: अंतर्राष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर इंदौर में राष्ट्रीय संगोष्ठी : इंदौर। अंतर्राष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर इंदौर प्रेस क्लब में तीसरे प्रेस आयोग की आवश्यकता पर शुक्रवार राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन हुआ। परिसंवाद में वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी, मधुसूदन आनंद, राहुल देव एवं अवधेश कुमार ने तीसरे प्रेस आयोग के गठन के साथ-साथ मीडिया में भी स्वस्फूर्त सुधारों की पैरवी की। वक्ताओं ने कहा कि कोई बाहरी संस्था हमारे ऊपर नियंत्रण करें उससे बेहतर होता कि हम खुद अपनी आचार संहिता बनाए। आज खबर, विचार और विज्ञापनों में सटीक संतुलन की आवश्यकता है।
लक्ष्य से भटका मीडिया : मधुसूदन आनंद ने कहा कि हर चीज के दो पहलू होते हैं। मीडिया में बहुत बुराइयां हैं, उनसे लड़ना भी चाहिए। आंकड़े देखें तो पता चलेगा कि भारत में पांच हजार दैनिक, ४० हजार पत्रिकाएं, ८०० टीवी चैनल्स हैं। तमाम ब्लॉग और वेबसाइट हैं। इनमें प्रतिदिन करोड़ों शब्दों की वर्षा हो रही है। सूचना के रूप में, विचार के रूप में। पेड न्यूज के बारे में चुनाव आयोग ने कहा कोई समाधान नहीं है। मीडिया आज के दौर में अपने लक्ष्य से भटक गया है इसलिए पप्पू-फेंकू जैसी निरर्थक बहस में उलझा पड़ा है। अब इस दौर में हम किससे अपेक्षा रखेंगे कि वो आयोग के कार्य को सार्थक और परिभाषित करें। मीडिया में अब प्रेस परिषद के फैसलों को जगह नहीं मिलती, उसकी परवाह भी बंद हो गई है। ऐसे में हम कैसे भरोसा रखें कि प्रेस आयोग की बात सभी मानेंगे।
बदलें जनविरोधी चरित्र : रामशरण जोशी ने कहा कि सबसे पहले मीडिया के जनविरोधी चरित्र को पटरी पर लाना होगा, क्योंकि मीडिया हमेशा तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक तंत्र का हिस्सा होता है। समय का निजाम क्या है कौन है और किरदार क्या इसी से मीडिया का चरित्र बनता है। वर्तमान स्थिति बहुत खराब है, क्योंकि मीडिया में पूंजी आ गई है जो केवल मुनाफे के लिए लगाई जाती है। मुनाफे का कोई चरित्र नहीं होता। मैं १५ साल में विद्यार्थियों को पढ़ा रहा हूं। मेरे विद्यार्थी बड़ी पोस्ट पर हैं, जब भी मिलते हैं तो बताते हैं सर आपने जो पढ़ाया उसका ठीक विपरीत कर रहे हैं। मैं पूछता हूं तनख्वाह कितनी हैं, तो किसी की एक लाख, किसी को ७५ हजार, कुछ की डेढ़ ला। वे कहते हैं हम जर्नलिस्ट नहीं, पशु बन गए हैं। पढ़, सोच, बोल नहीं सकते, सोचने के काम हमारा है ही नहीं। वो अखबार मालिक ही कर रहे हैं। हम लोग पूंजीवादी हैं, मूलत: उससे बाहर निकलने की कोशिस नहीं करते। मैं अपने स्टूडेंट्स से कहता हूं, जो सुविधाएं तुम्हें मिल रही हैं उसके लिए कीमत तो देना होगी, उसके लिए शिकायत क्यों?
