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नोएडा फिल्म सिटी में महिला पत्रकार सुरक्षित नहीं, शाम का ‘कार-ओ-बार’ शर्मनाक

Vineet Kumar : आप नोएडा फिल्म सिटी में काम करनेवाली मीडियाकर्मियों से पूछिए… क्या वो शाम को ऑफिस से निकलती हुई सुरक्षित महसूस करती हैं? आपको गहरी निराशा होगी. शराब के नशे में धुत्त, चैनल की गाड़ियां मोबाइल बार में तब्दील हो जाती हैं. जितने भद्दे और घिनौने कमेंट अपने चैनल की मीडियाकर्मियों को लेकर होती है, पास से गुजरना किसी यातना से गुजरने जैसा है. ऐसे में जब स्क्रीन पर इन चैनलों के भीतर से बड़ी-बड़ी बातें प्रसारित होते देख रहा हूं तो लग रहा है कितने सारे हिन्दी सिनेमा एक साथ प्रोड्यूस कर रहे हैं ये चैनल..

Vineet Kumar : आप नोएडा फिल्म सिटी में काम करनेवाली मीडियाकर्मियों से पूछिए… क्या वो शाम को ऑफिस से निकलती हुई सुरक्षित महसूस करती हैं? आपको गहरी निराशा होगी. शराब के नशे में धुत्त, चैनल की गाड़ियां मोबाइल बार में तब्दील हो जाती हैं. जितने भद्दे और घिनौने कमेंट अपने चैनल की मीडियाकर्मियों को लेकर होती है, पास से गुजरना किसी यातना से गुजरने जैसा है. ऐसे में जब स्क्रीन पर इन चैनलों के भीतर से बड़ी-बड़ी बातें प्रसारित होते देख रहा हूं तो लग रहा है कितने सारे हिन्दी सिनेमा एक साथ प्रोड्यूस कर रहे हैं ये चैनल..

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नोएडा फिल्म सिटी न्यूज चैनलों की मंडी है. आपको वहां एकाध को छोड़कर बाकी सब सभी राष्ट्रीय चैनलों की ऑफिस,दर्जनों ओबी और कैब मिल जाएंगे..कायदे से नोएडा फिल्म सिटी से सुरक्षित जगह दिल्ली-एनसीआर में कोई दूसरी नहीं होनी चाहिए..लेकिन शाम होते ही चैनलों की ये मंडी शराबियों के अड्डे में तब्दील हो जाती है. चैनलों की ऑफिस से जो भी लड़कियां बाहर निकलती है, पूरी तरह चेहरे ढंककर निकलती है ताकि कोई देखकर फब्तियां न कसे, छेड़ने न लग जाए. इधर देश और दुनियाभर की महिलाओं, स्त्रियों की सुरक्षा का दावा करनेवाले, चैनलों का पट्टा लटकाए राष्ट्रीय चैनल के मीडियाकर्मी "मैंने तो कहा एक बार टांग तो खोलो.." जैसी भद्दी टिप्पणियां करते सहज मिल जाएंगे. गाड़ियों पर चैनल के स्टीकर लगे होते हैं और डिक्की खोलकर उसमे सज जाती है गिलासें, बोतलें और आसपास की रेहड़ियों का चखना. अजीब दहशत सा माहौल बन जाता है. अगर आपकी आंखें बंद करके सीधे वहां पहुंचाया जाए तो आप किसी भी हालत में ये नहीं महसूस कर पाएंगे कि ये चैनलों की मंडी है. आपको बमुश्किल महिला मीडियाकर्मी वहां घूमती मिलेगी.. अब जबकि गला फाड़-फाड़कर तमाम चैनल बता रहे हैं कि बलात्कारियों, दरिंदों की ये दिल्ली/एनसीआर है तो कोई नोएडा फिल्म सिटी पर स्टोरी करे, अंदाजा लग जाए कि सामान्य तो छोड़िए, महिला मीडियाकर्मी कितनी सुरक्षित हैं.

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टीवी सीरियल को वूमेन स्पेस कहा जाता रहा है क्योंकि यहां पुरुष के मुकाबले स्त्री पात्रों की संख्या लगभग दुगुनी है. यही बात आप न्यूज चैनलों के संदर्भ में भी कहा जा सकता है. दुगुनी नहीं भी तो चालीस-साठ का अनुपात तो है ही लेकिन वो इस मीडिया मंडी में सुरक्षित तो छोड़िए इतनी भी आजाद नहीं है कि वो अपने उन इलाकों पर स्टोरी कर सके जहां से देशभर की स्त्रियों की सुरक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी बातें हो रही है लेकिन उसके साथ भी यहां वही सबकुछ होता है जो कि इससे बाहर के इलाके में हो रहा है.

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आप में सो जो लोग भी दिल्ली की ताजा घटना को लेकर टीवी टॉक शो में जा रहे हों, चैनल के लोगों से अपील कीजिए कि लड़की के लिए किसी की बेटी,किसी की बहन,किसी की पत्नी जैसे जुमले का इस्तेमाल बंद करने की अपील कीजिए. ये बहुत ही घटिया और घिनौना प्रयोग तो है ही..साथ ही आप नागरिक के बजाय बहन,बेटी,पत्नी को वेवजह क्यों घसीटते हैं..ये सब करनेवाले लोग बहन,बेटी..तक का ख्याल नहीं करते..आप संबंधों को एंटी वायरस की तरह इस्तेमाल न करें.

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मैं उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं जिस दिन हमारे साथियों के हाथ के बैनर, मुर्दाबाद के नारे, हल्लाबोल के नारे सरकारी महकमे,दिल्ली पुलिस कार्यालय से मुड़कर उन चैनलों की ऑफिस के आगे भी बढ़ेगे जहां वो सबकुछ होता है, जो शहर और देश के बाकी हिस्से में होते हैं और उतनी ही बर्बरता से मामले को दबाया जाता है.

युवा विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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