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क्या ध्वस्त होगा दक्षिण में भाजपा का किला?

४ मई को कर्नाटक विधानसभा के लिए मतदान हो जायेगा और ८ मई को मतगणना के पश्चात नतीजों की घोषणा की जायेगी. मतदान से अंतिम दो दिनों पूर्व पासा पलटने का दावा करनेवाले अतिसक्रिय कार्यकर्ताओं के हाथ केंद्रीय रेलमंत्री पवन बंसल के भांजे विजय सिंगला द्वारा रेलवे बोर्ड के सदस्य बनवाने के लिए बोर्ड के एक सदस्य से ९० लाख की रिश्वत लिए जाने के अति सनसनीखेज मामले को सीबीआई द्वारा उजागर किये जाने पर, बैठे-बिठाए हवा का रुख पलटने का मसाला मिल गया है.

४ मई को कर्नाटक विधानसभा के लिए मतदान हो जायेगा और ८ मई को मतगणना के पश्चात नतीजों की घोषणा की जायेगी. मतदान से अंतिम दो दिनों पूर्व पासा पलटने का दावा करनेवाले अतिसक्रिय कार्यकर्ताओं के हाथ केंद्रीय रेलमंत्री पवन बंसल के भांजे विजय सिंगला द्वारा रेलवे बोर्ड के सदस्य बनवाने के लिए बोर्ड के एक सदस्य से ९० लाख की रिश्वत लिए जाने के अति सनसनीखेज मामले को सीबीआई द्वारा उजागर किये जाने पर, बैठे-बिठाए हवा का रुख पलटने का मसाला मिल गया है.

यूँ तो ३ मई की शाम को ही चुनाव प्रचार का समय समाप्त हो गया था परन्तु इसके साथ ही रेलमंत्री पवन बंसल के भांजे द्वारा रिश्वत लेने का मामला जंगल की आग की तरह फैल गया. चुनाव प्रचार चाहे बंद हो गया हो, परन्तु अब टीवी चैनलों, समाचार पत्रों व गली-मुहल्लों के नुक्कड़ों पर चर्चा का विषय बना राष्ट्रीयस्तर के इस बड़े भ्रष्टाचार के खुलासे का कर्नाटक के चुनावों पर कितना प्रभाव पड़ेगा, पूर्ण रूप से यह मतगणना के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा. परन्तु इतना तो स्पष्ट है कि कांग्रेस को इसका कुछ ना कुछ नुक्सान कर्नाटक के चुनाव में उठाना ही पड़ेगा.

सरकारी भ्रष्टाचार के आरोप-प्रत्यारोपों के वर्तमान दौर में हो रहे कर्नाटक विधानसभा के चुनावों में स्थानीय छुटपुट मुद्दों के अतिरिक्त कोई भी बड़ा मुद्दा स्थापित करने में राजनीतिक दल अभी तक असफल रहे थे. लिहाजा चुनावों में निर्णायक भूमिका निभानेवाले निष्पक्ष मतों के बड़ी संख्या में बिखराव की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा रहा था. २२४ विधायकों वाली विधानसभा के चुनाव से पूर्व मार्च के महीने में संपन्न हुये शहरी स्थानीय निकायों के चुनावों के नतीजों को कुछ राजनीतिक विश्लेषक विधानसभा चुनावों के रिहर्सल के रूप मान रहे थे. परन्तु वास्तव में इसे किसी नियम के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता. ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों के चुनावों और विधानसभा या लोकसभा के चुनावों में मतदान का रुझान अलग-अलग हुआ करता है.

विगत वर्ष में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों के पश्चात हुये शहरी स्थानीय निकायों के चुनावों में भाजपा ने अधिकतर स्थानों पर विजय प्राप्तकर सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की पीठ लगवा दी थी. इसी प्रकार अभी पिछले माह उत्तराखंड में हुये शहरी निकायों के चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस को करारी शिकस्त दी है. पिछले वर्ष हिमाचल के शिमला में महापौर और उपमहापौर के पदों पर झंडा फहराकर सीपीएम ने भाजपा और कांग्रेस को धूल चटा दी थी. वहीं कुछ माह पश्चात विधानसभा चुनावों में शिमला की सीट भाजपा के प्रत्याशी ने अपनी विजय सुनिश्चित की थी. कहने का तात्पर्य यह है कि कर्नाटक में अभी हाल ही में संपन्न हुये शहरी निकायों के चुनावों से विधानसभा के नतीजों का कयास नहीं लगाया जा सकता है.

