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चीन ने आखिरकार यह घुसपैठ क्‍यों की है?

चीन गज़ब का पैंतरेबाज मुल्क है| एक ओर वह भव्य और गरिमामय महाशक्ति का आचरण करते हुए दिखाई देना चाहता है और दूसरी ओर वह ओछी छेड़खनियों से बाज नहीं आता| अभी 15 अप्रैल को उसकी फौज ने सीमांत के दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में घुसकर अपने तंबू खड़े कर दिए हैं| वे ​नियंत्रण-रेखा के पार भारतीय सीमा में 10 किमी तक अंदर घुस आए हैं| लगभग ऐसा ही उन्होंने जून 1986 में सोमदोरोंग चू में किया था| वहां से उन्होंने 1995 में अपने आप वापसी करके भारत को प्रसन्न कर दिया था|

चीन गज़ब का पैंतरेबाज मुल्क है| एक ओर वह भव्य और गरिमामय महाशक्ति का आचरण करते हुए दिखाई देना चाहता है और दूसरी ओर वह ओछी छेड़खनियों से बाज नहीं आता| अभी 15 अप्रैल को उसकी फौज ने सीमांत के दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में घुसकर अपने तंबू खड़े कर दिए हैं| वे ​नियंत्रण-रेखा के पार भारतीय सीमा में 10 किमी तक अंदर घुस आए हैं| लगभग ऐसा ही उन्होंने जून 1986 में सोमदोरोंग चू में किया था| वहां से उन्होंने 1995 में अपने आप वापसी करके भारत को प्रसन्न कर दिया था|

वास्तव में भारत-चीन सीमा चार हजार कि.मी. से भी ज्यादा लंबी है| उसमें जंगल, पहाड़, झरने नदियां, झीलें तथा अनेक अबूझ क्षेत्र हैं| यह पता ही नहीं चलता कि कौनसी जगह चीनी है और कौनसी भारतीय? नियंत्रण-रेखा भी अनेक स्थानों पर अंदाज से ही जानी और मानी जाती है| ऐसी स्थिति में दोनों ओर से नियत्रंण-रेखा का उल्लंघन आसानी से होता रहता है| जान-बूझकर भी होता ही होगा लेकिन अक्सर दूसरे पक्ष को आपत्ति होने पर पहला पक्ष अपनी जगह वापस लौट जाता है लेकिन इस बार चीनी फौज पिछले 10-12 दिनों से भारतीय सीमा क्षेत्र में ऐसे जम गई है, जैसे कि वह सोमदोरोंग चू में जम गई थी| दो बार दोनों पक्षों के अफसरों की बैठक भी हो गई है लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला| चीनी सरकार के प्रवक्ता का कहना है कि उन्होंने नियंत्रण-रेखा का कहीं कोई उल्लंघन नहीं किया है| उनके तंबू उनकी सीमा में लगाए गए हैं| उन्हें हटाने का प्रश्न ही नहीं उठता|

चीनी फौज या सरकार के प्रवक्ता यह बताने की स्थिति में नहीं है कि आखिर यह घुसपैठ उन्होंने क्यों की है? यह घुसपैठ बड़े नाजुक वक्त में की गई है| हमारे रक्षा मंत्री ए के एंटनी की चीन-यात्रा और चीनी प्रधानमंत्री सी केकियांग की भारत-यात्रा की तैयारियां जोरों से चल रही हैं| यदि घुसपैठ का यह मामला तूल पकड़ ले तो दोनों यात्राएं रद्द हो सकती हैं और दोनों देशों के बीच मनमुटाव हो सकता है| चीन को इसी वक्त ऐसी क्या आ पड़ी थी कि उसने यह उत्तेजक कार्रवाई कर डाली?

चीनी फौज यों तो चीनी कम्युनिष्ट पार्टी के नियंत्रण में रहती है| वह पाकिस्तानी फौज की तरह पूर्ण स्वायत्त नहीं है लेकिन फिर भी वह भारतीय फौज की तरह आज्ञाकारी भी नहीं है| चीनी फौज शायद अपने नए प्रधानमंत्री को चीनी कूटनीति का पुराना पैतरा सिखाना चाहती है याने किसी पराए देश के साथ दोस्ती जरूर बघारिए लेकिन उसके गले मिलते वक्त उसकी चिकौटी जरुर काट लीजिए| उसे बता दीजिए कि आपके मुंह में राम है लेकिन बगल में छुरी भी है| चीनी प्रधानमंत्री की भारत-यात्रा के पहले फेंके गए इस पासे से तय हो जाएगा कि भारत को चीन की कितनी गर्ज है? अगर भारत को गर्ज है तो वह इस बदसलूकी को भी बर्दाश्त कर लेगा|

