१९७१ से १९७७ तक मैं कानपुर शहर में आम पेटी बुर्जुआ परिवार के किशोरों की तरह अति भावुकता में सीपीआई (एमएल) के आंदोलन से जुड़ा रहा। रोज आईआईटी जाना और उस भावुकता भरी क्रांति की कल्पना में जीना जो खाते पीते और अपर मिडिल क्लास परिवारों से आए युवाओं की तफरीह का एक बहाना थी। इसी दौरान मिले युवा कहानीकार और आज एक प्रतिष्ठित पत्रकार तथा ट्रिब्यून के प्रधान संपादक श्री संतोष तिवारी, जिन्होंने मुझे इस हिरावल दस्ते से निकाला और अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में करने को प्रेरित किया। एक तरह से पत्रकारिता के मेरे पहले टीचर संतोष तिवारी रहे मुझसे करीब तीन-चार साल छोटे।
दूसरे अपने मंत्री जी यानी केंद्रीय संसदीय कार्य राज्य मंत्री श्री राजीव शुक्ल वे भी उम्र में मुझसे चार साल छोटे हैं लेकिन दैनिक जागरण में मुझसे एक साल सीनियर थे। उन्हीं का दबाव था कि मैं दिल्ली में जनसत्ता में आया। यहां शुरू में मुझे तनिक भी अच्छा नहीं लगता था रह-रहकर कानपुर की याद आती लेकिन राजीव शुक्ला ने दिल्ली छोडऩे नहीं दिया। तीसरे रहे शशि शेखर जी उम्र में मुझसे लगभग छह साल छोटे लेकिन संपादकी के अनुभव में मुझसे बड़े। अखबार को सेलेबल कैसे बनाया जाता है यह मैंने उनसे सीखा। यही कारण है कि वे आज, आज तक और अमर उजाला से होते हुए हिंदुस्तान में पहुंचे। यह शशि शेखर की ही सीख थी कि मन से यह झिझक गई कि अमुक काम मैं नहीं कर सकता।
तीसरे अपने यशवंत व्यास हैं। संयोग से वे भी मुझसे करीब नौ साल छोटे होंगे पर उनकी सीख से मुझे ताकत मिली। वे अक्सर मुझसे कहा करते थे कि शुक्ला जी कंफर्ट जोन से बाहर निकलिए। नौकरी एक कंफर्ट जोन है जिस दिन आप इसे छोड़ेंगे उसी दिन वे सारे काम कर सकेंगे जो आप अभी तक नहीं कर पाए। और वाकई मैं कंफर्ट जोन से बाहर आ गया और अब ज्यादा मजे में हूं।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से साभार.





