एक युवक चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था, मैं पागल नहीं हूं। मानवीय संवेदनाएं किस प्रकार मर गयी हैं अनिल के मामले में। सम्मानित साथियों। आज वाराणसी रोडवेज बस स्टैण्ड के पास यह युवक मुझे बेडियों में जकडा मिल गया। मैने रूककर उनसे पूछा कि आपको इस प्रकार पैरों में मजबूत लोहे की बेडी क्यों डाली गयी है, तो उनका जबाब था कि उपर वाले की शायद यही मर्जी है।
मुझे गांव के लोगों ने पागल बनाकर ये बेडी पैरों में डाल दिया है जिससे हमें चलने के साथ नित्य क्रिया करने व पूरी दिनचर्या में परेशानी होती है। बताने वाला यह युवक शान्त भाव से पढे लिखे लोगों की तरह जबाब खडी हिन्दी में दे रहा था। पूछने पर अपना पता जौनपुर जिले के एक गांव का बताया। कहा कि एक केस में मुझे फर्जी फंसाया गया था और जिसमें सजा भी हुयी। सजा काटकर आया तो विपक्षियों ने मानसिक चिकित्सालय में दिखाकर पागल घोषित करा दिया। अब चिल्ला-चिल्लाकर सबसे कहता हूं कि मैं पागल नहीं हूं तो कोई मानता नहीं। मैने कहा कि आप जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक से क्यों नहीं मिलकर गुहार लगाते हैं तो उनका कहना था कि गया तो कई बार, किन्तु उनके सुरक्षा कर्मी हमें मिलने ही नहीं देते। मैने अपने कुछ मित्रों को उनके साथ लगा दिया है जो वाराणसी के जिलाधिकारी/पुलिस अधीक्षक से उन्हें मिलवाकर उनकी बेडी हटवाने का कार्य करेंगे। अनिल के मानव अधिकार हनन के लिये किसे दोषी बताया जाय। समाज के लिए यह एक बडा प्रश्न है। रिपोर्ट-ब्रजभूषण दूबे, सामाजिक कार्यकर्ता गाजीपुर,9452455444





