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वह अपनी उम्र के लड़कों के साथ सेक्स करना चाहती है, न कि बड़े उम्र के मर्दों के साथ

आज 26 अप्रेल, 2013 को मैं अपने परिचत के यहॉं पर बैठा था। कुछ पल के लिये मैं वहॉं पर अकेला हुआ तो एक लड़की मेरे पास आयी। मुझ से नमस्ते किया। पूछा ‘‘सर क्या आप डॉक्टर हैं?’’ मैंने कहा ‘‘हॉं’’, वह बोली ‘‘सर मेरी बीमारी का इलाज करें। मैं बहुत परेशान हूँ।’’

आज 26 अप्रेल, 2013 को मैं अपने परिचत के यहॉं पर बैठा था। कुछ पल के लिये मैं वहॉं पर अकेला हुआ तो एक लड़की मेरे पास आयी। मुझ से नमस्ते किया। पूछा ‘‘सर क्या आप डॉक्टर हैं?’’ मैंने कहा ‘‘हॉं’’, वह बोली ‘‘सर मेरी बीमारी का इलाज करें। मैं बहुत परेशान हूँ।’’

इतने में वे महाशय जिनके यहॉं पर मैं गया था, प्रकट हो गये। मैंने उनसे पूछा कि ‘‘ये बच्ची किसकी है? ये बच्ची अपनी किसी बीमारी के बारे में बात कर रही है। इसे क्या तकलीफ है?’’ इस पर उन्होंने बताया कि ‘‘पड़ोस के मकान में रहने वाले किरायेदार की बेटी है, लेकिन मुझे नहीं पता इसे क्या तकलीफ है……।’’

इतना कहने के बाद वे उस लड़की की ओर मुखातिब होकर बोले, ‘‘क्यों बेटी तुम्हें क्या तकलीफ है, तुम्हारे पापा को बुला लाओ डॉक्टर साहब को दिखा देंगे।’’ इस पर लड़की ने कहा, ‘‘नहीं अंकल नहीं, कोई बात नहीं….!’’ लड़की के चेहरे के हावभाव देखकर मुझे कुछ संशय हुआ तो मैंने अपने मित्र से इशारे में अन्दर जाने को कहा।

उनके जाते ही लड़की बोली, ‘‘डॉक्टर साहब आपने तो मरवाया होता, अंकल से बोलने की क्या जरूरत थी। मेरी ऐसी व्यक्तिगत समस्या है, जिसके बारे में, मैं मेरे पापा और इन अंकल के सामने आपको कुछ नहीं बता सकती। यदि आप मेरा इलाज कर सकते हैं और मेरी तकलीफ के बारे में किसी को कुछ नहीं बतलायें तो मैं आपका बतलाऊं, नहीं तो रहने दो…।’’

लड़की की बात सुनकर मुझे चिन्ता हुई कि लड़की कहीं कोई मुसीबत में तो नहीं है, सो मैंने उसे विश्‍वास दिलाया और अपनी समस्या बताने को कहा, लेकिन जो कुछ उसने बताया, वह एक सदमें से कम नहीं था। विशेषकर इसलिये कि लड़की की शक्ल-ओ-सूरत देखकर कोई सोच भी नहीं सकता कि वह लड़की किसी से ऐसी बात कह सकती है।

लड़की का वजन मुश्किल से 30-35 किलो, लम्बाई करीब पौने पांच फिट, रंग एकदम गौरा, बदन बहुत पतला, नाक-नक्श औसत से अच्छे और दिखने में बेहद कमजोर और कक्षा आठ की छात्रा है। लड़की ने अपनी समस्या के बारे में जो कुछ बतलाया, उसका सार संक्षेप इस प्रकार है-