श्री जोशी कहते हैं इन तमाम निराशाओं के बावजूद मैं हिम्मत नहीं हारा हूं। भले ही तीसरा प्रेस आयोग बने या कुछ और ऐसी सूरज निकले जो मीडिया पर सामाजिक दबाव बनाए। मैंने कुछ सुझाव रखें हैं, जैसे कोई अखबार वैधानिक नहीं है तो उसे डिरजिस्टर करें। प्रेस स्वामित्व इंडस्ट्री से जुड़ा है तो उसे डिलिंक करें। एक अखबार का एक ही एडिशन हो। यदि अखबार है, तो वो अपना चैनल न शुरू करे। भाषाई एजेंसियों को बढ़ावा दें, ताकि हमारी भारतीय भाषाओं का अस्तित्व बचा रहे। कस्बों, ग्रामीण क्षेत्रों में पत्रकारिता शिक्षण-प्रशिक्षण दिया जाए। श्रोता, दर्शक और पाठक तीनों मिलकर कोई अखबार या चैनल गलत खबर देता है तो अखबार या चैनल का बहिष्कार करें। प्रेस मालिक, संपादक, रिपोर्टर और अन्य वरिष्ठ पदों पर रहने वाले लोग हर तीन साल मे अपनी चल-अचल संपत्ति की घोषणा करें।
श्री जोशी ने बताया मैं कुछ महीने पहले बाहर गया था। वहां न्यूयार्क टाइम्स की डेढ़ घंटे की डाक्युमेंट्री मूवी देखी। उसमें उन्होंने बड़ी ईमानदारी से आत्ममंथन किया था। कई साल पहले जब न्यूयार्क टाइम्स का सर्कुलेशन गिरने लगा था और रेवेन्यु भी घट रहा था, उन्होंने प्रोपराइटर, एडिटर, कॉलमिस्ट, रिपोर्टर्स, विज्ञापनदाता सभी के विचार लेकर डाक्युमेंट्री शूट की। तब सब लोगों ने स्वीकार्य किया कि हम लोगों ने वे तमाम झूठी खबरें छापी जो व्हाइट हाउस के जरिए हमें मिलती थीं, जो गल्फवार के समय निजाम उन्हें देता था। उस समय सजावटी खरीदे हुए जर्नलिस्ट बन गए थे, इसलिए जनता ने रिजक्ट करना शुरू कर दिया। मीडिया कोई भी हो, प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक विश्वास के दम पर ही चलता है।
मीडिया के मानक गिरे : अवधेश कुमार ने वर्तमान भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था की ओर ध्यान खींचते हुए कहा कि आज मीडिया स्वयं आत्मसुधार और परिष्कार करने की स्थिति में नहीं है। हम भ्रष्टाचार के मामलों से घिरी सरकार से यह उम्मीद कैसे कर सकते है कि वह एक आयोग बनाकर मीडिया को सुधार सकती है। उन्होंने सरकार द्वारा बनाई गई विभिन्न समितियों और आयोगों का उदाहरण देते हुए बताया कि उनकी बनाई रिपोटर्ड पर जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो तीसरा प्रेस आयोग क्या कर लेगा। उन्होंने कहा, आज पद, प्रभाव और पैसा ही जीवन का मानक है। पत्रकार भी इससे अछूते नहीं है। पिछले डेढ़ दशक में पत्रकारिता में स्थापित मानकों का विध्वंस हुआ है और उससे जो बवंडर उठा है उसे रोकने की चिंता तीसरे प्रेस आयोग के गठन के रूप में सामने आ रहा है, लेकिन यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि सरकार के सहयोग से बना आयोग पत्रकारिता के किसी रोग का उपचार कर पाएगा। ८४ के दंगों पर भी सरकार ने कई समितियां बनाई, लेकिन सजा २-४ से ज्यादा लोगों को नहीं मिल पाई।
दबाव में कर रहे काम : राहुल देव ने इस बात पर चिंता जताई कि इन दिनों मीडिया को एक अदृश्य ताकत संचालित कर रही है। मीडिया संस्थान के निवेशक उन्हें अपने अनुसार चलाना चाहते हैं। एक चैनल द्वारा किसी मुद्दे को उछाले जाने पर अन्य चैनलों को भी अपना मत और बुद्धि परे रखकर उसे मुद्दे को दिखाना पड़ता है। सरबजीत के अंतिम संस्कार को लेकर आज देशभर के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जो माहौल बनाया उसे देखकर लग रहा है कि देश में दिखाने के लिए और कुछ है ही नहीं। मीडिया और प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग करते हुए उन्होंने मीडिया पर संयत अंकुश लगाने की बात भी उठाई। उन्होंने कहा कि आज के दौर में मीडिया हरकारे की स्थिति बनाए हुए हैं। अराजकता बढ़ रही है, दबाव बनाने का काम चल रहा है, मीडिया जो दर्पण का काम करता है आज एजेंडा तय करने वाला बन बैठा है। मीडिया में आवारा पूंजी आ गई है। अच्छे पत्रकार संपादक मजबूरी में काम कर रहे हैं। तीसरे प्रेस आयोग के जरिए हम एक बड़े परिवर्तन की मांग कर रहे हैं, जो कि देश और समाज में भी देखने को मिल रहा है। तीसरे प्रेस आयोग के जरिए मीडिया की भूमिका नए ढंग से निर्धारित की जा सकेगी।
