं। वे बहसूमा के उस गूजर राजवंश से हैं जिनका आजादी की लड़ाई में विशेष योगदान रहा है। पूरा मवाना क्षेत्र उनका सम्मान करता है और न्यूज की समझ भी उनमें अच्छी है।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के एफबी वॉल से साभार.






