ओहदा
——-
इंसानियत नहीं बदलती,
समय कैसा भी हो,
कैसे मचलते है रहनुमा,वजीर -प्यादे,
बस! दिख जाए पैसा, कैसा भी हो,
दिने इलाही राम ने मर्यादा रखी,
बने रहे पुरषोत्तम -समय कैसा भी हो,
इम्तिहान खुदा उसी का लेता है,
जो नेकी ओ अख़लाक़ से वाबास्ता रहे, समय कैसा भी हो ,
बाज़ अफराद फरिशते से होते है, इंसानियत की खिदमत करते है
फिर चाहे ओहदा कैसा भी हो,
क्या फर्क पड़ता है,
समय कैसा भी हो,
तवाइफो ने निकाले ताजिये,वो शिदत से बंदगी में मुब्तला,
खुदा तो इबादत में पाकीजगी देखता है,
क्या फरक पड़ता है,
पेशा कैसा भी हो!
नवाजिश.
कवि और पत्रकार नारायण बारेठ वर्तमान में एशियन एज से जुड़े हुए हैं. बीबीसी में भी उन्होंने अपनी सेवा दे चुके हैं.