सत्तारूढ़ भाजपा से अलग होकर कजपा बनाने वाले दक्षिण भारत में भाजपा के पूर्वखेवनहार येदीयुरप्पा के जाने से भाजपा को चुनावों में अवश्य ही नुक्सान झेलना पड़ेगा. पिछले कुछ वर्षों से भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व पार्टी को किस दिशा की ओर ले जाना चाहता है यह समझ से परे है. वरिष्ठ और अनुभव वाले नेताओं को हाशिए पर धकेलते हुये पार्टी की कमान कनिष्ठ, अनुभवहीन और असक्षम हाथों में सौपने की प्रक्रिया के साथ-साथ सत्ता वाले राज्यों में संगठन और सत्ता में अनदेखी के आरोपों के चलते पार्टी में बढ़ती अंतर्कलह को जिस प्रकार से समाधान करते हुए निपटाया जाना चाहिए था वह नहीं हुआ. इसके ठीक विपरीत जुगाडू किस्म के कनिष्ठ और हवाई नेतागण जो अपने कनेक्शन के माध्यम से केंद्रीय संगठन में पद प्राप्त करने में सफल रहे हैं, किस प्रकार भाजपा की नैया को आने वाले चुनावों में पार लगाने में सफल रहेंगे यह भाजपा के लिए चिंता का विषय है.

एक कहावत है कि “भूतकाल के अनुभवों से सीख लेकर वर्तमान में उचित प्रयास किये जाने चाहिए…ताकि भविष्य सुखद बने.” परन्तु भारतीय जनता पार्टी पर ऐसे कथनों का कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता. २०१४ में केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनाने का स्वप्न देखने वाली एनडीए एक ओर जहाँ टूटने के कगार पर है वहीँ भाजपा के अपने शासन वाले राज्यों के किले एक के बाद एक करके धराशाही हो रहे है. उत्तर प्रदेश और राजस्थान के बाद उत्तराखंड फिर हिमाचल और अब कर्नाटक में भी भाजपा शासित किले के ध्वस्त होने की सम्भावना बनती दिख रही है. गडकरी के जाने के बाद मजबूरी में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की कमान संभालने वाले राजनाथ सिंह से भाजपा के पुराने समर्थकों को बहुत आशाएं थी कि कर्नाटक के चुनावों से पूर्व वह येदियुरप्पा को वापिस भाजपा में लाकर की कर्नाटक भाजपा को नई शक्ति देने का कार्य करते हुये पार्टी को चुनाव में उतारेंगे. परन्तु ऐसा संभव ना हो सका.

जिस प्रकार सत्ता और संगठन की समस्याओं का शीर्ष नेतृत्व द्वारा समय पर सही तरीके से निवारण ना करने के कारण ही हिमाचल में ठीकठाक चल रही सरकार को पार्टी की अंतर्कलह और विघटन के चलते गंवाना पड़ा था लगभग वैसी ही परिस्थिति की पुनरावृति कर्नाटक में भी होने जा रही है. यहाँ भी हिमाचल के महेश्वर सिंह और डा. राजन सुशांत की भांति ही बीएस येदियुरप्पा का मामला सही ढंग से नहीं सुलझाया गया था. जिसके चलते येदियुरप्पा को हिमाचल के महेश्वर सिंह की ही भांति मजबूरन पार्टी से बाहर अपना रास्ता तलाशना पड़ा और कर्नाटक जनता पार्टी का जन्म हुआ. हिमाचल में प्रो. प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में चल रही भाजपा सरकार के “मिशन रिपीट” को अपनों ने ही चुनावों में “डिफीट” में बदल दिया था. आज हिमाचल भाजपा विपक्ष में है. ठीक वैसे ही पारिस्थित से पांच मई को होनेवाले कर्नाटक विधानसभा के चुनावों के चौकोने संघर्ष में सत्तारूढ़ भाजपा को दो-चार होना पड़ेगा. येदियुरप्पा की काजपा के कर्नाटक चुनावों में उतरने से कमजोर पड़ी भाजपा के लिए पुनः सत्ता पर वापसी बहुत ही कठिन लग रही है.

भ्रष्टाचार के मुकदमे झेल रहे भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा से अलग होकर कर्नाटक जनता पक्ष नाम से राजनीतिक दल बनानेवाले बीएस येदियुरप्पा के चुनावी मैदान में उतरने की दशा में भाजपा की कितनी दुर्दशा हो सकती है उसका नमूना भाजपा अभी हाल के शहरी स्थानीय निकाय के चुनावों में देख ही चुकी है. चुनावी राजनीति में केवल दो लक्ष्य होते हैं. विजय का नगाडा या दूसरे का काम बिगाड़ा. चालीस वर्षों तक जनसंघ और फिर भाजपा को कर्नाटक में खड़ा करने व दक्षिण के द्वार कहे जाने वाले कर्नाटक में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाले येदियुरप्पा विपक्षियों से अधिक अपने ही दल के नेताओं के षड़यंत्र के शिकार हो गए. मुख्यमंत्री का पद छिन जाने व भाजपा आलाकमान की बेरुखी ने येदियुरप्पा को बगावत कर नया दल बनाने को मजबूर किया. पिछले माह ही संपन्न हुये स्थानीय निकायों के चुनावों में उनके दल कजपा ने कर्नाटक में अपनी सम्मानजनक उपस्थिति का परिचय दिया है. यही नहीं कर्नाटक में येदियुरप्पा भाजपा के लिए कितने विध्वंसक हो सकते हैं यह सत्तारूढ़ भाजपा को स्थानीय निकायों के चुनावों के नतीजों से स्पष्ट हो गया होगा.

