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लखनऊ

कई एकड़ में बनी कलक्टर और एसपी की कोठियां देश की जनता के साथ मजाक

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में कई सरकारी अधिकारियों के आवास के चारों तरफ एकड़ों में फैले विशाल हातों को समाप्त किये जाने हेतु मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश को प्रत्यावेदन भेजा है. प्रत्यावेदन में कहा गया है कि प्रदेश में कई प्रशासनिक अधिकारियों के आवास के चारों ओर एकड़ों में फैले बहुत बड़े-बड़े हाते हैं जिनकी अब ना तो आवश्यकता रह गयी है, ना अब जिन्हें दिया जाना उचित है.

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में कई सरकारी अधिकारियों के आवास के चारों तरफ एकड़ों में फैले विशाल हातों को समाप्त किये जाने हेतु मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश को प्रत्यावेदन भेजा है. प्रत्यावेदन में कहा गया है कि प्रदेश में कई प्रशासनिक अधिकारियों के आवास के चारों ओर एकड़ों में फैले बहुत बड़े-बड़े हाते हैं जिनकी अब ना तो आवश्यकता रह गयी है, ना अब जिन्हें दिया जाना उचित है.

इनमें विशेषकर डीएम, एसपी, कमिश्नर, आईजी, डीआईजी तथा अन्य पीसीएस और पीपीएस अधिकारियों के आवास हैं. ठाकुर के अनुसार ये तमाम पद ब्रिटिश राज की रचना हैं और उस समय ब्रिटिश हुकूमत के प्रतीक के रूप में रहते थे. आज के समय देश की आबादी बहुत बढ़ गयी है, जमीन बहुत कम हो गयी है और सरकारी जमीन की भी बहुत दिक्कत है.

इन स्थितियों में इस तरह के कई-कई एकड़ों में बनी कलक्टर और एसपी की कोठियां देश की जनता के साथ पूरी तरह एक मजाक है, जिनमे भारी सरकारी अमले का प्रयोग हो रहा है. ठाकुर ने अनुरोध किया है कि इसके लिए अध्यक्ष, राजस्व परिषद, प्रमुख सचिव राजस्व, प्रमुख सचिव, आवास एवं अन्य जिम्मेदार अधिकारों की एक कमिटी बना कर पुनरीक्षा कराई जाए और इन हातों से बिना जरूरत का हिस्सा अलग कर उसका अन्य आवश्यक उपयोग किया जाए.

 
प्रत्यावेदन की प्रति-

सेवा में,
मुख्य सचिव,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ
विषय- आवश्यकता से बहुत बड़े सरकारी आवासों के प्रयोग विषयक  
महोदय,

कृपया निवेदन है कि मैं डॉ नूतन ठाकुर पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के क्षेत्र में कार्य करने वाली लखनऊ स्थित एक सामजिक कार्यकर्त्री हूँ. मैं आपके समक्ष उत्तर प्रदेश प्रशासन से सम्बंधित एक बहुत ही गंभीर प्रकरण प्रस्तुत कर रही हूँ.

आप जानते होंगे कि उत्तर प्रदेश शासन के अंतर्गत पूरे प्रदेश में बहुत से प्रशासनिक पदों पर अधिकारियों को इस प्रकार के बहुत बड़े-बड़े शासकीय आवास मिले हुए हैं जिनकी अब ना तो आवश्यकता रह गयी है, ना अब जिन्हें दिया जाना उचित है. इनमे विशेषकर जिला मैजिस्ट्रेट, अपर जिला मैजिस्ट्रेट, जिला पुलिस अधीक्षक/वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, अपर पुलिस अधीक्षक, उप-जिलाधिकारी, तहसीलदार, पुलिस उपाधीक्षक, पुलिस उपमहानिरीक्षक, पुलिस महानिरीक्षक, मंडलायुक्त, जिला जज और इस प्रकार के पारंपरिक पद हैं. हम सभी अवगत हैं कि इनमे तमाम पद ब्रिटिश राज की रचना हैं और उस समय ब्रिटिश हुकूमत के प्रतीक के रूप में रहते थे. स्वाधीनता के बाद भी इनमे तमाम पद बरकरार रखे गए हैं लेकिन इस बात में कोई शंका नहीं रह गयी है कि ये लोग अब हुकूमत नहीं जनता के सेवक हैं- लोक सेवक हैं.

ऐसे में जब देश में ब्रिटिश हुकूमत के गए साठ साल हो गए हैं और पूरी तरह प्रजातंत्र आ गया है, इस तरह के कई-कई एकड़ों में बनी कलक्टर और एसपी की कोठियां देश की जनता के साथ पूरी तरह एक मजाक है. देश में किस तरह आबादी बढ़ रही है, किस तरह जमीन कम हो रहे हैं, किस तरह लोग सकड़ों पर रहने को मज्नूर हो रहे हैं यह सब किसी भी ब्यक्ति से नहीं छिपा है.

आज जब एक आम आदमी को बित्ते भर जमीन के लिए तडपना पर रहा है यदि एक सरकारी अफसर को बीघों और एकड़ों में बना घर दिया जाएगा तो यह देश की गरीब, बेघर जनता के साथ गन्दा और घटिया मजाक होगा, उनके जले पर नमक छिडकने के बराबर होगा.

यह ठीक है कि ये अधिकारी जिम्मेदार और प्रतिष्ठित अधिकारी होते हैं और इन्हें सरकार यदि रहने के लिए अच्छे घर देती है तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं है. पर अव बदले समय में इन्हें आकडों और वीघों में, खेती करने के लिए तो घर नहीं दिया जा सकता है, खासकर हमारे जैसे प्रजातंत्र में. इतने बड़े बंगले और इतने लंबे-चौड़े जमीन के कई सारे अन्य नुक्सान भी हैं जिनमे काफी सारे सरकारी अमले का इसमें प्रयोग सम्मिलित है.

अतः एक तो आज के बदल चुके समय में, जब बहुत कम खाली जमीनें बची हैं और सरकारी जमीनों की भी भारी मारा-मारी रहती है, यदि इस प्रकार के एकड़ों में बने आवासों से आवश्कयता से इतर भूमि अलग कर उनका शासकीय कार्यों में उपयोग किया जाएगा तो इसका निश्चित रूप से हर प्रकार से सम्यक लाभ मिलेगा.

इस बात के दृष्टिगत मैं आपसे यह अनुरोध करती हूँ कि कृपया तत्काल चेयरमैं, रेवेब्यु बोर्ड तथा/अथवा प्रमुख सचिव राजस्व, प्रमुख सचिव, आवास एवं अन्य जिम्मेदार अधिकारों की एक कमिटी बना कर इस विषय में पुनरीक्षा कराने का कष्ट करें कि किस जिले में वर्तमान में किस अधिकारी को कितना बड़ा घर/हाता/कम्पाउंड दिया गया है और उसमे से कितना हिस्सा अलग किया जाना उचित होगा ताकि उस अलग किये गए भूमि का कोई अन्य समुचित आवश्यक उपयोग किया जा सकें.  

उपरोक्त के दृष्टिगत मैं आपसे निवेदन करती हूँ कि तत्काल इस स्थिति को रोके जाने तथा इस व्यर्थ पड़े कई-कई एकड़ सरकारी भूमि के वाजिब और उचित उपयोग किये जाने हेतु आवश्यक कार्यवाही करें.

पत्र संख्या- NT/House/CS/04                                      
दिनांक-18/04/2013
भवदीय,
(डॉ नूतन ठाकुर )
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ

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