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संघ के इशारे पर दिसंबर तक फैसला लेगी भाजपा

जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और भाजपा के बीच नरेंद्र मोदी के बहाने अब राजनीतिक अहम का टकराव शुरू हो गया है। जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश ने नरेंद्र मोदी की जमकर खबर ली थी। उन्होंने गुजरात के विकास मॉडल पर भी तमाम तीखे कटाक्ष कर डाले। इसी के साथ भाजपा नेतृत्व को मोदी के मुद्दे पर उन्होंने सीधे तौर पर खबरदार कर दिया था। साफ-साफ कहा था कि ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए कोई धर्म-निरपेक्ष चेहरा ही स्वीकार्य हो सकता है। यदि भाजपा ने बात नहीं मानी, तो उनकी पार्टी अपना रास्ता अलग करने के लिए स्वतंत्र होगी। जदयू के इन कड़े तेवरों से संघ का नेतृत्व काफी कुपित हो गया है। संघ के आकाओं का संकेत समझकर भाजपा की एक मजबूत लॉबी ने कड़ा रुख अपना लिया है।

जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और भाजपा के बीच नरेंद्र मोदी के बहाने अब राजनीतिक अहम का टकराव शुरू हो गया है। जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश ने नरेंद्र मोदी की जमकर खबर ली थी। उन्होंने गुजरात के विकास मॉडल पर भी तमाम तीखे कटाक्ष कर डाले। इसी के साथ भाजपा नेतृत्व को मोदी के मुद्दे पर उन्होंने सीधे तौर पर खबरदार कर दिया था। साफ-साफ कहा था कि ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए कोई धर्म-निरपेक्ष चेहरा ही स्वीकार्य हो सकता है। यदि भाजपा ने बात नहीं मानी, तो उनकी पार्टी अपना रास्ता अलग करने के लिए स्वतंत्र होगी। जदयू के इन कड़े तेवरों से संघ का नेतृत्व काफी कुपित हो गया है। संघ के आकाओं का संकेत समझकर भाजपा की एक मजबूत लॉबी ने कड़ा रुख अपना लिया है।

इससे भाजपा और जदयू के रिश्तों में गहरी दरार पड़ने के संकेत हैं। भाजपा की मोदी समर्थक लॉबी ने दबाव बनाया कि पार्टी, मोदी के मुद्दे पर नीतीश एंड कंपनी को लगातार मुंह तोड़ जवाब दे। ताकि, यह संदेश जाए कि इस मुद्दे पर पार्टी जदयू के दबाव में नहीं आने जा रही है। शनिवार और रविवार को जदयू कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक यहां हुई थी। नीतीश ने अपने भाषण में बगैर नाम लिए हुए मोदी को जमकर कोसा था। उन्होंने गुजरात के विकास मॉडल के मुकाबले अपने बिहार के विकास की तमाम तरफदारी की। यह बताने की कोशिश कर डाली कि बदहाल राज्य को उन्होंने जिस तरह से उबारा है, वह वाकई में एक मिशाल है। उनके राज्य में सभी तबकों को खुशहाली मिली है। जबकि, कई राज्यों में विकास की गंगा में आम आदमी की भागीदारी नहीं हो पाई।
    
जदयू नेतृत्व ने इस साल दिसंबर तक की मोहलत भाजपा नेतृत्व को दी है। कह दिया है कि इस अवधि तक भाजपा ‘पीएम इन वेटिंग’ का ऐलान जरूर कर दे। हालांकि, चर्चा यही रही कि भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह और पार्टी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली के  तमाम प्रयासों के बाद ही जदयू ने आठ महीनों का समय देना गंवारा किया है। लेकिन, भाजपा नेतृत्व नीतीश की इस ‘उदारता’ से कतई संतुष्ट नहीं है। नीतीश सरकार में पशु-पालन मंत्री एवं बिहार भाजपा के चर्चित नेता गिरीराज सिंह कहते हैं कि जदयू सही ढंग से गठबंधन धर्म नहीं निभा रहा है। सबसे लोकप्रिय नेता मोदी के खिलाफ जदयू के लोग जिस तरह से प्रलाप कर रहे हैं, यह अब असहनीय हो रहा है। उन लोगों ने अपनी भावनाएं सोमवार को पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को बता दी हैं। अच्छी बात यही है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी जदयू के रवैए से काफी आहत है।
 
