पंचायत उपचुनाव में विधायक सोम प्रकाश सिंह और जिला परिषद सदस्य जूली सिन्हा की भी खूब चर्चा होती थी। इसके अलग-अलग कारण थे। बाहरी उम्मीदवार को लेकर भी चर्चा होती थी। खरांटी के तिवारी टोला में लोगों से बातचीत कर रहा था। एक व्यक्ति ने कहा कि ओबरा के विधायक बाहरी हैं, जिला परिषद की सदस्य बाहरी हैं तो मुखिया बाहरी होगा, तो क्या हो जाएगा।
ओबरा विधायक सोमप्रकाश सिंह डेहरी विधान सभा क्षेत्र (जिला रोहतास) के निवासी हैं। पहले वे ओबरा के थानाध्यक्ष थे। इस दौरान उनकी छवि ईमानदार दारोगा की थी। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई सामाजिक व शैक्षणिक कार्यक्रमों को भी चलावाये। इस कारण उनकी लोकप्रियता बढ़ती गयी। वे दारोगा की नौकरी छोड़कर विधानसभा चुनाव में उतरे तो उनकी यही छवि ताकत बन गयी। उन्होंने चुनाव में खर्चों के लिए लोगों से चंदा भी मांगा। उनकी छवि का असर था कि लोगों में चंदा भी दिया। चावल, गेहूं से लेकर पैसे तक चंदा के रूप में मिले। मैंने शुरुआती दौर में लोगों से अपील की थी कि जनता से चंदा लेकर ही चुनाव लड़ना है। इस कारण लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि आप भी सोमप्रकाश जी के तरह चंदा से चुनाव लड़ेंगे।
जिला परिषद सदस्य जूली सिन्हा ओबरा पश्चिमी से जिला परिषद सदस्य हैं। इस क्षेत्र में तेजपुरा, कंचनपुर, डिहरा, कारा, बभनडीहा व इमलौना पंचायतें आती हैं। लेकिन उनका अपना गांव इस क्षेत्र से बाहर पड़ता है। उनका चुनाव जीतना आश्चर्यजनक था। इस क्षेत्र में कायस्थों की संख्या नाममात्र की है। पूरे छह पंचायतों में दो दर्जन से अधिक घर कायस्थों के नहीं होंगे। वोटों की संख्या बमुश्किल दो सौ के आपपास होगी। पूरे चुनाव में जूली सिन्हा की प्रचार शैली की चर्चा भी होती रही थी।
प्रचार के दौरान कई बार रोचक घटनाएं भी हुर्इं। नहर से होते हुए मैं खरांटी से कुराईपुर जा रहा था। एक मोटर साइकिल वाले उसी रास्ते से जा रहे थे। मैंने हाथ दिया तो उन्होंने रोक दिया। मैं गाड़ी पर बैठ गया। गाड़ी चालू हुई। कुराईपुर की ओर बढ़े जा रहे थे। उन्होंने कहा कि कहां जाना है। मैंने कहा कि बस इसी गांव में। इतना सुनते ही वे नाराज हो गए। उन्होंने कहा कि इतनी दूरी आप पैदल नहीं चल सकते हैं। हमें लगा कि दूर जाना है, इसलिए मोटरसाइकिल पर बैठा लिया। तब तक गांव आ चुका था। मैं मोटरसाइकिल रुकवाकर उतरा और धन्यवाद कह कर आगे बढ़ लिया।
एक दिन मैं खरांटी प्राथमिक विद्यालय में चला गया। दोपहर का समय था। शिक्षक और शिक्षिकाएं कक्षा लेने में व्यस्त थीं। मैंने कहा कि मैं मुखिया का उम्मीदवार हूं। आप लोगों से मिलने आया हूं। इस पर एक शिक्षिका ने कहा कि अभी क्लास चल रहा है। बाद में आइएगा। फिर वहां दूसरे मुहल्ले में चला गया।
राजनीति के मुहावरे में एक और शब्द गढ़ लिया गया है प्रतिनिधि पति। जैसे मुखिया पति, सरपंच पति, अध्यक्ष पति आदि। शिक्षा भी इस मुहावरे से अलग नहीं है। पंचायत के एक स्कूल में प्रभारी शिक्षिका हैं। बच्चों के लिए विभिन्न मदों में पैसे आए थे। उनका वितरण किया जाना था। पारदर्शिता के लिए जनप्रतिनिधियों को भी बुला लिया गया था। पैसे वितरण की तैयारी चल रही थी कि मैं वहां पहुंच गया। वहां प्रभारी शिक्षिका के पुत्र मौजूद थे। मैंने अपना परिचय दिया तो उन्होंने बताया कि आपसे मेरी बात मोबाइल पर हुई थी। बातचीत के क्रम में पता चला कि वह प्रभारी शिक्षिका के पुत्र हैं। पैसा वितरण करने और उसका हिसाब-किताब रखने में शिक्षिका को परेशानी नहीं हो रही थी। इसलिए मदद के लिए अपने पुत्र को बुलवा लिया था।

उधर पारदर्शिता पर जनप्रतिनिधियों की सहमति के लिए वार्ड पार्षद के पति मौजूद थे। थोड़ी देर बाद वहां बच्चों को बुलाकर राशि का वितरण शुरू हुआ। उसके बाद मैं स्कूल से बाहर निकलकर लोगों से संपर्क के लिए गांव की ओर बढ़ गया।
(जारी)
लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए कर सकते हैं.
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