3 मई 2013 जेएनयू के सामाजिक विज्ञान संस्थान में प्रो. चमनलाल की अंग्रेज़ी किताब अंडरस्टेंडिंग भगत सिंह का विमोचन प्रो. रणधीर सिंह ने किया। यह किताब आकार बुक्स, दिल्ली से प्रकाशित हुई है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मणीन्द्र नाथ ठाकुर ने किया और साउथ एशिया यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो. जी. के. चड्डा ने अध्यक्षता की। अतिथि जेएनयू वाइस चांसलर प्रो. एस.के. सोपोरी और प्रो. शीला भल्ला थे। वक्ता प्रो. मुशिरूल हसन और प्रो. मनोरंजन मोहन्ती थे।
सभागार श्रोताओं से खचाखच भरा हुआ था। शोधार्थियों ने सभी अतिथियों को फूलों का गुच्छा देकर सम्मानित किया। निशान्त नाट्यमंच ने जोश भरे क्रांतिकारी गीतों से कार्यक्रम की शुरुआत की, जिससे सभागार गूंज उठा। किताब का विमोचन करते हुए प्रो. रणधीर सिंह ने कहा भारत के आजादी संग्राम में भगतसिंह की भूमिका को इतिहास में उचित जगह नहीं दी गयी क्योंकि शासक वर्ग हमेशा जनता के इतिहास को दबाता है। भगतसिंह एक क्रांतिकारी चिंतक थे और भारत में समाजवादी क्रांति लाना चाहते थें। इसलिए यहां के शासक वर्ग उनकी भूमिका को छिपाना चाहते थे। उन्होंने वामपंथी दलों की भूमिका पर भी प्रश्न चिन्ह उठाया। उन्होंने भी भगत सिंह की भूमिका को ठीक से नहीं समझा और उसे अपना पुरोधा के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। आजादी के दौर में भगत सिंह ने देश को एक नयी समझ दी।
प्रो. चमनलाल ने कहा कि जेएनयू के वातावरण ने मुझे भगत सिंह पर शोध करने में मदद की, इसलिए मुझे उनपर कई किताबें लिखने का अवसर मिला। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि 1757 के प्लासी युद्ध से लेकर 1946 के नौसैनिक विद्रोह तक भारत के तमाम क्रांतिकारी आंदोलनों के दस्तावेजों को भगत सिंह संग्रहालय बनाकर संभाला जाये। उन्होंने कहा कि ये तमाम दस्तावेज भारतीय भाषाओं में हैं, जिनका अंग्रेजी में बहुत कम अनुवाद हुआ है। इससे भगत सिंह को जानने और समझने में और मदद मिलेगी। पूरा कार्यक्रम मई दिवस, कार्ल मार्क्स के जन्मदिन और गदर पार्टी के शत्वर्षीय दिवस को समर्पित किया गया। प्रो. एस. के सोपोरी ने कहा कि ईमानदारी और आत्म स्वाभिमान भगत सिंह के व्यक्तित्व का मूल गुण है। 23 वर्ष की आयु में शहीद होने वाले वाले भगत सिंह पर 400 से अधिक किताबें उपलब्ध हैं, जिसमें एक दर्जन से ज्यादा किताबें प्रो. चमनलाल ने लिखी हैं।
प्रो. मनोरंजन मोहंती ने कहा कि प्रो. चमनलाल प्रगतिशील लेखक है, जिन्होंने प्रो. विपिन चंद्रा के बाद भगत सिंह के विचारों को आगे बढ़ाने में काफी योगदान दिया है। प्रो. मुशीरूल हसन ने भारतीय इतिहास में गांधी नेहरू धारा वर्चस्व के कारण क्रांतिकारियों के योगदान को कम जगह मिलने की बात कही। डा. मणीन्द्र नाथ ठाकुर ने विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भगत सिंह चिंतन को न शामिल करने की आलोचना की और इसकी आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. चड्डा ने भगत सिंह को एक सच्चा कर्मयोगी बताते हुए कहा कि उन्होंने देश के लिए सब कुछ कुरबान कर दिया और आज देश को ऐसे ही युवाओं की जरूरत है। इस अवसर पर प्रो. विपिन चंद्र, प्रो. जी.एस भल्ला, प्रो. शीला भल्ला गदरी क्रांतिकारी पाडुराम सदाशिव खानखोजे की बेटी डॉ. सावित्री साहनी, क्यूबा, बेनेजुएला, और बोलिविया के राजनायिकों को पुस्तकें प्रस्तुत कर सम्मानित किया गया और चे ग्वेरा और ऊगो शावेज को भाव पूर्ण ढंग से याद किया गया।






