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आखिर यह हमारा कैसा चेहरा है?

मैं पाँच वर्षीय बेटी का पिता, एक अच्छी पत्नी का पति और बचपन में माँ की गोद से वंचित इसी समाज का एक पुरुष हूँ जो आम आदमी की भाँति बेचैन है। डरा सहमा अपने समाज के नित नए चेहरे और कारनामों को देखकर डरता रहता है। सहमता रहता है। अपनी बिटिया की सुरक्षा के साथ गुजरते दिनों की दरिन्दगी, बहशीपन और अमानवता से परेशान हूँ। कभी समाचार पत्रों और खबरों के चैनलों के एक कोने में सिमटी यह भयावह खबरें आज समाचार पत्रों की मुख्य पृष्ठ और चैनलों की ब्रेक्रिंग समाचार बन रही हैं।

मैं पाँच वर्षीय बेटी का पिता, एक अच्छी पत्नी का पति और बचपन में माँ की गोद से वंचित इसी समाज का एक पुरुष हूँ जो आम आदमी की भाँति बेचैन है। डरा सहमा अपने समाज के नित नए चेहरे और कारनामों को देखकर डरता रहता है। सहमता रहता है। अपनी बिटिया की सुरक्षा के साथ गुजरते दिनों की दरिन्दगी, बहशीपन और अमानवता से परेशान हूँ। कभी समाचार पत्रों और खबरों के चैनलों के एक कोने में सिमटी यह भयावह खबरें आज समाचार पत्रों की मुख्य पृष्ठ और चैनलों की ब्रेक्रिंग समाचार बन रही हैं।

अपहरण, बलात्कार, बलात्कार का प्रयास और बलात्कार के पश्चात हैवानियत ने सब को परेशान और हैरान कर दिया है। अब तो दरिन्दगी और हैवानियत के लिऐ प्रतिस्पर्धा का दौर चल रहा है कि कौन कितना हैवानियत और क्रूरता करता है और इस क्रूरता और दरिंदगी में हमने अबोध और फरिश्‍ते समान नादान को भी नहीं बख्शा है। आखिर यह हमारा कौन सा चेहरा है? और यह दरिंदगी कहां जा कर रूकेगी? इसका जिम्मेवार कौन है? सरकार, कानून, पुलिस या फिर हमारा समाज?

निस्संदेह यह भारत में हो रहे क्रांतिकारी बदलाव से पूर्व की उथलपुथल है और परिवर्तन के पूर्व का हलचल और कोलाहल है। आर्थिक उन्नति और विकास के साथ समाज, व्यवस्था ही नहीं अर्थात हम सब वर्तमान परिस्थिति के लिए जिम्मेवार हैं और सभी को अपनी भूल स्वीकारनी चाहिऐ। संसद में रोने से, संवदेना प्रकट करने और भावुक होने से! व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश व्यक्त करने से समस्याओं का समाधन नहीं निकलने वाला। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सत्यता को स्वीकार करना चाहिऐ। सरकार, समाज और मीडिया का रोल निष्ठावन और कर्तव्‍य के पालन करने वाला होना चाहिऐ। साथ ही साथ इन्हें गंभीरता ओर परिपक्वता अब दिखनी चाहिए।

सरकार ने भविष्य के दूरगामी योजनाओं पर समझारों, जानकारों और पढ़े लिखों की टीम नहीं बनाई। शोध का विस्तार सभी स्तरों पर नहीं हुआ। सरकार ने प्रगति के सभी मार्गों पर संतुलन बनाने का काम नहीं किया। अगर कुछ कदम उठाऐ भी गऐ तो पक्षपात और भेदभाव ने संवेदना और प्रतिभाओं को पीछे छोड़ दिया। देश और समाज उफंच-नीच, असमानताओं के भँवर में फंसता गया। अमीरी और गरीबी में खाई बढ़ती गई। अमीर और अमीर और गरीब और गरीब होते गऐ। कम होते रोजगार, रोजगार के लिऐ पलायन, पेट पालने के लिए परिवार और अपनों से जुदा होने मानसिक तनाव। बदलते परिवेश में एक वर्ग विशेष के रहन सहन ओर पहनावा ने दूसरे वर्ग में कुंठा को जन्म दिया है। साथ ही साथ हमारे राजनीति दलों का रवैया। पुलिस और नौकरशाही की कम होती जिम्मेवादी और बढ़ते भ्रष्टाचार की ओर कदम ने हमें आज इस मुकाम तक पहुंचा दिया है।