भाजपा प्रवक्ताओं ने जदयू के खिलाफ आक्रामक तेवरों का सिलसिला और तेज कर दिया है। पार्टी प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने सवाल खड़ा किया था कि गोधरा कांड के दौर में रेलमंत्री का प्रभार नीतीश कुमार संभाल रहे थे। उनकी नाकामी को लेकर भी तो सवाल बनते हैं। इस पर नीतीश कभी कोई जवाब क्यों नहीं देते? भाजपा प्रवक्ता के इस तेवर से दोनों दलों के बीच तकरार बढ़ी है। नीतीश कुमार ने इसका जवाब यही दिया है कि रेलमंत्री की भूमिका रेलवे की सुरक्षा तक होती है। बाकि, कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों की होती है। भाजपा नेताओं को इतनी बुनियादी समझ तो जरूर होनी चाहिए।
    
मीनाक्षी लेखी के पहले भाजपा की दूसरी प्रवक्ता निर्मला सीता रमण ने रविवार को ही जदयू की जमकर खबर ली थी। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि नीतीश सहित उनकी पार्टी के तमाम नेता अपनी ऊर्जा भाजपा के मुख्यमंत्रियों की विवेचना में लगा रहे हैं। जबकि, उन्हें अपनी यह राजनीतिक ऊर्जा यूपीए सरकार के कुशासन पर लगानी चाहिए। यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। गठबंधन धर्म के भी खिलाफ है। भाजपा यह बर्दाश्त नहीं कर सकती कि कोई दूसरा दल उन्हें ‘पाठ’ पढ़ाने की कोशिश करे। क्योंकि, उनके यहां मोदी जी सहित सभी नेता धर्म-निरपेक्ष हैं।

जदयू के चर्चित नेता एवं बिहार सरकार के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह ने पूछा है कि उनके नेताओं ने आखिर क्या राजनीतिक गुनाह कर दिया है? जो कि भाजपा के तमाम प्रवक्ता अपने गुस्से को काबू में नहीं कर पा रहे? आखिर पार्टी के मंच से अपना   सैद्धांतिक नजरिया साफ-साफ बताना क्या कोई गुनाह हो गया है? नरेंद्र सिंह का दावा है कि उनकी पार्टी धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत से किसी कीमत पर समझौता नहीं कर सकती। उन लोगों को सत्ता की भी ज्यादा परवाह नहीं है।

जदयू प्रवक्ता शिवानंद तिवारी इस बात पर हैरानी जताते हैं कि भाजपा के लोग मोदी के संदर्भ में उनकी पार्टी के नजरिए से इतना क्यों परेशान हो गए हैं? जबकि, उन लोगों का यह कोई नया नजरिया नहीं है। हम लोग महीनों से अगाह कर रहे हैं कि विवादित छवि वाले नेता को हम प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार स्वीकार नहीं कर सकते। बताइए, इसमें गठबंधन धर्म का कहां गला दबा दिया गया? सिद्धांतों की राजनीति करना कोई गुनाह तो नहीं है? हमारे लोगों ने कभी नहीं कहा कि हम एनडीए से दूर होना चाहते हैं। हमने एक राजनीतिक लाइन ले ली है, तो ले ली है।

सूत्रों के अनुसार, पार्टी नेतृत्व ने यह समझ लिया है कि भाजपा के नेता जो आक्रामक तेवर अपनाए हैं, इसके पीछे सोची-समझी रणनीति है। जदयू के एक वरिष्ठ सांसद अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं कि संघ के आकाओं के इशारे पर इस मुद्दे को तूल दिया जा रहा है। जबकि, जदयू नेतृत्व ने कई बार भाजपा के शीर्ष नेताओं को बता दिया है कि यदि वे लोग लालकृष्ण आडवाणी जैसे किसी समझदार नेता के नाम पर सहमति बनाते हैं, तो उनकी पार्टी को कोई ऐतराज नहीं होगा।
 
