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एफएम गोल्ड पर चल रही निदेशक के मुंहलगे ड्यूटी अफसर की मनमानी

: सरकारी तानाशाहों की गिरफ्त में एफएम गोल्ड : मैं, दुष्यंत, एफ़एम गोल्ड चैनल, दिल्ली पर कई वर्षो से प्रस्तोता के रूप में कार्य कर रहा हूँ. 12 नवंबर, 2011 दिन शनिवार को रात 7-8 बजे के बीच मुझे आकाशवाणी दिल्ली के लोकप्रिय चैनल ऍफ़ एम गोल्ड के कार्यक्रम अधिशासी श्री दानिश इकबाल का फोन आया. उन्होंने मुझसे कहा कि आपको अब ऍफ़ एम गोल्ड चैनल पर आने की जरूरत नहीं क्योंकि आपके ऍफ़ एम गोल्ड पर कार्यक्रम करने पर हमेशा के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया है.

: सरकारी तानाशाहों की गिरफ्त में एफएम गोल्ड : मैं, दुष्यंत, एफ़एम गोल्ड चैनल, दिल्ली पर कई वर्षो से प्रस्तोता के रूप में कार्य कर रहा हूँ. 12 नवंबर, 2011 दिन शनिवार को रात 7-8 बजे के बीच मुझे आकाशवाणी दिल्ली के लोकप्रिय चैनल ऍफ़ एम गोल्ड के कार्यक्रम अधिशासी श्री दानिश इकबाल का फोन आया. उन्होंने मुझसे कहा कि आपको अब ऍफ़ एम गोल्ड चैनल पर आने की जरूरत नहीं क्योंकि आपके ऍफ़ एम गोल्ड पर कार्यक्रम करने पर हमेशा के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया है.

मैंने चौंककर इस प्रतिबंध की वजह पूछी जिसका कोई भी संतोषजनक उत्तर वे न दे सके. क्योंकि जो वजह मुझे बतायी गई वह बहुत ही हैरतंगेज़ थी. मुझसे कहा गया कि मैंने आकाशवाणी दिल्ली केंद्र के निदेशक लक्ष्मी शंकर वाजपेयी के बारे में अपशब्दों का प्रयोग किया है. मैंने आश्चर्य से पूछा "कब?" तो जवाब मिला की कैजुअल ड्यूटी अफसर एन.के. वर्मा से आपकी कुछ बहस हुई थी जिसके दौरान आपने केंद्र निदेशक वाजपेयी के लिए "बेवक़ूफ़" शब्द का इस्तेमाल किया जो उचित नहीं था. मैंने दानिश साहब को यह समझाने की कोशिश की कि मैंने तो ऐसा कुछ भी नहीं कहा, यह सरासर झूठ है और इसका कोई प्रमाण भी नहीं है. इस पर उन्होंने कहा- "मगर ड्यूटी अफसर नवल किशोर वर्मा ने आपके ख़िलाफ़ अपनी रिपोर्ट में ऐसा ही लिखा है, इसलिए मैं कुछ नहीं कर सकता."

मुझे अब सारी कहानी समझते देर नहीं लगी दरअसल २ नवम्बर २०११ की रात मुझसे अपने लाइव कार्यक्रम के दौरान वार बताने में ज़रा चूक हो गई थी जिसके लिए मैनें उसी वक़्त माफ़ी भी मांग ली थी. लाइव कार्यक्रमों के दौरान प्रस्तोताओं से ऎसी ग़लतियाँ अक्सर हो जाया करती हैं क्योंकि लाइव कार्यक्रम करते वक़्त उन्हें कई ऐसी वजहों से गुज़रना पड़ता है जो मानसिक दबाव पैदा कर देती हैं. इन वजहों में तकनीकी गड़बड़ियों के अलावा आकाशवाणी के कुछ अधिकारियों की प्रतिबन्ध लगाने की धमकियाँ भी शामिल रहती हैं.

बहरहाल ड्यूटी अफसर नवल किशोर वर्मा तो जैसे इसी फिराक में थे. वो तत्काल धड़धड़ाते हुए मेरे कार्यक्रम के वक़्त लाइव स्टूडियो में घुस आए और मेरी गलती मुझे बताने लगे जिस पर मैंने उनसे कहा कि मैं भूल सुधार कर श्रोताओं से क्षमा भी मांग चुका हूँ. मगर वर्मा जी तो जैसे कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थे. वो लगातार चिल्लाये जा रहे थे ये भूलकर कि लाइव स्टूडियो में ऐसा व्यवहार करना आकाशवाणी के नियमों के विरुद्ध है. इस तरह आप प्रस्तोता का संतुलन बिगाड़ रहे होते हैं जिससे उस वक़्त उसका प्रदर्शन भी बिगड़ता है और ज़ाहिर है सुनने वालों के आगे आकाशवाणी की छवि भी बिगड़ती है. मगर उद्घोषक के पद से सेवानिवृत्त हुए इस बड़बोले और अकड़बाज़ आकस्मिक ड्यूटी अफसर ने तो जैसे सारे नियम ही ताक पर रख दिए थे. और जब मैंने उन्हें ये नियम याद दिलाये तब वो मेरी रिपोर्ट बिगाड़ने की धमकी देकर बाहर निकल गए. आगे क्या हुआ आप को बताया ही जा चुका है.

