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वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (बीस) : समझा देवी व कुवंर का फर्क

समाचार संपादन के दौरान कई बार महिलाओं के नाम के साथ कुंवर शब्द पढ़ने को मिलता था। मुझे लगता था कि यह कोई सरनेम होगा, किसी जाति का प्रतीक होगा। लेकिन पर्चा काटने के दौरान मुझे इस बात का अहसास हुआ कि कुंवर को लेकर अब तक ही जानकारी हमारी गलत और अधूरी थी।

समाचार संपादन के दौरान कई बार महिलाओं के नाम के साथ कुंवर शब्द पढ़ने को मिलता था। मुझे लगता था कि यह कोई सरनेम होगा, किसी जाति का प्रतीक होगा। लेकिन पर्चा काटने के दौरान मुझे इस बात का अहसास हुआ कि कुंवर को लेकर अब तक ही जानकारी हमारी गलत और अधूरी थी।

बभनडीहा में एक परिवार के सदस्यों का पर्चा काट रहा था। एक महिला का नाम था, जिनके नाम के आगे देवी लिखा हुआ था। मैंने पर्चा लिखते हुए कहा कि (कोई नाम मान लेते हैं) संगीता देवी। जिनका नाम पुकारा था, वहीं खड़ी थीं। वोटर लिस्ट में नाम के साथ देवी लिखा हुआ था, सो मैंने नाम में देवी जोड़ दिया। इस पर उन्होंने आपत्ति दर्ज की और कहा कि देवी काहे लिखते हैं, कुंवर लिखिए या मोसमात लिखिए। मैं तो पहली बार में समझ ही नहीं पाया कि मामला क्या है?

सिर उठा कर उनके चेहरे को देखा। मांग सूना था। चेहरे पर निरिहता का भाव था। समझते देर नहीं लगी कि जिस देवी और कुंवर के अंतर को हम समझ नहीं पा रहे हैं, उसका कितना गूढ़ अर्थ है। मैंने तत्काल उनके नाम के पर्चे को सुधारा और देवी की जगह कुंवर लिखा। ऐसी स्थिति का और कई जगहों पर सामना करना पड़ा। वोटर लिस्ट में महिलाओं के नाम के साथ देवी लिखा रहता था और मैं उसी आधार पर पर्चा बनाता था। कौन महिला सुहागन हैं या विधवा हैं, यह जान पाना मेरे लिए मुश्किल था। वोटर लिस्ट में लिखा नाम ही पुकार पाता था। ऐसे में परिवार के साथ बैठकर पर्चा काटने के दौरान देवी की जगह कुंवर लिखना पड़ता था।

मामला सिर्फ महिलाओं का ही नहीं था। सरनेम के चक्कर में पुरुषों के मामले में भी एक बार फंस गया था। खरांटी के तिवारी टोला में हैं अजय पांडेय। जनसंपर्क के क्रम में उनसे मिला था। पहली मुलाकात में पता चला कि वह हमारे गांव के बगल के गांव धनगाई के रहने वाले हैं और खरांटी में आकर बस गये हैं। वे हमारे पिताजी स्व. फौजदार सिंह व बड़े भाई कृष्णा सिंह को जानते थे। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। गांव-घर की चर्चा हुई। उन्होंने पूछा कि आप किसके कहने पर चुनाव लड़ने आए हैं। मैंने स्पष्ट कहा कि मैं स्वेच्छा से चुनाव लड़ने आया हूं, ताकि चुनाव की राजनीति, समाज के संगठन को समझ सकूं। यदि मुखिया बन गया तो विकास के लिए काम भी कर सकूं। बातचीत का सिलसिला थमने सा लगा था। मैं अब वहां चलने के मूड में था। मैंने उनसे पूछा, आपका नाम क्या है? उन्होंने कहा- अजय सिंह। मैं चकरा गया। मुहल्ले वालों ने उनका अजय पांडेय बताया था और वह अपना नाम अजय सिंह बता रहे हैं। तिवारी टोला में आकर बस गए थे, इसलिए उन्हें मैं ब्राह्मण मान रहा था, जबकि वह थे भूमिहार।

भूमिहारों को सरनेम को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रहती है। जाति के आधार पर सिंह और पांडेय में कोई भ्रम नहीं था। हमारे इलाके में भूमिहार पांडेय, सिंह, तिवारी आदि सरनेम का इस्तेमाल करते हैं। अजय पांडेय के अजय सिंह होने का स्पष्ट संकेत था कि वह भूमिहार हैं। सरनेम का खेल यहीं खत्म नहीं हुआ। यादव लोग सरनेम में सिंह भी लिखते हैं और यादव भी। मेरे ही परिवार के अन्य सदस्यों का सरनेम सिंह, जबकि मेरे नाम के साथ यादव लगा हुआ है। इसी पंचायत से उम्मीदवार मनोज कुमार सिंह यादव जाति के थे। एक जगह यादवों के साथ मैं बैठा था। मैंने मजाक में ही कहा कि असली यादव तो हम ही हैं, क्योंकि मेरे ही नाम के साथ यादव लगा हुआ है। एक उम्मीदवार थे अजय नारायण। जाति के पासवान। उनके नाम के साथ पासवान नहीं लिखा हुआ था। लेकिन पूरी पंचायत में चर्चा थी कि वह पासवान जाति के हैं और भूमिहार मुखिया के सपोर्ट से चुनाव लड़ रहे हैं। पूरे चुनाव में प्रचार अभियान में जाति के महत्वपूर्ण फैक्टर का काम कर रही थी और पूरे गणित इसी के केंद्र में घूम रहे थे।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए कर सकते हैं.


इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा

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