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प्रिंट-टीवी...

यह दौर न अखबार का है न टीवी का, यह दौर मोबाइल और सोशल मीडिया का है

अगर टीवी चैनल नहीं आते तो हम शायद आज भी उसी पत्रकारिता के दौर में जी रहे होते जैसे कि १९८० में, १९९० में और २००० में। यह प्रिंट का स्वर्ण काल था। अस्सी के दशक में अखबारों ने अपना विस्तार करना शुरू किया था और नब्बे के दशक में प्रिंटर और पीटीएस तथा रंगीन पेजों ने चकाचौंध करना प्रारंभ कर दिया था। अखबार अब गांव और कस्बों तक फैलने लगे थे वर्ना इसके पहले अखबारों में गांव देहात के संस्करणों का प्रभारी मथुरा के पेड़ों या मेरठ की रेवड़ी और मुरैना की गजक का डिब्बा लेकर खुश होकर खबरें छापा करता था न संपादक ध्यान देता था न मालिक।

अगर टीवी चैनल नहीं आते तो हम शायद आज भी उसी पत्रकारिता के दौर में जी रहे होते जैसे कि १९८० में, १९९० में और २००० में। यह प्रिंट का स्वर्ण काल था। अस्सी के दशक में अखबारों ने अपना विस्तार करना शुरू किया था और नब्बे के दशक में प्रिंटर और पीटीएस तथा रंगीन पेजों ने चकाचौंध करना प्रारंभ कर दिया था। अखबार अब गांव और कस्बों तक फैलने लगे थे वर्ना इसके पहले अखबारों में गांव देहात के संस्करणों का प्रभारी मथुरा के पेड़ों या मेरठ की रेवड़ी और मुरैना की गजक का डिब्बा लेकर खुश होकर खबरें छापा करता था न संपादक ध्यान देता था न मालिक।

यूं भी तब तक डाक में ऐसे संपादकीय सहकर्मी बिठाए जाते थे जिनकी अंग्रेजी कमजोर होती थी क्योंकि अखबारों ने प्रूफ रीडर का पद खत्म कर दिया था अब उन्हें कहीं सेट करना था, इसलिए डाक पर भेज दिए जाते थे। कई बार ऐसे लोग भी भेजे जाते थे जो काम में तो अव्वल होते थे लेकिन उनसे काम कराना सबके बस की बात नहीं थी।

पर २००० आते-आते हालात बदलने लगे। इसके बावजूद टीवी अभी असरकारक नहीं बना था। न मोबाइल से फोटो खींची जा सकती थी। मुझे याद है २२ जनवरी २००२ की वह सुबह जब मैं कोलकाता में था और सुबह दिल्ली के लिए फ्लाइट पकडऩे अलीपुर से नेताजी सुभाष हवाई अड्डा जा रहा था। गाड़ी अभी चौरंगी पहुंची ही थी कि अचानक गोलियों की आवाज सुनाई देने लगी। मैंने ड्राइवर से गोलियों की दिशा में गाड़ी ले चलने को कहा। अमेरिकन सेंटर पर लाशें बिछी थीं और कुछ लोग भाग रहे हैं। पता चला कि अमेरिकन सेंटर पर आतंकी हमला हुआ है और सीआरपीएफ के पांच जवान मारे गए हैं।

मैंने दिल्ली जाना मुल्तवी किया और फौरन मोबाइल से फोन कर मैंने अपने चीफ रिपोर्टर प्रभाकर मणि त्रिपाठी को उठाया। लेकिन वे वहां से काफी दूर टाली गंज में रहते थे, जब तक अपने फोटोग्राफर को लेकर पहुंचे तब तक सब दृश्य बदल चुका था। उस समय मेरे पास नोकिया का जो मोबाइल था उसकी कीमत तो काफी थी पर फोटो नहीं खींची जा सकती थी। सिर्फ मैंने अपनी आंखिन देखी घटना को लिखा। पर फोटो टेलीग्राफ और बर्तमान व आजकल के पास हमसे बेहतर थे। टीवी वाले तो काफी बाद में पहुंचे। आज का समय होता तो मैं शायद अपने मोबाइल कैमरे से ही न सिर्फ फोटो बल्कि लाइव कवरेज अपने कैमरे से ही कर लेता। और हो सकता है कि फेसबुक पर उसका कवरेज किसी टीवी चैनल या अखबार से अधिक बेहतर हो जाता। आज का दौर न अखबार का है न टीवी का वरन् यह दौर मोबाइल और सोशल मीडिया का है।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के एफबी वॉल से साभार.

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