गुजरात की सरकार, गुजरात के दंगे और गुजरात के नरेंद्र मोदी, तीनों जिस तरह से खबरों को बुन रहे हैं, खबरों को में बन रहे हैं और खबर बनवा रहे हैं, उससे लगता है कि हमारे देश में आने वाले अनेक सालों तक गुजरात का महत्व बना रहेगा। राजनीतिक रूप से गुजरात को कोई आज तो कम से कम एक तरफ पटक नहीं सकता। सामाजिक रूप से भी गुजरात की जब जब बात होती है, तो वहां के बारे में बहुत सारे लोग अच्छा भी बोलता है तो, खराब कहने वालों की भी कोई कमी नहीं है, पर उनकी बात में तथ्य कम और बकवास ज्यादा होती है।
रही बात व्यावहारिक कारणों की, तो इस हिसाब से भी गुजरात हमेशा चर्चा में रहा है, रह रहा है और रहेगा। लेकिन इंदिरा गांधी की मौत के बाद जिस तरह से कांग्रेस के राज में दिल्ली में सिखों पर कत्ले आम करने के बाद भी कांग्रेस सती सावित्री बनी हुई है, वह उसकी राजनीतिक चालाकियों और कूटनीतिक नालायकियों की कहानी का हिस्सा है। लेकिन फिर भी कांग्रेस गुजरात के दंगों को रह रह कर देश भर में सबसे बड़ा बताकर मोदी और उनके राज को ठिकाने लगाने की आस पाले हुए हैं। जो आसानी से पूरी होती नहीं दिखती।
वैसे, अपना मानना है कि जब तक हमारे देश में मुसलमानों के तुष्टिकरण की राजनीति करने की आदत जिंदा रहेगी, जब तक गुजरात का महत्व बना रहेगा। यही वजह है कि राजनीति अब कुछ और तेजी होगी। बहस भी होगी। गुजरात दंगों में दोषी पूर्व मंत्री माया बेन और बाबू बजरंगी को मौत की सज़ा दिए जाने की मांग को लेकर राज्य सरकार अगले 15 दिनों में अदालत में अपील दायर करने के सरकार के कदम के पीछे के कारणों पर राजनीतिक बहस तेज़ होगी। माया बेन के पति डॉक्टर सुरेंद्र कोडनानी ने सरकार के इस कदम पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है।
अदालत के अनुसार ये मामला उस रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर कैटगरी में आता है और इस तरह के मामलों में मौत की सज़ा दी जा सकती है। लेकिन इन दोनों को मौत की सज़ा नहीं दी गई। इसलिए हमने सरकार से कहा था कि हमें मौत की सज़ा के लिए हाई कोर्ट में अपील दायर करनी चाहिए। गुजरात सरकार के कानून मंत्रालय ने इस बात की मंज़ूरी दे दी। मामले में एक विशेष अदालत ने माया कोडनानी को 28 वर्ष की कैद की सजा सुनाई थी, जबकि बाबू बजरंगी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
वाकया 28 फरवरी 2002 का है जब नरोड़ा पाटिया इलाके को घेर कर 97 लोगों की हत्या कर दी गई थी। आरोप है कि भीड़ का नेतृत्व कोडनानी ने किया था और बाबू बजरंगी भी उसमें शामिल थे। संजीव भट्ट जैसे सपसेंडेड़ आईपीएस अफसर कह रहे हैं कि मोदी विरोधी इसे दोनों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। और ऐसे वक्त में जब नरेंद्र मोदी खुद को बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर प्रस्तुत करने की मुहिम पर हैं, कोडनानी और बाबू बजरंगी को मौत की सज़ा दिए जाने की वकालत करने के कदम पर सवाल उठना लाज़मी है।
बीजेपी नहीं मानती कि मोदी की छवि सुधारने के लिए गुजरात सरकार इन दोनों की मौत की सजा मांग रही है। पर, सवाल यह है कि ऐसा है भी तो क्या इससे मोदी की छवि सेकूलर हो जाएगी। और एक बात यह भी कि माया कोडनानी और बाबू बजरंगी की बलि चढ़ाकर मोदी पर फिर कौन हिंदू भरोसा करेगा ? गुजरात सरकार अगर सचमुच 15 दिन के भीतर माया बेन और बाबू बजरंगी के लिए मौत मांगती ही है, तो फिर मोदी से बड़ा खलनायक और कोई नहीं होगा। मामला कुछ और है जो साफ दिखता नहीं है। वक्त आएगा, पिक्चर तभी क्लीयर होगी। देखते रहिए, क्या होता है।
लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.





