पांच गांव, तेरह उम्मीदवार, कुछ सड़कें और गलियां ही गलियां। उन्हीं जगहों के बीच घूम-घूम कर उम्मीदवार अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे थे। स्वाभाविक है कि एक उम्मीदवार गए तो दूसरे उम्मीदवार हाजिर। इस क्रम में कई बार उम्मीदवारों से मुलाकात हो जा रही थी। कुछ लोगों से परिचय पहले से था, तो कुछ लोगों से परिचय जनसंपर्क के दौरान ही हो रहा था।
एक शाम को मुलाकात हो गई अनिल मालाकार से। ओबरा पंचायत के वासी थे। शाम का समय था। पूर्णाडीह के वोटरों ने उन्हें आमंत्रित किया था। उनसे फोन पर बात हुई थी, लेकिन मिले नहीं थे। उनसे पहली मुलाकात थी। उन्होंने कहा कि आप ने नामांकन किया तो बताया भी नहीं। मैंने कहा कि कोई तामझाम था नहीं, सो किसी को नहीं बुलाया। अपने प्रस्तावक के साथ जाकर नामांकन कर आया था। वह आरएसएस के स्वयं सेवक भी रहे हैं और शाखा में भी जाते हैं। उन्होंने दावा किया कि उनका प्रचार करने के लिए संघ के पदाधिकारी भी आएंगे।
एक दिन प्रचार के दौरान पूर्णाडीह गया था। वहां के मध्यविद्यालय में काफी चहल-पहल थी। मैं भी वहां पहुंच गया। पता चला कि उपमुखिया जी ने एक कार्यक्रम कराया था। वहां पर उपमुखिया पति व उम्मीदवार अनिल शर्मा भी मौजूद थे। उनके साथ समर्थक भी मौजूद थे। उनसे परिचय हो चुका था। वह मेरे प्रचार की शैली से वाकिफ थे। उन्होंने उपहास करते हुए कहा कि खेत में भी जाकर प्रचार कीजिए। मैंने मुस्कुराया और कहा कि वह भी कर रहे हैं।
खरांटी के भूमिहार टोला के पास नहर पर बने पुल पर हम लोगों से चर्चा कर रहे थे। इसी दौरान दुखन राम जी पहुंच गए। दोनों लोग वोट के लिए पहुंचे। हम दोनों अपने-अपने तर्क दे रहे थे। वह अपनी पार्टी लाइन पर आकर बातचीत करने लगे। बात आते-आते जाति पर पहुंच गयी। थोड़ी देर बाद वह गांव में जनसंपर्क के लिए चले गए। उसके बाद इरशाद जी पहुंचे। उन्होंने भी लोगों से वोट मांगा और आगे बढ़ गए। अभी मैं वहां खड़ होकर बातचीत ही कर रहा था कि जफर अंजूम भी पहुंच गए। वह भी अपना पर्चा बांटते हुए वोट का आग्रह किया। थोड़ी देर अपनी भूमिका बांध कर हम भी प्रस्थान कर गए।
दोहपर समय था। पूर्णाडीह में एक नाद पर बैठ कर पूर्जा काट रहा था। चमार व भूइयां का मुहल्ला था। कई लोग जमा हो गए थे। भूइयां समाज का एक व्यक्ति अपनी जाति व परिजनों का नाम बताकर पर्चा कटवा रहा था। मैं अकेले लोगों से बातचीत करता हुआ पर्चा काट रहा था। इतनी देर में अपने समर्थकों साथ मनोज सिंह पहुंच गए। कई लोग थे। उन्होंने हाथ जोड़कर वोटरों से वोट देने का आग्रह किया। उनके जाने के बाद मैं एक शिक्षक के घर पर बैठा था। उनका घर गली में था। उसी दौरान नारा लगाता हुआ एक काफिला गली से गुजरा। उसमें उम्मीदवार सादिक खान थे। उनके समर्थक नारे लगाते चल रहे थे। उन्हें मैंने पहली बार देखा था।
मैं पूर्णाडीह से निकल कर बभनडीहा चला गया। एक शिक्षक थे सेवानिवृत्त। वह हमारे चाचा जगनारायण सिंह के साथ किसी स्कूल में पढ़ाए थे। इस कारण मैंने अपना दावा जताने उनके पास चला गया। दरवाजे पर एक व्यक्ति धान पीट रहा
था। एक कुर्सी मंगाई गई। उस पर बैठ कर मैं पुर्जा काटने लगा। लोगों से बातचीत कर रहा था कि यहां भी मनोज आ पहुंचे। उनके साथ उनके समर्थक भी थे। उनका ड्राइवर इसी गांव का था। इसी कारण उनके बैठने के लिए कई अतिरिक्त कुर्सियां ले आ आया। मनोज वहां बैठना मुनासिब नहीं समझे और वोट मांग कर आगे बढ़ गए। मैं वहां कुछ देर और बैठा, फिर वहां से एनएच 98 पर पहुंच गया। यह विडंबना ही थी कि हम उम्मीदवार चाहे-अनचाहे कहीं-न-कहीं मिल ही जाते थे। नजदीक आए तो हाथ मिलाया, नहीं तो दूर से ही नमस्कार कर अपने-अपने राह चल दिये।
(जारी)
लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए कर सकते हैं.
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