छत्तीसगढ़ से मित्र लोगों ने बताया कि फेसबुक पर अभिव्यक्ति की आजादी की हिमायत करने वाली भाजपा की इस राज्य की सरकार मीडिया की ठीक से खबर ले रही है. इस राज्य में दो पत्रकारों की हत्या हो चुकी है और विज्ञापनों की राजनीति से प्रिंट मीडिया को लगातार दबाया जा रहा है. एक चैनल और एक अखबार पर रमन सिंह के बिगड़ैल अफसरों की ''मेहरबानी'' बढ़ती जा रही है. ऐसे ही बिगड़ैल अफसरों ने अजित जोगी को सत्ता से बेदखल कर उन्हें राज्य की राजनीति के कूड़ेदान पर फेक दिया था. वे जोगी जो मीडिया के सबसे करीबी रहे.
मुझे याद है मैं जब इंडियन एक्सप्रेस की नई जिम्मेदारी निभाने के लिए छत्तीसगढ़ पहली बार पहुंचा तो सर्किट हाउस में अजित जोगी के एक सहयोगी ने पूछा था- कोई भी दिक्कत हो तो बता दीजिएगा. खैर बाद में जोगी मुख्यमंत्री बने और उनसे करीबी संबंध भी बना. कई बार उनका सुबह सुबह फोन आ जाता था इंडियन एक्सप्रेस देखने के बाद और बधाई देते थे. दिल्ली से आए चार पांच मित्रों को वे दावत पर भी बुलाते थे. पर जब ख़बरों में सरकार की आलोचना शुरू हुई तो उनकी नजरें भी बदल गई. जनसत्ता उसी दौर में मैंने लांच किया तो 'सबकी खबर दे, सबकी खबर ले' के नारे के मुताबिक कवरेज भी शुरू हुई और सरकार आए दिन विधानसभा में घिरने लगी. इस पर कुछ अफसरों ने जोगी के कान भरे और फिर खुल कर टकराव हुआ.
जनसत्ता के दफ्तर पर हमला हुआ और फिर लम्बा आन्दोलन चला. उस दौर में अपन के साथ अनिल पुसदकर, राजकुमार सोनी, संजीत त्रिपाठी, अनुभूति, भारती यादव जैसे कई पत्रकार इस लड़ाई में साथ थे. बस्तर में वीरेंदर मिश्र ने मोर्चा संभल रखा था. पर हमारे फ्रेंचायाजी पार्टनर विजय बुधिया अखबार के इन तेवरों से घबडा गए और मुझे वापस भेजने का दबाव डाला था. पर तब तक सारा काम हो चुका था. मुझे याद है एक दिन प्रदेश के कद्दावर नेता विद्याचरण शुक्ल (वही इमरजेंसी फेम वाले) ने मुझसे कहा- अंबरीश जी, यह अभियान कब तक चलता रहेगा, तो मेरा जवाब था जब तक मैं यहाँ रहूँगा.
जो पहल अभिव्यक्ति की आजादी के संघर्ष के लिए छत्तीसगढ़ के पत्रकारों ने की उसी ने भाजपा को सत्ता तक पहुँचाया था, यह बात छत्तीसगढ़ में आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी इस सरकार के मंत्री और बिगड़ैल अफसर लगता है भूल गए हैं. अब लोगों को फिर जोगी याद आ रहे हैं क्योकि वे ही इस सरकार से सीधा लोहा ले सकते हैं. ऐसा अपने छत्तीसगढ़ के कई सहयोगियों का मानना है. लगता है छत्तीसगढ़ में फिर इतिहास दोहराया जा रहा है. मीडिया को निपटाते निपटाते रमन सिंह भी भाजपा को निपटा देंगे, यह बात नितिन गडकरी को तो समझ में आ जानी चाहिए. मीडिया ने दो मुख्यमंत्रियों रमन सिंह और नितीश कुमार की जो छवि बनाई है वह विज्ञापन के पैसे से बनी है और विज्ञापन के पैसे से जब इंडिया साइनिंग नहीं चला तो रमन सिंह की भोली भाली छवि जिस पर खनन क्षेत्र का दाग लग रहा है वह कब त़क चलेगी. जनसंपर्क विभाग के थके हुए अफसरों से कोई राजनैतिक लड़ाई न जोगी लड़ पाए थे और न रमन लड़ पाएंगे. हैरानी यह जरूर है कि मीडिया के मठाधीश इस पर खामोश क्यों है.
लेखक अंबरीश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. प्रसिद्ध अखबार जनसत्ता के यूपी ब्यूरो चीफ हैं.






