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आलोचना की दृष्टि से मुकम्‍मल है ‘तीन हमसफर’

 : हिंदी विवि में ‘कथा-समय में तीन हमसफ़र’ पर हुआ गंभीर विमर्श : वर्धा : हिंदी की शीर्षस्‍थ आलोचक निर्मला जैन की कृति ‘कथा-समय में तीन हमसफ़र’ के बहाने वैचारिक विमर्श कार्यक्रम हुआ महात्‍मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय वर्धा में। कुलपति व सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार विभूति नारायण राय की अध्‍यक्षता में साहित्‍य विद्यापीठ की ओर से हबीब तनवीर सभागार में आयोजित विशेष चर्चा कार्यक्रम में मंच पर निर्मला जैन, प्रो. गंगा प्रसाद विमल, प्रो.ए.अरविंदाक्षन मंचस्‍थ थे तथा बनारस से आये प्रो. कुमार पंकज व दिल्‍ली विवि के डॉ. रामेश्‍वर राय बतौर वक्‍ता के रूप में मौजूद थे।

 : हिंदी विवि में ‘कथा-समय में तीन हमसफ़र’ पर हुआ गंभीर विमर्श : वर्धा : हिंदी की शीर्षस्‍थ आलोचक निर्मला जैन की कृति ‘कथा-समय में तीन हमसफ़र’ के बहाने वैचारिक विमर्श कार्यक्रम हुआ महात्‍मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय वर्धा में। कुलपति व सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार विभूति नारायण राय की अध्‍यक्षता में साहित्‍य विद्यापीठ की ओर से हबीब तनवीर सभागार में आयोजित विशेष चर्चा कार्यक्रम में मंच पर निर्मला जैन, प्रो. गंगा प्रसाद विमल, प्रो.ए.अरविंदाक्षन मंचस्‍थ थे तथा बनारस से आये प्रो. कुमार पंकज व दिल्‍ली विवि के डॉ. रामेश्‍वर राय बतौर वक्‍ता के रूप में मौजूद थे।

प्रो. गंगा प्रसाद विमल बोले, निर्मला जी ने पुस्‍तक को मन्‍नू भंडारी, उषा प्रियंवदा और कृष्‍णा सोबती के रचनाकर्म पर केंद्रित कर लिखा है। लेखिका ने नई पद्धति से तीनों लेखिकाओं की अलग-अलग स्‍थापत्‍य की चर्चा की है। यह रचनाकर्म के लिहाज से भी आलोचना के रस में डुबोती है। उन्‍होंने एक आलोचनात्‍मक दृष्टि से रचनाकारों को समय विशेष परिदृश्‍य में देखने की दृष्टि विकसित की है। पुस्‍तक को पढ़कर आधी शताब्‍दी की हिंदी की सृजनात्‍मकता व हिंदी की आलोचनात्‍मकता की पड़ताल की सकती है। ये तीनों लेखिकाएं अपने समय की महत्‍वपूर्ण रचनाकार इसलिए हैं कि उन्‍होंने समय के स्‍त्री प्रश्‍नों को उठाया है। यह कृति चंद महत्‍वूपर्ण कृतियों में गिनी जाएगी क्‍योंकि आलोचना की विरक्ति या बहुधा को लौटा लाने की कोशिश इसमें निहित है। वर्तमान में चल रहे विमर्शों में यह पुस्‍तक अत्‍यधिक प्रांसगिक साबित होगी।

अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में कुलपति विभू‍ति नारायण राय ने कहा कि आज आलोचना की पठनीय पुस्‍तकें नहीं आ रही हैं। निर्मला जी ने आलोचना की पठनीय पुस्‍तक पाठकों को दी हैं। पुस्‍तक की विशेषता है भाषा के प्रति हमारा प्रेम पैदा करे, हमें किताबों से दूर नहीं पास लाएं, इसकी भरपायी पुस्‍तक में शामिल है। ‘आपका बंटी’ मन्‍नू जी की बहुत सारी तकलीफ और अपने अनुभवों की उपज है।

सुप्रसिद्ध लेखिका निर्मला जैन ने आलोचकों से प्राप्‍त असहमति पर प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि तीनों लेखिकाओं में मन्‍नू बहुत लोकप्रिय हुईं। उनकी रचनाओं में पारदर्शिता है। उषा या कृष्‍णा की कहानी को समझने के लिए गहरे में पैठने की जरूरत लगती है जबकि मन्‍नू की कहानियों में गहरे में उतरने की जरूरत नहीं लगती है। राजनीतिक चेतना इनलोगों का मुख्‍य रूप से एजेंडा नहीं है। ‘महाभोज’ को ‘आपका बंटी’ से कमतर नहीं मानती हूं, भले ही राजेन्‍द्र यादव मानते हैं। उषा ने प्रवासी जीवन की व्‍यथा पर लिखा। उषा व कृष्‍णा सोबती की कलम में तैयारी है जबकि मन्‍नू के पास उतनी तैयारी नहीं है। वे सहज भाव से लिखती जाती हैं।

