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‘जब तक पीरियड्स शुरू न हो, वो देवी होती है’

Vineet Kumar : 10-11 साल तक की वो हजारों लड़कियां जिनके पीरियड्स शुरू नहीं हुए हैं, देवी मानकर कंजक पूजी गई..कितना उदार है न हमारा समाज कि कल तक जिन इन लड़कियों के आगे बची रोटियों के टुकड़े, बासी ब्राउन ब्रेड, टूटे खिलौने, बच्चों के उतरन कपड़े फेंककर घर की घंटों बेगारी कराते रहे हैं, नवरात्र में धर्म की महिमा देखिएगा कि इनमे सबों को देवी दिखने लग गई.

Vineet Kumar : 10-11 साल तक की वो हजारों लड़कियां जिनके पीरियड्स शुरू नहीं हुए हैं, देवी मानकर कंजक पूजी गई..कितना उदार है न हमारा समाज कि कल तक जिन इन लड़कियों के आगे बची रोटियों के टुकड़े, बासी ब्राउन ब्रेड, टूटे खिलौने, बच्चों के उतरन कपड़े फेंककर घर की घंटों बेगारी कराते रहे हैं, नवरात्र में धर्म की महिमा देखिएगा कि इनमे सबों को देवी दिखने लग गई.

इधर वैसी हजारों सात-आठ-छह-पांच साल की लड़कियां जो मुनिरका से लेकर अट्टा तक में गुलाब की कली बेंचकर बल्कि खरीदने की जिदकर, कमलानगर से लेकर रजौरी गार्डन तक में वजन करने की मशीन और होमवर्क करती हुई गुहार लगाती रही है, वजन करा लो भइया (इसे आप सरोगेट बेगिंग कह सकते हैं)..अधिकांश ने फूल और मशीन को किनारे कर हाथ में दुर्गासप्त शती, तांबे के छोटे बर्तन और दो-चार फूल रखकर थाली सजा ली. वो माता का व्रत कर रही है और इस नाम पर दान मांगने लग जाती है. कल से फिर इनके हाथों में वही गुलाब,वही गुहार,वही वजन करनेवाली मशील होगी और दुर्गासप्त शती के पन्ने छोले-कुलचे बांधने के काम आएंगे.

स्त्रियों के मामले में धर्म की गति कितनी उल्टी है न कि जब तक उसके पीरियड्स शुरू न हो वो देवी है, शक्तिस्वरुपा है, वो इतनी शक्तिशाली है कि पितृसत्तात्मक समाज उसे पूजकर दैत्य जैसी ताकत हासिल करता है लेकिन जैसे ही उसके पीरियड्स शुरु होते हैं वो इतनी कमजोर हो जाती है कि बिना किसी की बहन,किसी की पत्नी, किसी की बेटी बने बिना सुरक्षित नहीं रह सकती.

इधर धर्म के जरिए आत्मा की शुद्धि की गति भी विचित्र है. बुराड़ी,कैम्प,नत्थूपुरा से लेकर मयूर विहार,कालकाजी,महारानी बाग में सैंकड़ों लालाओं ने लंगर लगाकर गरीबों को माता की पूड़ी और हलवे खिलाए. उनकी आत्मा कितनी शुद्ध हुई, वो उनके हिस्से का प्रभाव है लेकिन शहर को कितना गंदा और बजबजा दिया, ये सब हमारी आंखों के सामने है. आज दिनभर दिल्ली के अलग-अलग इलाके में भटकता रहा. चारों तरफ थर्माकॉल की झूठी थालियों के अंबार. कितनी बीमारियों को खुला आमंत्रण पता नहीं..भाई लंगर लगाकर तुम्हारी आत्मा तो शुद्ध हो जाती है लेकिन शहर की आत्मा कितनी गंदी और कुचली जाती है, अंदाजा है तुम्हें. मैंने तुम्हारी आत्मा कभी टटोलकर देखी नहीं लेकिन तुम्हारे इस धार्मिक कार्य से शहर में फैली गंदगी देखी नहीं जाती. एमसीडी को कड़े कानून बनाने चाहिए कि जो भी लंगर और भंडारा करके गरीबों को खाना खिलाएगा, पांच से हजार रुपये सफाई के नाम पर अलग से दे और बाकायदा उसकी रशीद काटी जाए.

युवा विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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