प्रारंभ में विषय प्रवर्तन करते हुए इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने कहा कि राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक स्तर पर हो रहे बदलाव में देश को जैसी मीडिया चाहिए उसका निर्णय तो तब ही समीचीन होगा जब हमारे सामने पूरा एक शोधपरक अध्ययन हो। ऐसा अध्ययन अकादमिक नहीं, बल्कि प्रचलित कानून के दायरे में होना चाहिए। यह काम तीसरा प्रेस आयोग ही कर सकता है। इसी कारण पहला और दूसरा प्रेस आयोग जो बनाये गये वे जांच आयोग कानून के अधीन थे। पहला प्रेस आयोग प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पहल पर बना। इसे पत्रकारों ने बनवाया। संसदीय लोकतंत्र की यात्रा में जो शुरुआती कदम जरूरी थे उनमें एक वह भी था। उस आयोग की सिफारिश पर प्रेस परिषद, रजिस्ट्रार न्यूजपेपर, पत्रकार के लिए वेतन आयोग बने। समय और संदर्भ बदलते ही दूसरे प्रेस आयोग की जरूरत पड़ी। उसकी रिपोर्ट २९ साल पहले आयी थी। तब प्रेस का मतलब होता था – अखबार, ऑल इंडिया रेडियो और उत्सवमूर्ति जैसा दूरदर्शन।
उन्होंने कहा कि आज प्रेस हो गया है मीडिया। इसमें अखबार, रेडियो, टीवी चैनल, ऑनलाइन इत्यादि शामिल हैं। अब यह समावेशी हो गया है। इस तरह इसे चौथे खंभे की नहीं, पहले खंभे की हैसियत प्राप्त हो गयी है। इस तरह मीडिया नये दौर में है। इसे सरकार की आर्थिक नीतियों से बल मिला है। यह नीति भी २० सालों से है जिसमें निरंतर सुधार, संशोधन हो रहे हैं। मीडिया में भी नीतिगत बदलाव के निर्णय सरकार ने समय समय पर लिये हैं। जैसे विदेशी पूंजी के बारे में। लेकिन ऐसी नीतियां सरकार के तदर्थवाद की द्योतक हैं। इस समय कुछ मसले बिलकूल नये हैं। कुछ पहले से चले आ रहे मुद्दे भी हैं। हम यह भी जानते हैं कि पहले प्रेस आयोग को तथ्य जुटाने में बहुत कठिनाइयों से गुजरना पड़ा था। वे कठिनाइयां उसी रूप में न सही पर नये रूप में आ सकती हैं। हमारा मत है कि संसद गंभीर मंथन से तीसरे प्रेस आयोग का गठन सरकार से करवाये। हमारा यह भी मत है कि नीति, नियमन, नियंत्रण नहीं होता, वह दिशासूचक होता है जिससे राही एक एक कदम चलते हुए मंजिल पर पहुंचता है। सही नीतियों से मीडिया स्वतंत्र होकर अपना सामाजिक दायित्व पूरा कर सकेगा। नये संदर्भ में मीडिया के लिए नीति और नये नियामक संस्थान तभी सार्थक रीति से बनाये जा सकेंगे जब हमारे सामने प्रेस आयोग की रिपोर्ट और संस्तुतियां हों। सूचना प्रसारण मंत्रालय के संदर्भ से ट्राई ने जो-जो अध्ययन २००८ से हाल तक किए है उनसे भी तीसरे प्रेस आयोग का औचित्य प्रमाणित हो रहा है।
इंदौर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष शशीन्द्र जलधारी ने वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय के लिखित वक्तव्य का वाचन किया। अस्वस्थता की वजह से वे परिसंवाद में उपस्थित नहीं हो सके। परिसंवाद के पहले अतिथियों ने इंदौर प्रेस क्लब परिसर में स्थित मां सरस्वती के मंदिर में माल्यार्पण किया। अतिथियों ने भाषाई पत्रकारिता महोत्सव में सहयोग करने वाले पत्रकारिता महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं प्रमाण पत्र व नकद राशि से सम्मानित भी किया।