महिलाओं, बच्चों और कमजोरों पर हो रहे अत्याचार का यह कोई पहला और आखरी वारदात नहीं है। कभी इसका अनुपात बढ़ता और कभी घटता दिखाई पड़ता है। कहीं इसके विरोध में अधिक आवाज तो कहीं अनेकों ओर से आवाज सुनाई पड़ती है। कहीं इस प्रकार के बर्बरता की कोई सुध लेने वाला नहीं और संसाधन और पिछड़ा इलाका होने, मीडिया और स्वयंसेवकों की कमी में दर्द की आवाज मंद मंद की गुहार लगाता लगाता शांत हो जाता है।

दिल्ली में दो दर्द मिले! यूं तो प्रतिदिन और प्रति घण्टा मिलने वाला यह दर्द दुखद और असहनीय है। कोई दर्द अधिक विचलित कर देने वाला है तो कोई मन को कष्ट देने वाला होता है। मगर इस कष्ट की घड़ी में पुलिस और व्यवस्था की ओर से बेरूखी और अध्कि असंतोष पैदा करने वाला और अपनी व्यवस्था और सरकार के उपर से भरोसा उठाने वाला है। दुख और विलाप के इस क्षण में मरहम के बदले बेइंतहाई दुख के इस घाव को और गहरा कर देता है। तब संसद, न्यायालय, राजनीति दलों और पुलिस की ओर से किया गया हर वादा धोखा लगने लगता है और इसी जख्म को न सहते हुए पिछली घटनाओं पर रिपोर्ट सौंपने वाले पूर्व न्यायाधीश इस जालिम समाज और व्यवस्था के सामने हार मान लेते हैं। वह जालिमों से जिस सजा की उम्मीद ओर आशा लगाए बैठे थे। शायद उन्हें अब उसमें उन्हें जरा भी विश्वास नहीं रहा और वह निराश होकर दुनिया छोड़ गये।

मैंने कभी अपने माँ के ममता की आँचल का सुख नहीं भोगा। उनकी पालने वाली गोद में मिट्ठी नींद का मजा तक नहीं लिया। उनके कलेजे से चिपट कर माँ की ओर से प्राकृति स्पर्श का एहसास नहीं महसूस किया। वही एहसास जो पांच वर्षीय फरीश्‍ता को सीने से चिपटा कर उस कामकाजी परिवार को होता होगा। आज जीवन के लिऐ संघर्ष कर रही नन्हीं आखिर किसी समाज वर्ग अथवा क्षेत्र वालों का क्या बिगाड़ा था? हवस और शराब की दरिन्दगी ने उसे इतना अंधा न किया होता और अपनों की भाँति, अपनों की तरह उस परी को बाप की तरह, भाई की तरह मानव की तरह अपने सीने से लगाया होता। राक्षस तुम्हें और तुम्हारे मन को एक ऐसा एहसास और कभी न भुलाने वाला सुख देता। जो तुम्हारे आत्मा और शरीर को पाप का नहीं शुद्धी का मरहम देता।

कठिन फैसले और कठोर कदम तो उठाने ही होंगे। कानून बनाने से लेकर कानून का पालन। कानून का दुरुपयोग! पुलिस और न्यायालय का रोल भी सामने रखना होगा। पिछली घटनाओं के बाद जो कदम उठाने चाहिऐ थे। वह नहीं उठाऐ गऐ। आलोचनाओं से डर कर, घबराकर सरकार ने एक कदम आगे बढ़ा कर दो कदम पीछे हट गई। आलोचकों और विरोध उत्पन्न करने वालों के साथ विपक्ष का रवैया भी मौजूदा परिस्थति को जन्म देने में सहायक और घटना को पुनरावृत्ति करने से न रोकने वाला रहा। पिछली घटना के बाद महिलाओं के लिए आन्दोलन, महिलाओं के हक में आवाज बुलंद करने, महिलाओं के नाम पर व्यापार चलाने। महिलाओं की रक्षा करने पर हवा बनाने का प्रयास ही हुआ। महिला बैकिंग, महिलाओं के लिऐ सुरक्षित राजधनी और समस्त देश कम से कम अभी तो नहीं दिखाई पड़ता। जब मैं लेख लिख रहा हूं। मेरे मन में एक चिंता और डर है कि मेरी बेटी के स्कूल जाने और घर लौटने पर, बस के चालक और सहचालक के नीयत पर। उसके स्कूल के कर्मचारियों और वापस घर की चौखट से पहले कालोनी में बैठे लोगों और उनकी गतिविधियों पर नजरें जमाऐ है। मैं तो कम से कम बेखौफ देश की राजधनी में नहीं हूँ। जैसे देश के प्रधनमंत्री, दिल्ली की मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के घर में भी पुत्री हैं और पहली घटना पर उन्होंने भी अपना डर हमें बता दिया था। अब भय और सभ्य समाज के नवनिर्माण की जिम्मेवादी और गारन्टी आखिर कौन लेगा?

लेखक फखरे आलम पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 9910921624 के जरिए किया जा सकता है. 

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