पंचायतवासियों के साथ निकटमत व बेहतर संबंध बनाए रखने के लिए मैंने एक रणनीति बना रखी थी। पंचायत को जाननेवाले या बभनडीहा पंचायत के चुनाव में रुचि रखने वाले लोगों की एक टीम भी बना रखी थी। इसके साथ चुनावी प्रक्रिया को लेकर जानकारी रखने वाले लोगों को जोड़े रखा था। ऐसे लोगों में कई लोग ओबरा के थे तो कुछ आपसपास के गांवों के भी। इस संबंध में सबसे अधिक जानकार और पुराने राजनीतिज्ञ थे राजीव रंजन सिन्हा। ओबरा के निवासी हैं। वे लोकसभा और विधान सभा के चुनाव भी कई बार लड़ चुके हैं। 1974 आंदोलन के दौरान कर्पूरी ठाकुर के करीबी लोगों में थे और औरंगाबाद की राजनीति में अपनी खास पकड़ रखते थे।
समय ने उनका साथ नहीं दिया। इस कारण लोकसभा या विधान सभा तक नहीं पहुंच पाए। हालांकि औरंगाबाद जिला परिषद में प्रतिनिधित्व करने का उन्हें मौका मिला। जनता के इस विश्वास को वह अपनी पूंजी मानते हैं। बभनडीहा पंचायत से चुनाव लड़ने की रुचि के संबंध में उन्हें मैंने जानकारी दी थी और उन्होंने इस संबंध में उचित व सार्थक सुझाव व मार्गदर्शन भी दिए।
ओबरा की राजनीति में सक्रिय हैं इंदल यादव। राजद के कार्यकर्ता हैं। राजद का प्रखंड कार्यालय भी उनके ही मकान में है। उनकी स्थानीय राजनीति में अच्छी पकड़ भी है। कुराईपुर के यादवों का भी उनके घर पर आना-जाना था। इंदल यादव से हमें स्थानीय व ग्रामीण समीकरणों के संबंध में काफी जानकारी मिल जाती थी। दाउदनगर के रहने वाले हैं ओम प्रकाश। पत्रकार हैं। इस कारण प्रखंड व अनुमंडल कार्यालय के अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ अच्छा संबंध है। चुनाव से जुड़ी किसी भी प्रशासनिक जानकारी के सोर्स वही थे।
चुनाव को लेकर कई मामलों में दुविधा बनी रहती थी। चुनाव से जुड़ा एक शब्द था एनआर। एनआर कटवाना पड़ता था। लेकिन एनआर होता है, यह मुझे जानकारी नहीं थी। इस संबंध में ओम प्रकाश को फोन किया। उन्होंने एसडीओ से पता कर बताया कि एनआर का मतलब है नाजिर रसीद। चुनाव लड़ने के लिए एक राशि निर्धारित होती है। सामान्य वर्ग के लिए एक हजार रुपया है। महिला, अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए अलग-अलग निर्धारित है। इस निर्धारित राशि को नाजिर के पास जमा करके रसीद कटवाना पड़ता है। इसे ही नाजिर रसीद कहते हैं। नामांकन पत्र के साथ नाजिर रसीद भी जमा संलग्न करना पड़ता है। मतदान को लेकर भी दुविधा थी कि इवीएम से होगा या बैलेट पेपर पर। हमारा प्रखंड कार्यालय इन जानकारियों को लेकर बहुत अपडेट नहीं रहता था। इस कारण दाउदनगर के अनुमंडल कार्यालय से जानकारी लेनी पड़ती थी और इसके लिए ओम प्रकाश का सहारा लेना पड़ता था।
ओबरा में रिसोर्स पर्सन थे ब्रजेश द्विवेदी। वह पत्रकार हैं। प्रखंड कार्यालयों की सूचनाओं के लिए मुझे उनकी मदद लेनी पड़ती थी। प्रखंड स्तरीय पदाधिकारियों से संपर्क कराने में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी। प्रखंड कार्यालय के बाहर एक फोटो स्टेट मशीन की दुकान है। उपचुनाव के दौरान वह ही चुनाव कार्यालय का कैंप कार्यालय बन गया था। चुनाव से जुड़ी हर सामग्री का वही सप्लायर था। वोटर लिस्ट की कॉपी, नामांकन पत्र की कॉपी, शपथ पत्र की कॉपी, पोलिंग एजेंट के लिए फार्म की कॉपी सब उसके पास उपलब्ध रहती थी। इसका एक बड़ा फायदा उम्मीदवारों को था। सब तरह की चुनावी सामग्री वहां मिल जाती थी। चुनाव से जुड़ी जानकारी भी वह रखता था। चुनावी प्रक्रिया के बारे में भी वह जानकार था। उसकी सक्रियता का फायदा चुनाव कार्यालय को भी था। चुनाव से जुड़े अधिकारी कहते थे कि फोटो स्टेट मशीन की दुकान पर चले जाइए, वहां मिल जाएगा। व्यवहार में यह संभव नहीं था कि हर सामग्री चुनाव कार्यालय उम्मीदवारों को उपलब्ध कराए। इस कारण अधिकतर काम फोटो स्टेट मशीन के संचालक को सौंप दिया था। कई उम्मीदवारों से हमारा परिचय भी उसी फोटो स्टेट मशीन की दुकान पर हुई।

इसके अलावा ओबरा में गोपी रेडियो के संचालक, उपप्रमुख मुनारिक राम, सामाजिक कार्यकर्ता गुड्डू, पैक्स अध्यक्ष गौरी सिंह, बभनडीहा के दुर्गा प्रसाद गुप्ता, पूर्णाडीह के जर्नादन प्रसाद, खरांटी के वार्ड पार्षद शत्रुघ्न प्रजापति, तिवारी टोला के कुछ लोग थे, जो हमारे के लिए सूचनाओं के संकलन के आधार थे और उनसे काफी कुछ मदद भी मिलती थी।
(जारी)
लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए कर सकते हैं.
इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा





