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बिहार

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (इक्कीस) : प्रखंड कार्यालय था महत्वपूर्ण आकर्षण

ओबरा प्रखंड कार्यालय उम्मीदवारों के लिए धाम के समान हो गया था। मुखिया बनने के सारे सूत्र प्रखंड कार्यालय से जुड़े हुए थे। नामांकन की अधिसूचना से लेकर चुनाव परिणाम की घोषणा तक का जिम्मा प्रखंड कार्यालय को ही था। इसलिए बीडीओ, नाजिर, प्रखंड कल्याण पदाधिकारी, बड़ा बाबू से संपर्क प्रगाढ़ हो गया था।

ओबरा प्रखंड कार्यालय उम्मीदवारों के लिए धाम के समान हो गया था। मुखिया बनने के सारे सूत्र प्रखंड कार्यालय से जुड़े हुए थे। नामांकन की अधिसूचना से लेकर चुनाव परिणाम की घोषणा तक का जिम्मा प्रखंड कार्यालय को ही था। इसलिए बीडीओ, नाजिर, प्रखंड कल्याण पदाधिकारी, बड़ा बाबू से संपर्क प्रगाढ़ हो गया था।

निर्वाची पदाधिकारी प्रखंड विकास पदाधिकारी थे। लेकिन चुनाव से संबंधित पूरा कार्य प्रखंड कल्याण पदाधिकारी संजय कुमार ही देखते थे। उनकी सहमति के बिना चुनावी कार्रवाई का एक पत्ता तक नहीं डोलता था। इसलिए चुनाव से संबंधित जानकारी के लिए उनसे ही संपर्क करना पड़ता था। नामांकन के दिन ही बीडीओ के साथ लंबी अवधि तक बात करने का मौका मिला और बातचीत भी लंबी हुई। उसके बाद तो कभी लंबी अवधि तक बात करने का मौका ही नहीं मिला। किसी काम के लिए सीधा संवाद संजय कुमार के साथ ही था। कुछ जानकारी मोबाइल पर ले ली तो कुछ जानकारी मिलकर भी ली।

प्रखंड कार्यालय में ही कई उम्मीदवारों से परिचय हुआ। अपनी-अपनी रणनीति भी चर्चा हुई, लेकिन खुलकर नहीं। हर कोई अपना राज छुपा कर रखना चाहता था। जफर अंजुम से भी मेरी पहली मुलाकात प्रखंड कार्यालय ही हुई। मनोज सिंह से वहीं मुलाकात हुई। स्थानीय राजनीति में दखल रखने का दावा करने वाला वीरेंद्र पांडेय, बालेश्वर सिंह समेत कई लोगों से परिचय वहीं पर हुआ।

चुनाव प्रचार के दौरान दो बार प्रखंड कार्यालय की उपयोगिता काफी महसूस हुई और अधिकारियों से संपर्क के लिए परेशान भी रहा। पहला मौका था चुनाव चिह्न लेने की व्यग्रता और दूसरा था अभ्यर्थी परिचय पत्र लेने की बेचैनी। चुनाव चिह्न के लिए कई बार कार्यालय का चक्कर लगाना पड़ा। लेकिन अभ्यर्थी परिचय पत्र के लिए सबसे ज्यादा हड़बड़ी थी। इस दौरान कई तरह की कार्रवाई पूरी करनी थी। अभ्यर्थी के लिए बना परिचय पत्र वोट के दिन मतदान केंद्रों तक जाने का अधिकार पत्र था तो यही मतगणना केंद्र में प्रवेश का अनुमति पत्र भी। इसके लिए एक फार्म बना हुआ था। इसकी दो प्रति में फोटो व अन्य आवश्यक विवरण उस में भर कर जमा करना था। एक आफिस कॉपी थी और दूसरी कॉपी उम्मीदवार को मिल जाती थी।

मतदान केंद्र पर पोलिंग एजेंट के लिए और मतगणना केंद्र पर मतगणना अभिकर्ता के लिए अलग-अलग आवेदन करना था। इसको लेकर भ्रम की स्थिति थी। हमें पता था कि पोलिंग एजेंट और मतगणना अभिकर्ता के लिए परिचय पत्र बीडीओ कार्यालय से ही बनता था। लेकिन प्रखंड कार्यालय में पता करने पर जानकारी मिली कि पोलिंग एजेंट पोलिंग बूथ पर पीठासीन पदाधिकारी उम्मीदवार की अनुशंसा पर बनाते हैं। एक बूथ पर एक उम्मीदवार के दो एजेंट हो सकते थे। हमने तय कर लिया था कि हमें कोई पोलिंग एजेंट नहीं रखना है। सो इस चिंता से मैं मुक्त था। मुझे मतगणना एजेंट भी नहीं रखना था।

दोनों प्रकार के एजेंट रखने के लिए कई कागजी प्रक्रियाओं को पूरा करना था। इससे मैं अपने-आप को अलग रखना चाहता था। इसकी वजह भी थी। न तो मैं किसी ग्रामीण को करीब से जानता था और न उनके किसी आपराधिक रिकार्ड को। अगर मतदान या मतगणना के दौरान ऐसे एजेंटों द्वारा कोई गैरकानूनी कार्य किया जाता है तो उसकी जिम्मेवारी सीधे तौर मेरे ऊपर आती। हमारे प्रस्तावक के नाम से धारा 106 के तहत कार्रवाई की गई थी। उन्हें कोर्ट से जमानत लेना पड़ा था। उनका कोर्ट खर्च भी हमें ही भरना पड़ा था। इस कारण हम ऐसे पचड़े नहीं पड़ना चाह रहे थे।

मनोज सिंह के भाई सरोज सिंह ने काउंटिंग एजेंट बनाने का जोर मुझ पर डाल रहे थे। लेकिन मैंने मना कर दिया कि हम अपना कोई एजेंट नहीं बनाएंगे। उनका कहना था कि उनके किसी करीबी को हम अपने कोटे में एजेंट बना दें। लेकिन मुझे ऐसा करना जोखिम भरा लगा। मैंने उन्हें भरोसा दिलाया कि मतगणना केंद्र के अंदर हर प्रकार का सहयोग हम आपके उम्मीदवार का करेंगे।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए कर सकते हैं.


इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा

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