दिल्‍ली विवि के हिन्‍दू कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रामेश्‍वर राय ने कहा कि इस पुस्‍तक से शिविरबद्ध आलोचना व विमर्शीय आलोचना के बीच में एक स्‍वतंत्र राह बन पायी है। पुस्‍तक को भरोसे का दरवाजा बताते हुए उन्‍होंने कहा कि इसमें आलोचना के ‘थॉट’ की हिस्‍सेदारी की है। पुस्‍तक का केंद्रीय प्रमेय ब्रांडधर्मिता के विरोध में है। यह ब्रांडधर्मिता का विरोध उनके रचना का प्रस्‍थान विंदु है। ब्रांडधर्मिता ने बड़े रचनाकारों को केंद्र से हटाकर हाशिए पर धकेल दिया है। उन्‍होंने बताया कि ब्रांडधर्मिता का मूल चरित्र विज्ञापनधर्मी है और यह विज्ञापन हमें मूल मसलों से अलगाती है। निर्मला जी ने एक आलोचक के रूप में साहित्‍य में ब्रांडधर्मिता का विरोध किया है।

प्रो. कुमार पंकज ने निर्मला जैन की ‘तीन हमसफ़र’ पुस्‍तक में लेखिका ने मित्रता को नहीं अपितु विचारों को प्रमुखता दी है। निर्मला जी जैनेन्‍द्र से कुछ ज्‍यादा प्रभावित हैं। 1950-60 तक आते-आते जैनेन्‍द्र लेखन की चमक खो चुके थे। वे कहानीकार के रूप में ‘पत्‍नी’, ‘एक रात’ जैसी कहानियां लिख रहे थे। पुस्‍तक में तीन महत्‍वपूर्ण रचनाकारों- अमरकांत, भीष्‍म साहनी और धर्मवीर भारती की चर्चा की जानी चाहिए थी, जिसे शामिल नहीं किया गया है। आजादी के बाद कहानी की कोई भी चर्चा अमरकांत के बिना नहीं की जा सकती है। उनकी कहानी ‘डिप्‍टी कलेक्‍टरी’ एक अदभुत कहानी है। उन्‍होंने कहा कि तीनों लेखिकाओं की उपन्‍यासकार के रूप में तुलना की जाय तो कृष्‍णा जी की रचनाएं महत्‍वपूर्ण लगती हैं। क्‍योंकि उन्‍होंने अपने उपन्‍यास में बड़ी संजीदगी से आधुनिकता को मूर्त रूप दिया है। निर्मला जी बुद्धिमता से तीनों की तुलना कर उषा को कृष्‍णा और मन्‍नू के बीच दिखाती हैं। उन्‍होंने कहा कि लोकप्रियता के पैमाने पर मन्‍नू आगे हैं पर शिल्‍प, संवेदना में कृष्‍णा, उषा फिर मन्‍नू का नाम आता है।

विषय प्रवर्तन करते हुए साहित्‍य विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो. सूरज पालीवाल ने कहा कि अपने समय के पुरूष लेखकों के बारे में इन लेखिकाओं ने लिखा है। जबकि राजेन्‍द्र यादव, कमलेश्‍वर, मोहन राकेश, ये झंडाबरदार लेखकों ने अपने समकालीन लेखिकाओं पर कुछ भी नहीं कहा है। आज जब स्‍त्री विमर्श का डंका पीटा जा रहा है-चाहे साहित्यिक पत्रिकाएं हो या विवि‍ के विभाग सभी में, स्‍त्री या दलित विमर्श की चर्चा हो रही है। निर्मला जी स्त्रियों के अनेकानेक मुद्दों को लेकर आती हैं। हमें कहने में गुरेज नहीं है कि आज अगर स्‍त्री विमर्श केवल सेक्‍स या यौन मुक्ति तक सीमित हो जाए तो इन तीनों रचनाकारों को पढ़ने की जरूरत है। यह पुस्‍तक एक बहस की शुरुआत है, क्‍योंकि इसने स्‍त्री विमर्श को राजपथ पर लाकर खड़ा किया है।

साहित्यिक दुनिया से जुड़े नामचीन हस्तियों के अलावा खचाखच भरे सभागार में विवि के प्राध्‍यपकों, शोधार्थियों व विद्यार्थियों की मौजूदगी निर्मला जैन सहित उषा, मन्‍नू व कृष्‍णा सोबती की रचनाओं पर मुहर लगा रही थी। मंच का संचालन साहित्‍य विद्यापीठ की रीडर डॉ.प्रीति सागर ने किया तथा प्रतिकुलपति प्रो.ए.अरविंदाक्षन ने आत्‍मीय भाव से आभार व्‍यक्‍त किया।

अमित विश्‍वास की रिपोर्ट.

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