वैसे साधारणतया यह देखा गया है कि ग्रामीण या शहरी स्थानीय निकायों के चनावों के नतीजों से विधानसभा या लोकसभा के चुनाव प्रभावित नहीं होते. परन्तु कर्नाटक में शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे वाकई चौंकाने वाले हैं. पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के भाजपा से अलग होने के बाद भाजपा की कमजोर स्थिति का आंकलन तो सभी को था और इसका लाभ येदियुरप्पा की कजपा और एचडी देवगौड़ा की जेडी (एस) को मिलने की सम्भावना अधिक बताई जा रही थी. परन्तु इन सब के विपरीत इसका लाभ कांग्रेस को ही अधिक मिला ऐसा प्रतीत हो रहा है. जो निश्चय ही चौंकाने वाले नतीजे है. जिसका अर्थ यह हुआ कि मतों का बड़ी संख्या में बिखराव व स्थानान्तरण हुआ है. कर्नाटक में गत माह को 4976 वार्डों के लिए हुए शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में से कांग्रेस जहां 1900 से भी अधिक सीटें जीतने में सफलता पाई वहीं भाजपा 900 के आसपास ही सिमट कर रह गयी है. भाजपा से बगावत कर अपनी अलग कर्नाटक जनता पार्टी बनाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा तो 300 का आंकड़ा भी पार नहीं कर सके. अपने बूते पर पहली बार चुनावी रण में उतरी कजपा ने जहाँ 276 सीटों पर विजय प्राप्त की वहीँ बड़ी संख्या में भाजपा के प्रत्याशियों की पराजय का कारण भी बनी. इससे भी यह स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस के प्रत्याशियों के विजय में येदियुरप्पा के योगदान को नाकारा नहीं जा सकता.

५ मई को होनेवाले कर्नाटक राज्य विधानसभा के चुनावों पश्चात किसकी सरकार बनेगी इसका निर्णय कर्नाटक के साढ़े चार करोड़ से भी अधिक मतदाता करेंगे. चौंकोने चुनावी रण में सत्तारूढ़ भाजपा, कांग्रेस, जनता दल (सेकुलर) के लिए जहाँ यह चुनाव जहां उनकी लोकप्रियता और राजनीतिक प्रतिष्ठा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है वहीं दूसरी ओर यह चुनाव कर्नाटक जनता पार्टी (कजपा) के मुखिया बी.एस. येदियुरप्पा का राजनीतिक भविष्य भी तय करेगा. वैसे इतना तो स्पष्ट है कि इन चुनावों में स्थानीय मुद्दों को छोड़ कर कोई भी जनसरोकार का बड़ा मुद्दा नहीं है. सात करोड़ से भी अधिक की आबादी वाले कर्नाटक राज्य के चुनावों में जातीय समीकरण भी खूब काम करता है. यहाँ लिंगायत समुदाय के लगभग १७ प्रतिशत जनसँख्या है जबकि वोकालिंगा के लगभग १६ प्रतिशत. इसके अतिरिक्त लगभग ११ प्रतिशत मुस्लिम समुदाय और २० प्रतिशत के करीब अनुसूचित व अनुसूचित जनजाति के समुदायों की आबादी है. देवगौड़ा वोकालिंगा समुदाय से और वर्तमान मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टर व कजपा के येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय से सम्बन्ध रखते है.

कर्नाटक में विधानसभा के चुनाव की सरगर्मी धीरे धीरे बढ़ रही है. वहाँ की राजनीतिक परिस्थिति को देखते हुये यह तो स्पष्ट है कि वहाँ कोई मुद्दा कारगर नहीं है. मतों के बड़ी संख्या में बिखराव की सम्भावना बनी हुई है. इस सब के बीच कुछ जातियों के मतों का ध्रुवीकरण भी विभिन्न कारणों से नाकारा नहीं जा सकता. हमारा आंकलन तो यह है कि वहाँ त्रिशंकु विधानसभा आयेगी और प्रबल सम्भावना बनती है कि कांग्रेस, भाजपा, जनतादल सेकुलर और येदुरप्पा की पार्टी, इन चारों में कोई तीन दल ही मिल कर सरकार बनने में सक्षम होंगे और यह बहुत ही कठिन है. सत्ता के लालच में जो भी तीन दल मिल कर सरकार बनायेंगे वह भी अल्पआयु की होगी और अधिक दिनों तक चल नहीं पायेगी. अब मामे-भांजे की काली करतूत से कल कर्नाटक के होनेवाले विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस के भविष्य पर कितना असर पड़ेगा यह तो ८ मई को मतगणना और नतीजों की घोषणा के बाद ही पता चलना संभव हो सकेगा क्यूंकि मतपेटियों (ईवीएम मशीनों) के गर्भ में क्या छुपा है यह कोई नहीं जानता……!

लेखक  विनायक शर्मा मंडी से प्रकाशित साप्ताहिक अमरज्वाला के संपादक हैं।

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