शशि शेखर के बार में लिखा गया यह आलेख क्या उन्हीं शंभूनाथ शुक्ला का है जो अमर उजाला में शशि शेखर के साथ हुआ करते थे। यदि हां, तो यह खबर चौंकाने वाली है क्योंकि शंभूनाथ शुक्ला को करीब से जानने वालों की यदि मानें तो अमर उजाला में वे शशि शेखर के खास आदमी के तौर पर जाने जाते थे। अमर उजाला में बतौर संपादक शशि शेखर का तो सिर्फ नाम चलता था। बाकी सभी फैसले तो शंभूनाथ शुक्ला ही लिया करते थे।
एक बात समझ से पर है कि इस देश में पद से हटने या फिर रिटायर होने के बाद ही व्यवस्था के खिलाफ मुंह क्यों खुलता है। पुलिस, पत्रकार व ब्यूरोक्रेटस सभी व्यवस्था या व्यक्ति को तभी कोसते हैं जब उनके बच्चे सेल हो जाते हैं या फिर वे नौकरी कर मकान-दुकान (संपत्ति) बना लेते हैं। शंभूनाथजी ने लिखा है कि शशिशेखर ने सदैव छुटभैये व कमजोर व लेखन व विचार में शून्य पत्रकारों को ही संपादक बनाया। इसमें आश्चर्य क्या है। जो जिस सोच का होता है वह वैसे ही व्यक्ति को अपने साथ लेकर चलता है। यह तो निर्विवाद सत्य है।
शशिशेखर स्वंय क्या है? बाजार उन्हें भी छुटभैया व विचारशून्य पत्रकार ही मानता है। ऐसा उनकी बातों से लगता है। एक-दो बार मैंने भी उन्हें सुना है। विचार शून्यता साफ झलकती है। शशि शेखर के बैकग्राउंड व कार्यशैली पर एक नजर डालिए। समझ में आ जाएगा कि वे छुटभैये हैं या नहीं। छोटे शहर के रहने वाले हैं। कांख के नीचे बोरिया-चट्टी दबा कर जाने वाले स्कूल के प्रोडक्ट हैं। हिंदुस्तान में आने से पहले वे कभी किसी बड़े शहर (आजतक के कुछ दिनों को छोड़ कर) में नहीं रहे। हिंदुस्तान से पहले राष्ट्रीय स्तर के किसी समाचारपत्र में कभी काम नहीं किया। अंग्रेजी में हाथ तंग है। बातचीत में लोगों को जलील करने में उन्हें बेहद सुख मिलता है। जवानी में कमर में रिवाल्वर खोंस कर चलते थे। अच्छे पत्रकारों के बीच आज तक उठते-बैठते वे नहीं पाए गए। काबिल व जानकार पत्रकारों को वे अपने पास फटकने तक नहीं देते हैं।
शशि शेखर सदैव वैसे लोगों तो नौकरी देते हैं जो लिखने, पढ़ने, सोचने और बोलने में कमजोर हों। कोई उनसे तर्क-वितर्क करे, यह उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं। सिर्फ जी हजूरी करने वाले पसंद हैं। इसलिए उनके आसपास या उनकी बनाई टीम में ऐसे ही लोग टिक पाते हैं जो अपनी ऐसी की तैसी कराने की हिम्मत रखते हों। शशि शेखर के साथ कभी भी अच्छा पत्रकार काम करने को राजी नहीं हुआ। यकीन नहीं आता तो हिंदुस्तान अखबार की मौजूदा टीम पर नजर डालिए।
हिंदुस्तान जैसे पुराने व राष्ट्रीय स्वरूप के समाचारपत्र के ब्यूरो में आज एक भी ढंग का जर्नलिस्ट नहीं है। लोकल रिपोर्टिंग में भी ऐसे-ऐसे रिपोर्टर हैं जिनमें से अधिकांश को दिल्ली के इतिहास, भूगोल आदि की कोई जानकारी नहीं है। समाचारपत्र का स्वरूप राष्ट्रीय से क्षेत्रीय हो गया है। हिंदुस्तान ही है जो शशि शेखर जैसे लोगों को झेल सकता है। मृणाल पांडे के समय हिंदुस्तान के तेवर-कलेवर जो थे आज उसका 25 प्रतिशत भी नहीं है।
जहां तक अखबार चलाने की बात है तो आज के जमाने में उसमें संपादक की कोई भूमिका नहीं होती है। संपादक संता हो बंता, चलता अखबार चलेगा। यदि संपादक अखबार चला देता तो नई दुनिया, नेशनल दुनिया को चलना चाहिए था। इन दोनों अखबारों की कमान तो लंबे समय तक आलोक मेहता जैसे नामी गिरामी संपादक के हाथ में थी। फिर अखबार क्यों नहीं चला? दरअसल अखबार एक टीम वर्क है। टीम यानि संपादकीय, मार्केटिंग, सर्कुलेशन, विज्ञापन मजबूत होंगे और इन सब में अंडरस्टैडिंग होगी तो वह अखबार चलेगा।
आम पाठक को तो पता भी नहीं होता कि अमुक अखबार का संपादक कौन है? जिस लाला को यह बात समझ में आ गई है वह अखबार का खुद ही संपादक बन गया है। उसे पता है कि अखबार संपादक के नाम से नहीं बल्कि बेचने के तरीके से चलता है। आज कैसे-कैसे लोग अखबारों के संपादक बने बैठे हैं, यह कहानी फिर कभी..।
(इस आलेख को लिखने का मकसद किसी को निजी तौर पर नीचा दिखाना नहीं बल्कि सच को सामने लाना है)
संदीप ठाकुर
वरिष्ठ पत्रकार
दिल्ली
मूल आर्टिकल-
शशि शेखर ने छुटभैये और विचार शून्य लोगों को संपादक बना दिया : शंभूनाथ शुक्ला






