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सपाई न हों नाराज इसलिए जारी हुई सवा दो लाइन की प्रेस रिलीज!

: सूचना विभाग को समाप्त कर देना चाहिए : सूचना विभाग को समाप्त कर अधिकारियों-कर्मचारियों का अन्य विभागों में समायोजन करने का समय आ गया है। इस विभाग के होने से देश और समाज को कोई लाभ नहीं है, इसलिए समाप्त होने से कोई हानि भी नहीं होगी। इस विभाग पर सालाना अरबों रुपया बेवजह बर्बाद हो रहा है, उस रुपए से तमाम जरूरी कार्य किए जा सकते हैं, साथ ही अन्य विभाग अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं। समायोजन से उनकी भी हालत सुधर जाएगी।

: सूचना विभाग को समाप्त कर देना चाहिए : सूचना विभाग को समाप्त कर अधिकारियों-कर्मचारियों का अन्य विभागों में समायोजन करने का समय आ गया है। इस विभाग के होने से देश और समाज को कोई लाभ नहीं है, इसलिए समाप्त होने से कोई हानि भी नहीं होगी। इस विभाग पर सालाना अरबों रुपया बेवजह बर्बाद हो रहा है, उस रुपए से तमाम जरूरी कार्य किए जा सकते हैं, साथ ही अन्य विभाग अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं। समायोजन से उनकी भी हालत सुधर जाएगी।

वर्तमान में जिला मुख्यालयों पर स्थापित सूचना कार्यालयों का एक मात्र प्रमुख कार्य पत्र-पत्रिकाओं का रजिस्ट्रेशन कराना भर है, जो कलेक्ट्रेट का कोई भी एक बाबू करा सकता है, उसके लिए एक अलग विभाग की कोई आवश्यकता नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लेकर प्रदेश के समस्त जनपदों में फर्जी पत्रकारों की बाढ़ आई हुई है, इसके अलावा सैकड़ों अखबार सिर्फ कागजों में ही प्रकाशित हो रहे हैं और जो प्रकाशित हो रहे हैं, उनका स्तर बेहद घटिया है, पर सूचना विभाग कुछ नहीं कर सकता, फिर इस विभाग की जरूरत ही क्या है?

सूचना विभाग द्वारा अंबेडकर जयंती पर जारी प्रेस रिलीज

सूचना विभाग का फिलहाल एकमात्र कार्य सत्ताधारी दल की चमचागीरी करना ही है। बदायूं जनपद का उदाहरण देता हूँ। पिछले दिनों यहाँ आजम खां आए थे, उस कार्यक्रम में सहायक सूचना निदेशक इकबाल अहमद मसूदी खुद फोटो खींचते देखे गए। सभी पत्रकारों से व्यक्तिगत तौर पर मिल कर बेहतरीन कवरेज करने का आग्रह करते नज़र आए, लेकिन अभी दो दिन पहले भीमराव अंबेडकर की जयंती का प्रेस नोट तीन लाइन का ही जारी किया, जबकि शहर भर में तमाम बड़े सरकारी कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, जिनका उल्लेख तक नहीं किया। प्रेस नोट बनाने वाले बाबू का कहना है कि उसने दो पेज का प्रेस नोट बनाया था, पर मसूदी ने यह कह कर फाड़ दिया कि सपाइयों से दुश्मनी कराओगे।

इसके अलावा सूचना विभाग में लाखों रुपया प्रचार-प्रसार के लिए है। हजारों रुपए पत्रकारों के साथ बैठक आयोजित कराने के लिए आता है, जो फर्जी बिलों की भेंट चढ़ जाता है। लखनऊ मुख्यालय से सरकारी गुणगान की किताबें जारी होती हैं, वह भी जिला मुख्यालयों पर आकार रद्दी बन जाती हैं, पर कोई देखने-सुनने वाला नहीं है। अखबार वाले भी इनके विरुद्ध नहीं लिखते, ऐसे में सूचना विभाग का समाप्त होना ही सही है।

बदायूं से पत्रकार बीपी गौतम की रिपोर्ट. 

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