सर मैं हैल्दी होना चाहती हूँ। मैं 14 साल की हो गयी, लेकिन अभी भी मैं बच्ची जैसी दिखती हूँ, जबकि मेरे साथ पढने वाली दूसरी लड़कियॉं अच्छी-खासी दिखती हैं। आगे से मुझसे कोई बात ही नहीं करता। जब मैं किसी लड़के से बात करती हूँ तो वो मुझे बच्ची समझकर इगनोर-अनदेखा कर देता है और उम्र में मुझसे छोटी और काले रंग की दूसरी हैल्दी लड़कियों में इंट्रेस्ट लेने लगता है।

सर मैं चाहती हूँ कि मेरे स्तन इतने बड़े-बड़े हों जायें कि कोई भी लड़का देखते ही मेरी ओर झट से आकर्षित हो जाये। मैंने उसे कहा कि वह सच में ही अभी बच्ची ही तो है और 14 वर्ष की उम्र में तुम खुद को इतनी बड़ी क्यों समझती हो?

इस पर उसने बताया कि उसके स्कूल की 12 साल से 14 साल तक की तकरीबन सभी लड़कियॉं अपनी-अपनी कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों या अपने पड़ोस के किसी न किसी लड़के से सेक्स करती हैं। सबके अनेक बॉय फ्रेंड हैं। कुछ तो अपने टीचर या किसी रिश्तेदार के साथ ही सेक्स करती हैं। उसने बताया कि उसके भी दो-तीन बॉय फ्रेंड हैं, लेकिन वे उसके बजाय दूसरी लड़कियों में अधिक रुचि लेने लगे हैं। इसलिये वो अच्छी तन्दुरुस्त और ताजा दिखना चाहती है। जिससे कोई भी लड़का देखते ही उसकी ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रहे। विशेषकर वह चाहती है कि उसके स्तनों का आकार इतना बड़ा हो जाये कि कोई भी लड़का उसे देखते ही लट्टू हो जाये।

मैंने उससे फिर से पूछा कि ऐसा वह क्यों चाहती है। उसने उल्टा मुझसे ही सवाल किया कि जब सारी लड़कियॉं मजे लेती हैं तो मैं ऐसा क्यों नहीं करूँ? उसने बताया कि दो वर्ष पहले उसके साथ सबसे पहले उसके चाचा ने सेक्स किया, जो अब नौकरी पर दूसरे शहर में रहते हैं। ऐसे में उसकी सेक्स करने की तेज इच्छा होती है। पड़ोस के लड़के और साथ पढने वाले लड़के उसे घास नहीं डालते। ऐसे में वह एक 50-55 साल के अपने पास के मकान में रहने वाले किरायेदार के साथ सेक्स करके अपना काम चलाती है।

उसने बताया कि वह अपनी उम्र के लड़कों के साथ सेक्स करने की तमन्ना रखती है, न कि अपने पिता से बड़ी उम्र के मर्दों के साथ, लेकिन उसे अपनी उम्र के लड़के बच्ची समझते हैं। लड़कों की नजर में बड़ी दिखने के लिये वह दो-दो ब्रा पहनती है, लेकिन फिर भी कुछ मतलब नहीं निकलता….!

सारी बात जानकर मैं स्तब्ध रह गया। एक ओर तो देश सेक्स जनित मामलों के विकृततम रूप बलात्कार की विभीषिका से जूझ रहा है, दूसरी ओर हमारे देश की कमशिन-किशारियों की ये मनोदशा है! क्या यह स्थिति हम सबके लिये अत्यधिक चिन्ताजनक नहीं है? इस विषय पर अपने विचार अधिक प्रकट करने के बजाय मैं समाज के इस कड़वे सच को प्रबुद्ध लोगों के सामने रखना अधिक उचित समझता हूँ। जिससे कि हम समाज के इस रूप को भी ध्यान में रखें और इस बारे में समुचित निर्णय ले सकें।

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ होम्योपैथ डॉक्टर, संपादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), नेशनल चेयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एंड रायटर्स वेलफेयर एशोसिएशन और राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) से जुड़े हुए हैं.

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