चीनी फौज का दूसरा मंतव्य अपने नये और अपेक्षाकृत युवा प्रधानमंत्री को यह संकेत देना भी हो सकता है कि पड़ोसियों के साथ बहुत नरमी से पेश आना भी ठीक नहीं है| चीनी नेतृत्व साम्यवादी है लेकिन चीनी फौज तो उग्र राष्ट्रवादी है| उसने भारत से ही नहीं, अपने लगभग दर्जन भर पड़ोसी देशों से पंजे भिड़ा रखे हैं| जापान, वियतनाम, फिलीपींस, ताइवान, कोरिया, मलेशिया, रुस आदि कौनसा ऐसा देश है, जिससे उसका सीमा-विवाद नहीं है? सिर्फ दो देशों से उसके सीमा विवाद सुलझे हुए हैं पाकिस्तान और बर्मा! क्योंकि ये भारत के पड़ोसी हैं|

यह ठीक है कि चीन साम्यवादी देश होते हुए भी तंग श्याओ फिंग के नेतृत्व में एक महाजन राष्ट्र बन गया है और महाजनों का ध्यान पैसा बनाने में लगा होता है| वे लड़ाई-झगड़ों में विश्वास नहीं करते लेकिन चीनी फौज महाजन नहीं है| उसने जितने लंबे युद्ध लड़े हैं, दुनिया की किसी फौज ने भी नहीं लड़े हैं| फौज की नीति की उपेक्षा करना चीनी नेताओं के बस की बात नहीं है| चीनी फौज और चीनी कूटनीति का चोली-दामन का साथ है| इसीलिए हम देखते हैं कि जब 2006 में चीनी राष्ट्रपति हू जिनताओ भारत आए तो उसके पहले चीनी राजदूत ने कह दिया कि सारा अरुणाचाल प्रदेश ही चीन का है| इसी प्रकार 2010 में प्रधानमंत्री विन च्या पाओ की भारत-यात्र के पहले चीन ने वीज़ा-विवाद खड़ा कर दिया था| भारत के कश्मीरी नागरिकों को उनके पासपोर्ट पर नहीं, अलग कागज़ पर वीज़ा दिया जाने लगा था| यह विवाद भी बाद में चीन ने स्वत: हल कर लिया|

इस तरह से अचानक विवाद खड़े करना और उन्हें सुलझाने के प्रपंच को क्या कहा जाए? यह किसी सोची समझी नीति के अन्तर्गत किया जाता है या यह सब प्रशासनिक अराजकता का परिणाम है? इसे प्रशासनिक अराजकता तो हम तब कह सकते थे जबकि चीन की केंद्रीय सरकार या फौज के प्रवक्ता इन मामलों से अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते| वे तो उल्टे इन अटपटे कदमों का पेइचिंग से समर्थन करते हैं| अभी-अभी पेइचिंग ने कहा है कि दौलत बेग ओल्डी में चीन ने तंबू इसलिए गाड़े हैं कि भारत ने पूर्वी लद्दाख के विवादित क्षेत्र् में सीमेंट-कांक्रीट के स्थायी बंकर बना लिये हैं| हटें तो दोनों साथ हटें|

इसमें शक नहीं है कि इन तात्कालिक उत्तेजनाओं को विस्फोटक रुप देना उचित नहीं है लेकिन भारत को जरुरत से ज्यादा नरमी दिखाने की भी जरुरत नहीं है| यदि आज चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है तो गर्ज उसकी भी है और कम नहीं है| भारत से ज्यादा सस्ता कच्चा लोहा उसे और कहां से मिल सकता है? चीन को यह भी समझना चाहिए कि भारत कितना जिम्मेदार देश है कि वह अमेरिका की चीन-विरोधी किलेबंदी में शामिल नहीं हो रहा है| अफगानिस्तान से अगले साल अमेरिका की वापसी के बाद की स्थिति पर आखिर भारत चीन से बात क्यों कर रहा है? एशिया की राजनीति में चीन को भारत उचित महत्व दे रहा है| ऐसी स्थिति में चीन भारत के साथ गरिमापूर्ण बर्ताव करने में बार-बार क्यों चूक जाता है? डर यही है कि भारत-चीन संबंधों के सहज विकास पर ये छोटी-मोटी चिकौटियां कभी भारी न पड़ जाएं| चीन एक स्वयंसिद्ध महाशक्ति है और एक महान सभ्यता का संवाहक राष्ट्र है| तुच्छ पैंतरेबाजियां उसे शोभा नहीं देतीं|

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्‍ठ पत्रकार तथा स्‍तंभकार हैं.

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