अब इन वर्मा जी की अकड़ और बड़बोलेपन की वजह भी जान लीजिए. हकीकत तो ये है कि ये उद्घोषक के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं और ज़िंदगी भर ड्यूटी अफसरों से ही अपने प्रसारण की रिपोर्ट लिखवाते आए हैं मगर सेवानिवृत्ति के बाद वही काम बतौर कैजुअल कर्मचारी इन्हें मिल गया है जो इन्होंने कभी किया ही नहीं. और ये काम इन्हें इसलिए मिला है क्योंकि इन्हें केंद्र निदेशक वाजपेयी का मुंहलगा नौकर बताया जाता है जो बतौर मुखबिर अधिकांशतया ऍफ़एम गोल्ड पर ही ड्यूटी पर बिठाए जाते हैं और ये पल-पल की ख़बर चुगलखोरों की तरह निदेशक तक पहुंचाया करता है. यही नहीं बात-बात पर अपने से ज़्यादा पढ़े लिखे ऍफ़एम प्रस्तोताओं पर रौब ग़ालिब करना जैसे इसकी आदत ही बन गयी है और जानने योग्य यह भी है कि वर्मा का अनुभव आकाशवाणी में बतौर उद्घोषक रहा है, बतौर प्रस्तोता नहीं.

और प्रस्तोता का काम बड़े-बड़े कार्यक्रमों की स्क्रिप्ट तैयार करके, उपयुक्त गीत चुनकर उन कार्यक्रमों को प्रस्तुत करना होता है जबकि ऐसे चुके हुए उद्घोषक चार लिखी लिखाई लाइनें पढ़-पढ़ कर ही अपना जीवन बिता देते हैं. और वर्मा इस बात को महसूस करते हों या न करते हों मगर ये तय है कि केंद्र निदेशक से निकटता ने उन्हें मुंहजोर और उद्दंड बना दिया है. इसीलिए उनकी यानी एक कैजुअल कर्मचारी की झूठी रिपोर्ट पर केंद्र निदेशक ने आँखें मूँद कर सिर्फ एकतरफ़ा बातों के आधार पर मुझे प्रतिबंधित करने का मौखिक आदेश दिया. मौखिक इसलिए क्योंकि इस सम्बन्ध में न तो मुझे कोई लिखित आदेश दिया गया, न मुझसे कुछ लिखित जवाब-तलब ही किया गया और न ही मेरे पक्ष को सुना गया. हालांकि मैं 30 नवम्बर 2011 को एक शिकायत महानिदेशक आकाशवाणी को भी दे चुका हूँ मगर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

यह घोर आश्चर्य का विषय है और तानाशाही की हद है कि वर्षों से आकाशवाणी की सेवा कर रहे एक Casual Presenter को उसकी कोई ग़लती बताए बगैर, लिखित रूप में उससे कोई जवाब तलब किए बगैर उस पर प्रतिबन्ध लगाए जाने का तानाशाही फ़रमान उसे सुना दिया जाता है . आकाशवाणी के अधिकारीयों के इस अफसोसनाक और अराजक  रवैये ने मुझे मानसिक रूप से आहत किया है. मुझे इस पूरी घटना के पीछे किसी षड्यंत्र की आशंका हो रही है क्योंकि मैं आकाशवाणी के एफ़एम गोल्ड चैनल को हर दृष्टि से बेहतर बनाने की दिशा में इसके प्रस्तोताओं द्वारा कटिबद्धता के साथ चलाए जा रहे एक ऐसे आंदोलन का हिस्सा हूँ जिसकी सार्थकता को माननीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री , भारत सरकार के कार्यालय द्वारा भी सहयोग और सहानुभूति की दृष्टि से देखा गया है. और पिछले दिनों केन्द्रीय मंत्री भारत सरकार को दिए गए एक अति महत्वपूर्ण Representation पर भी मेरे हस्ताक्षर थे इसी वजह से कुछ अधिकारी मुझे हटाने का षड्यंत्र कर रहे हैं.

आकाशवाणी के अधिकारियों का यह रवैया पूरी तरह असंवैधानिक है, तानाशाही पूर्ण है, लोकतंत्र के मुंह पर तमाचा है और कोई भी स्वाभिमानी और ईमानदार व्यक्ति के लिए स्वीकार्य नहीं है. यह निरीह प्रस्तोताओं का गला घोंटने के लिए आकाशवाणी के चंद निरंकुश अधिकारियों द्वारा अक्सर अंजाम दी जाने वाली घटनाओं में से एक भयंकर शर्मनाक और भर्त्सना पूर्ण घटना है.यह एक गंभीर मामला है. इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषी अधिकारियों के नाम सामने लाए जाएँ और उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए ताकि ऎसी निंदनीय और आकाशवाणी की छवि को मलिन करने वाली घटनाओं की पुनरावृति न हो सके. इस संबंध में मैंने आर टी आई एक्ट ,2005 के अंतर्गत  भी कुछ सवाल पूछे हैं जिनके जवाब अभी आने बाकी हैं.

दुष्यंत से संपर्क  09873952610 के जरिए किया जा सकता है.

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