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इलाहाबाद

गैंगरेप शिकार गूंगी बालिका की गोद में बेटा

: हाय विधाता! अपने नवजात का बाप वो किसे माने? : इलाहाबाद। विडंबना देखिये। जिस समय दिल्ली में संसद के भीतर बना महिलाओं से दुराचार वाला विशेष विधेयक देश के कोने-कोने में एक नई बहस को जन्म दे रहा था, उसी समय गैंगरेप की शिकार बनी गूंगी-बहरी चौदह वर्षीय एक किशोरी बेटे को जन्म देकर बिन ब्याही मॉं बनने को मजबूर हुई।

: हाय विधाता! अपने नवजात का बाप वो किसे माने? : इलाहाबाद। विडंबना देखिये। जिस समय दिल्ली में संसद के भीतर बना महिलाओं से दुराचार वाला विशेष विधेयक देश के कोने-कोने में एक नई बहस को जन्म दे रहा था, उसी समय गैंगरेप की शिकार बनी गूंगी-बहरी चौदह वर्षीय एक किशोरी बेटे को जन्म देकर बिन ब्याही मॉं बनने को मजबूर हुई।

गुड़िया-गुड्डों से खेलने की उम्र वाली यह बालिका इलाहाबाद के स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल (एसआरएन) में एक बेड पर नवजात के बगल लेटे हुए यह नहीं समझ पा रही थी कि उसके इस बेटे का बाप कौन है? पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए एक साल पहले के फ्लैश बैक में जाना पड़ेगा। इलाहाबाद के गंगापार के नवाबगंज थाना क्षेत्र की टाउन एरिया लालगोपालगंज में एक गांव है पलये। तकरीबन तीन हजार की आबादी वाले इस गांव में पिछले साल 12 जून को हैवानियत का जो शर्मनाक खेल खेला गया वह किसी भी सभ्य समाज का चेहरा शर्म से नीचे झुकाने वाला है।

दरअसल, शौच के लिए घर से निकली इस किशोरी को उसी गांव के दो दरिंदों ने रास्ते से उठा लिया। मुंह दाबकर गन्ने के खेत में ले गए और बारी-बारी से रेप किया। काफी देर तक बालिका खेत में अचेत पड़ी रही। बालिका का चाचा उसे ढूंढने निकला तो बालिका की दुर्दशा देख उसकी रूह कांप उठी। होश में आने के बाद बालिका को घर लाया गया। यहां उसने इशारे-इशारे से सारे घटनाक्रम की जानकारी परिजनों को दी। गरीब और बेबस परिजनों ने मामले की शिकायत गांव के लोगों से की पर वह नक्कारखाने में तूती साबित हुई। मामले का खुलासा होने के बाद गांव के ‘चौधरियों’ ने 14 जून को सरकारी प्राइमरी स्कूल के कैंपस में पंचायत बैठाकर दोनों आरोपियों पर 21-21 हजार यानी 42 हजार रुपए का जुर्माना लगा दिया। उसमें भी पंचों की शर्त थी कि जुर्माने में मिलने वाली 21 हजार रुपए गांव की मंदिर में दान किया जाए।

भुक्तभोगी परिवार के सदस्य फैसले के खिलाफ थे। भुक्तभोगी परिजनों की शिकायत पर भी लालगोपालगंज चौकी की पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इस बीच गैंगरेप की शिकार बालिका की दशा बिगड़ने पर घर वालों ने उसे पड़ोसी जिले प्रतापगढ़ के कस्बा कुंडा में एक अस्पताल में भर्ती कराया। उधर, मामला स्थानीय मीडिया में आने के बाद अफसरों की नींद खुली। पुलिस को अफसरों की फटकार खाने के बाद नामजद रिपोर्ट दर्ज करनी पड़ी। ठेकेदारी करने वाले आरोपी मनोज और उसके सहयोगी मुतुन्नी को पुलिस ने एक सप्ताह बाद गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इलाहाबाद के करछना क्षेत्र के बसपा विधायक दीपक पटेल ने विधानसभा में इस मामले को प्रमुखता से उठाया। शासन ने आईजी, डीएम से घटना की बाबत रिपोर्ट मांगी।