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौर में नीतीश कुमार ने यह साफ कर दिया था कि कहीं से इस मुगालते में नहीं हैं कि वे भी इतनी कम ताकत से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन सकते हैं। ऐसे में, इस आशय की तमाम कयासबाजी का कोई मतलब नहीं है। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव कह चुके हैं कि एनडीए में सबसे बड़ा घटक भाजपा है। ऐसे में, इसी पार्टी से ‘पीएम इन वेटिंग’ का चेहरा आएगा। गुजरात के दंगों में विवादित हो चुके मोदी के बारे में पार्टी ने बहुत पहले अपनी राय बता दी थी। इतना जरूर है कि धर्म-निरपेक्षता के मुद्दे पर हम समझौता नहीं करने वाले। हालांकि, आखिरी दम तक हमारी कोशिश होगी कि यूपीए की भ्रष्ट सरकार को उखाड़ फेंकने का काम एनडीए ही करे।

जदयू के प्रधान महासचिव के सी त्यागी कहते हैं कि इस तरह के कयासों में कोई दम नहीं है कि हमारी कोई राजनीतिक समझदारी कांग्रेस से बन रही है। हम लोग तो भ्रष्टाचारी सरकार को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। अच्छा यही रहेगा कि भाजपा के लोग समझदारी से काम लें। जदयू ने प्राकांतर से आडवाणी का नाम आगे बढ़ाने की पहल की है। शरद और नीतीश दोनों ने कह दिया है कि यदि 2009 की तरह इस बार भी उन्हें ‘पीएम इन वेटिंग’ बनाया जाए, तो एनडीए की एकता और मजबूत हो सकती है। ऐसा होने पर कई और घटक उपयुक्त समय पर एनडीए से जुड़ सकते हैं।

भाजपा के अंदर भी मोदी मुद्दा गरम हो जाने से एक बार फिर आडवाणी का नाम नए सिरे से चर्चा में आ गया है। भाजपा की एक लॉबी ने जदयू के तेवरों के बहाने आडवाणी के लिए जोरदार लॉबिंग शुरू कर दी है। सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि इस पहल में वे लोग भी शामिल हो गए हैं, जो कि कल तक मोदी के पैरवीकार बने घूम रहे थे। ऐसे नेताओं में यशवंत सिन्हा का नाम भी जुड़ गया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने यह कहकर पार्टी के अंदर बहस छेड़ दी है कि यदि आडवाणी नेतृत्व के लिए तैयार हों, तो उनका नाम आगे करने में क्या दिक्कत है? क्योंकि, अनुभव व राजनीतिक कद आदि के मामलों में आडवाणी पूरे देश में बेजोड़ हैं। पार्टी को इस मामले में नए सिरे से जरूर विचार करना चाहिए।

सूत्रों के अनुसार, इस दौर में आडवाणी की पैरोकारी के लिए जिस तरह से पार्टी में हलचल तेज हो गई है, उससे संघ के कई बड़े नेताओं के कान खड़े हो गए हैं। उल्लेखनीय है कि 2009 का लोकसभा चुनाव एनडीए ने आडवाणी के नेतृत्व में लड़ा था। वही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी थे। लेकिन, इस चुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा था। संघ के कुछ नेताओं को आशंका हो रही है कि कहीं नीतीश के तेवरों के पीछे आडवाणी लॉबी की कोई ‘हिडेन’ भूमिका न हो। सूत्रों का दावा है कि संघ के एक कद्दावार नेता ने इशारा कर दिया है कि मोदी विरोधी अभियान तेज करने वालों की खबर ले ली जाए। चाहे भले जदयू से रिश्ता तुरंत टूट जाए। जदयू ने भी भाजपा के तेवर देखकर बिहार में अपने बूते पर चुनाव लड़ने की तैयारियां शुरू कराने का मन बनाया है।

यदि बात आगे निकली, तो राज्य में जदयू अपने बूते पर सरकार चलाने को भी तैयार है। उल्लेखनीय है कि बिहार के 243 विधानसभा सीटों में 115 पर जदयू की जीत हुई थी। जबकि भाजपा 91 सीटों पर जीती थी। इस तरह से जदयू साधारण बहुमत से महज सात सीट पीछे है। इस कमी का राजनीकि जुगाड़ पार्टी अच्छी तरह से कर सकती है। उसे लगता है कि धर्म-निरपेक्षता के सवाल पर भाजपा से नाता तोड़ा गया, तो पार्टी हर तरह से राजनीतिक फायदे में रहेगी। रणनीतिकार यह आकलन करने में लगे हैं कि आर-पार का फैसला कब लेना ज्यादा फायदे का सौदा होगा?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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