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सुख-दुख...

शशि शेखर गधे पर मेहरबान हो जाएँ, तो वह उसे ही शेर बना देते हैं

रूहेलखंड क्षेत्र में अमर उजाला और दैनिक जागरण पूरी तरह हावी थे। इन दोनों अखबारों की मनमानी का आलम यह था कि देश में सबसे महंगे अखबार इसी क्षेत्र के पाठक पढ़ते रहे हैं। पाँच रुपए तक का रेट हो गया था और कोई भी किताब एक्सट्रा लगा कर पाठकों से दस-बीस रुपए की वसूली साल में दो-चार बार कर ली जाती थी। इसी तरह दोनों ही अखबारों के कर्मचारियों की स्थिति बंधुआ मजदूर से भी बुरी थी। दोनों ही अखबारों पर हावी मठाधीशों के चमचों के अलावा बाकी सब दुखी ही रहते थे।

रूहेलखंड क्षेत्र में अमर उजाला और दैनिक जागरण पूरी तरह हावी थे। इन दोनों अखबारों की मनमानी का आलम यह था कि देश में सबसे महंगे अखबार इसी क्षेत्र के पाठक पढ़ते रहे हैं। पाँच रुपए तक का रेट हो गया था और कोई भी किताब एक्सट्रा लगा कर पाठकों से दस-बीस रुपए की वसूली साल में दो-चार बार कर ली जाती थी। इसी तरह दोनों ही अखबारों के कर्मचारियों की स्थिति बंधुआ मजदूर से भी बुरी थी। दोनों ही अखबारों पर हावी मठाधीशों के चमचों के अलावा बाकी सब दुखी ही रहते थे।

दैनिक जागरण का तो यह आलम था कि कानपुर के चपरासी भी जागरण लिमिटेड के कर्मचारी थे, पर अखबार कानपुर के रिपोर्टर्स के सहारे नहीं चलता, इसलिए स्थानीय लोगों को रिपोर्टिंग में रखने की मजबूरी थी, पर कानपुर के चपरासी के वेतन के बराबर वेतन में चार रिपोर्टर रखे जा रहे थे। हर व्यक्ति लखनऊ-दिल्ली नहीं जा सकता, सो जो मिल रहा था, उसी में काम करने की लोगों की मजबूरी थी। इस सब के बीच वर्ष 2009 में हिंदुस्तान अखबार के बरेली आने की खबर आई, तो पाठक खुश हुये, वहीं पत्रकारों ने लांच होने से पहले ही दिवाली मनाई।

हिंदुस्तान के लांच होने से अमर उजाला और दैनिक जागरण के रेट गिर गए। इतने सस्ते अखबार पढ़ने से पाठक काफी दिनों तक स्तब्ध से नज़र आए, पर पाठकों को जो लाभ होना था, वह हो गया, लेकिन पत्रकारों की स्थिति हिंदुस्तान के आने से और भी खराब हो गई। दैनिक जागरण और अमर उजाला के चालाक वरिष्ठ कर्मचारी हिंदुस्तान में नहीं गए। नए अखबार को लेकर जो संशय लोगों के मन में रहता है, उसी के चलते उन लोगों ने अच्छी-भली नौकरी छोड़ कर हिंदुस्तान ज्वाइन करना सही नहीं समझा, पर जिन लोगों का इन दोनों अखबारों में शोषण हो रहा था, उन लोगों को हिंदुस्तान ने बड़े पद और मोटा वेतन देने का लालच देकर तोड़ लिया।

जागरण में जिन लोगों को चार से पाँच-छह हजार तक मिल रहे थे, उन लोगों को हिंदुस्तान ने पंद्रह से तीस हजार तक वेतन ही नहीं दिया, बल्कि सब-एडिटर और सीनियर सब-एडिटर जैसी उपाधियाँ देकर कद भी बड़ा दिया। हैसियत से ज्यादा पैसा और पद मिलने के कारण इन लोगों ने रात-दिन मेहनत कर हिंदुस्तान की बंपर ओपनिंग कराई। एक लाख दस हजार से भी ज्यादा कापी बेचने का हिंदुस्तान का रिकॉर्ड है, पर यह रिकार्ड बरकरार नहीं रह पाया। आज साठ हजार से भी कम अखबार छपता है और लगातार घट रहा है। दिल्ली और नोयडा में बैठे लोग कारण नहीं खोज पा रहे हैं, इसलिए ऊल-जलूल निर्णय लेकर अखबार को और भी गड्डे में डाल रहे हैं।

असलियत में दैनिक जागरण और अमर उजाला छोड़ कर शोषित और स्वार्थी प्रवृति के दो तरह के लोग आए थे। स्वार्थी प्रवृति के लोग अखबार लांच होते ही लूटने में व्यस्त हो गए और चापलूसी के साथ ऊपर वालों को माल खिलाने के चलते प्रबंधन के चहेते हो गए। उनका एकमात्र काम लूटना ही रह गया, तो शोषित वाले वर्ग के कर्मचारियों पर बोझ बढ़ गया। सीमा से अधिक काम न कर पाने पर लूटने वाले वर्ग ने उनका यहाँ भी शोषण शुरू करा दिया। अखबार से सबका ध्यान हट गया और राजनीति, कूटिनीति व षड्यंत्र के खेल शुरू हो गए, जिसमें कुछ शातिर शहीद हो चुके हैं, तो कुछ बेक़सूरों की भी बलि दी जा चुकी है। इस पर ध्यान देने की बजाए संपादक को बदल दिया जाता है।

नया संपादक आकर शुरू के दस दिन यही जानकारी जुटाता है कि पिछले वाले किस-किस से अच्छे से बात करते थे और उन्हीं की ऐसी-तैसी करनी शुरू कर देता है। काम की जगह नया संपादक भी राजनीति करता है, तो घाघ किस्म के पत्रकार एक होकर संपादक को ही फेल करा देते हैं। ऐसा कई संपादकों के साथ हो चुका है। आशीष व्यास जैसे व्यक्ति समाज में भी हजारों में एक-दो मिलता है, पर बरेली की राजनीति ने उन्हें भी रुसवा कर दिया। अखबार के अंदर के हालात इतने खराब हैं कि अधिकांश लोग भागना चाहते हैं, पर हिंदुस्तान का वेतन और पद स्मैक का काम कर रहा है, जो कोई और देने को तैयार ही नहीं है, जिससे शोषण करा रहे हैं या अपने को सेफ रखने के लिए षडयंत्रों को खुद भी रच रहे हैं।

शशि शेखर कभी-कभी आकर शिव खेड़ा की तरह प्रवचन देकर उत्साह और शक्ति का संचार कर चले जाते हैं, पर उनके प्रवचनों का असर इसलिए नहीं होता कि वह संपादक को तानाशाह बना कर तैनात करते हैं, जो मार-काट करने के अलावा और कुछ जानता ही नहीं है, पर कहा जाता है कि शशि शेखर गधे पर मेहरबान हो जाएँ, तो वह उसे ही शेर बना देते हैं, बरेली में भी योगेन्द्र रावत को ऐसा ही ओहदा दे रखा है, जबकि वह खबर तक लिखना नहीं जानते और इससे पहले किसी बड़े अखबार में नहीं रहे। खैर, फिलहाल लोकसभा चुनाव को लेकर अपने मोहरे फिट करने को लेकर हिंदुस्तान में गृह युद्ध जैसी हालत है। देखते हैं कि कौन-कौन शहीद होता है और कौन-कौन बचता है?

पत्रकार बीपी गौतम की रिपोर्ट.

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