तीन महीने बाद अचानक पीड़िता की तबियत खराब हुई। किशोरी की मॉं उसे लेकर बिसहिया स्वास्थ्य केंद्र गई। वहां जाच के बाद बालिका के गर्भवती होने की आशंका जताते हुए डॉक्टरों ने अल्ट्रासाउंड जांच की सलाह दी। बालिका के गर्भवती होने का मामला सामने पर भुक्तभोगी के घर में हड़कंप मच गया। आरोपी जेल में थे। आरोपी के परिजन किशोरी का एबार्सन कराने का दबाव डालने लगे। पीड़ित किशारी की मॉं अपनी देवरानी के साथ लेकर नवाबगंज थाने पहुंची। भुक्तभोगी बालिका की मॉं के अनसार, पुलिस ने यह कहकर उन्हें वापस कर दिया कि दोनों आरोपी जेल में हैं, इस मामले में अब पुलिस क्या कर सकती है? पुलिस का रूख देख दोनों थाने से वापस हो गई। स्थानीय मीडिया ने मामले को दुबारा उछाला तो तत्कालीन डीएम अनिल कुमार ने टीम गठित कर बालिका के स्वास्थ्य, परिवार की आर्थिक स्थिति, जमीन का पट्टा, सुरक्षा देने का प्रशासन ने आश्वासन दे दिया।

ईंट-भट्टे पर मजदूरी कर गुजर बसर करने वाले इस गरीब परिवार को मदद के नाम पर एक बोरी गेहूं, एक बोरी चावल, स्थानीय चेयरपर्सन के पति मुख्तार अहमद ने ग्यारह हजार रुपए की आर्थिक मदद की। तत्कालीन सोरांव के एसडीएम शत्रुहन वैश्य ने डीएम को भेजी गई रिपोर्ट में भुक्तभोगी परिवार की आर्थिक दशा खराब होने और किशोरी का स्वास्थ्य भी ठीक न होने की बात कही। कौड़िहार के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी डॉ0 शिवपूजन की देखरेख में भुक्तभोगी बालिका के स्वास्थ्य परीक्षण की जांच समय-समय पर करते रहने की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई थी। यह सब सिलसिला चल ही रहा था कि 20 मार्च को अचानक बालिका की तबियत बिगड़ने पर उसे इलाहाबाद शहर एसआरएन अस्पताल में भर्ती कराया गया। आपरेशन के बाद उसे बेटा पैदा हुआ। हालात को झेल रही बालिका अपनी बदकिस्मती पर आंसू बहाने को मजबूर है।

बालिका के माता-पिता ने कहा, वे चुप नहीं बैठेंगे, न्याय के लिए आखिरी सांस तक लड़ेंगे। लाख टके का सवाल मुंह बाये खड़ा जवाब तलाश रहा है कि इस गरीब परिवार को न्याय कब और किस तरह मिल सकेगा। गूंगी-बहरी यह बेजुबान बालिका अपना दुख दर्द तो किसी से भी नहीं बता सकती। काहे कि विधाता ने तो उसे जुबान ही नहीं दी हैं पर पर इसके साथ न्याय करने में शासन-प्रशासन गूंगा-बहरा क्यों साबित हो रहा है? सामाजिक संगठनों ने भी पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। न कोई धरना-प्रदर्शन न कहीं कोई कैंडल जुलूस…। यह शायद इसलिए भी कि लालगोपालगंज का कस्बा कोई दिल्ली जैसी जगह नहीं है।

… ओ जमाने के खुदाओं!

इलाहाबाद जिला मुख्यालय के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में बेटे को जन्म देने वाली किशोरी की तीन दिन बाद अस्पताल में हालत बिगड़ गई। दो दिन बाद नवजात की भी तबियत बिगड़ने लगी। ऐसे में किशोरी के घर वाले परेशान हो गए। दवा खरीदने के लिए जेब में पैसे नहीं थे। गरीबी जो न कराए। ईंट-भट्ठे पर मजदूरी के जरिए गुजार बसर करने वाले किशोरी के माता-पिता को लालगोपालगंज के एक साहूकार से दस फीसदी ब्याज पर कर्ज लेकर जच्चा-बच्चा का इलाज कराने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

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