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वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (तेईस) : अकेला चला था, अकेला रह गया

नामांकन के दिन घर से अकेला निकला था। उम्मीद थी कारवां बनता जाएगा। लेकिन मतगणना तक अकेला ही रह गया। इसे हम अपनी मजबूरी कह सकते हैं। राजनीतिक विवशता कह सकते हैं। भीड़ का भय कह सकते हैं। खर्चे को सीमित करने का प्रयास कह सकते हैं।

नामांकन के दिन घर से अकेला निकला था। उम्मीद थी कारवां बनता जाएगा। लेकिन मतगणना तक अकेला ही रह गया। इसे हम अपनी मजबूरी कह सकते हैं। राजनीतिक विवशता कह सकते हैं। भीड़ का भय कह सकते हैं। खर्चे को सीमित करने का प्रयास कह सकते हैं।

नामांकन के पहले से ही जनसंपर्क का सिलसिला शुरू था। हम सोचते थे कि नामांकन के दिन खरांटी के जगतपति के शहीद स्थल पर एक सभा करेंगे और वहीं से लोगों के साथ नामांकन के लिए प्रखंड कार्यालय तक जाएंगे। लेकिन सभा करने का साहस मैं नहीं जुटा पाया। इसकी कई वजह थी। पहली वजह यह थी कि सप्ताह में मैं सिर्फ एक ही दिन जनसंपर्क कर पाता था, जबकि किसी भी सभा के लिए जमकर लोगों के बीच अभियान चलाना पड़ता। फिर सभा के लिए खर्चे यानी कुर्सी, दरी, माईक के साथ नाश्ता-पानी का खर्चा भी उठाना पड़ता। इस तरह के किसी खर्चे के लिए मैं तैयार नहीं था। ऐसे काम के लिए कार्यकर्ताओं की एक टीम चाहिए थी, जो मेरे पास नहीं थी। इस कारण नामांकन के पहले सभा की सोच को कल्पना से आगे नहीं बढ़ने दिया।

चुनाव प्रचार के दौरान भीड़ इकट्ठा नहीं कर पाता था। साथ घूमने और प्रचार करने वालों के लिए दिन भर के खर्चे पानी की भी व्यवस्था उम्मीदवार को ही करनी पड़ती है। शाम को पीने-खाने के लिए भी इंतजाम करना पड़ता है। मैं तो खुद दूसरों के घर खाना मांग कर खाता था, तो प्रचारकों को कहां से खाने-पीने और पीने-खाने की व्यवस्था करता। अकेले घूमने की एक वहज और थी। अकेले किसी के दरवाजे पर पहुंच जाता था। अगर घर में पुरुष हैं तो उनसे बातचीत की और यदि पुरुष नहीं हैं तो महिलाओं को भी दरवाजे पर बुलाकर अपना परिचय देकर वोट देने का आग्रह कर लेता था। महिलाओं से नाश्ता-पानी या खाना मांगने में भी कोई कोताही नहीं करता था।

मेरा मानना था कि जहां भूख लगे, वहीं मांग कर खा लो। इस का एक बढ़िया असर हुआ कि वोटरों से घरेलू संबंध बन जाता था। वोट मिले या न मिले, सम्मान भाव जरूर मिल जाता था। किसी भी घर के दरवाजे पर ओटा पर बैठ कर, कुर्सी मंगाकर या खड़े-खड़े भी पर्ची काटने का काम शुरू कर देता था। कई बार महिलाएं ही दूसरे घरों में जाकर मेरा परिचय कराती थीं। आसपास के घरों का पर्चा भी कटवा लेती थीं। इस दौरान पारिवारिक स्थिति का भी पता चल जाता था।

साधन विहीन उम्मीदवार के साथ भीड़ होने के अपने खतरे भी हैं। साथ चलने वाला हर आदमी आपसे हर जगह पर उम्मीद रखता है। पान से लेकर सिगरेट आपके ही कोटे में डालना चाहता है। गांजा का दम भरने वाले भी पुड़िया की व्यवस्था चाहते हैं। साथ चलने वाला हर व्यक्ति आपके ऊपर बोझ होता है। हालांकि वोटरों पर उसका असर भी पड़ता है। कुछ उम्मीदवार थे, जिनके साथ छह-आठ लोग जरूर होते थे। कुछ ऐसे भी थे, जो हमारे समान अकेले ही प्रचार में जुटे हुए थे। समर्थकों के बोझ ढोने वाले उम्मीदवारों की कमी नहीं थी।

कई बार वोटरों ने मुझसे पूछा भी कि आप अकेले ही क्यों घूम रहे हैं। मैं उन्हें बतलाया कि इसके कई फायदे हैं। साथ घूमने वाले आपके लिए वोट की गारंटी नहीं दे सकते थे। अकेले होने के कारण किसी के दरवाजे पर भी जाकर आप बातचीत कर सकते हैं। लेकिन आपके साथ भीड़ होगी तो कोई महिला आप से बात करने के लिए दरवाजे से बाहर नहीं आएगी। इसके साथ ही अनावश्यक खर्चे भी नहीं उठाना पड़ता है।

मतगणना के दिन भी हम अकेले ही थे। मतगणना केंद्र दाउदनगर ट्रेनिंग कॉलेज के परिसर में सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था थी। तीन पंचायतों की मतगणना हो रही थी। पहली मतगणना करमा पंचायत की हुई। दूसरी बारी बभनडीहा की थी और अंतिम बारी सोनहथु  पंचायत की थी। उम्मीदवारों के साथ उनके समर्थकों की भीड़ दाउदनगर-गया रोड पर लगी थी। हर उम्मीदवार के साथ उनके समर्थक थे। मतगणना हॉल में भी हम अकेले ही थे। एक उम्मीदवार के साथ एक मतगणना एजेंट रखने की व्यवस्था थी। लेकिन मैंने कोई एजेंट नहीं रखा था।

पूरे चुनाव के दौरान मैंने यह कोशिश की कि जिस मुहल्ले में जाएं, वहीं के किसी व्यक्ति को साथ लें और लोगों से जनसंपर्क करें। यह प्रयास भी सार्थक नहीं हुआ। कहीं-कहीं कोई युवक मिल गया तो ठीक है, अन्यथा इस दरवाजे से उसे दरवाजे, इस गांव से उस गांव अकेले ही दौड़ता रहा। यदाकदा बस का भी सहारा लिया और किसी मोटरसाइकिल वाले से लिफ्ट भी ली। कभी-कभार अपने साला संजय को साथ रखता था, वह भी तब, जब मोटरसाइकिल की आवश्यकता महसूस करता था। चुनाव को लेकर कारवां बनने की उम्मीद थी, लेकिन अकेला ही रह गया।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए कर सकते हैं.


इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा

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