लखनऊ। अपने कलम की हिफाजत में अपनी जानें कुर्बान कर देने वाले पत्रकारों की याद में आज की पत्रकारिता में उल्लेखनीय भूमिका अदा करने वाले पत्रकारों को अवार्ड देकर मई दिवस यादगार दिन में बदल गया। उर्दू मीडिया गिल्ड ने पहली मई को मजदूर दिवस को जश्न-ए-नूर की शक्ल में मनाया और मजदूरों की सबसे पहले हिमायत करने वाली हजरत फातिमा जहरा को यह दिन समर्पित कर दिया।
उर्दू मीडिया गिल्ड द्वारा रिवर बैंक कालोनी स्थित आईएमए हाल में आयोजित अवार्ड समारोह में सुप्रसिद्ध पत्रकार सईद नकवी, उत्तराखंड के पूर्व लोकायुक्त जस्टिस हैदर अब्बास रजा, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व सीनियर जज जस्टिस प्रदीप कांत, उर्दू-अरबी-फारसी विश्वविद्यालय के कुलपति अनीस अंसारी, लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. रूपरेखा वर्मा और हिन्दुस्तान टाइम्स की सम्पादक सुनीता एरन ने लखनऊ के उन पत्रकारों को अवार्ड देकर सम्मानित किया जिन्होंने प्रिन्ट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में अपने कलम और अपने तेवर के जरिये पत्रकारिता की इज्जत में इजाफा किया।
वरिष्ठ पत्रकार सईद नकवी ने हफीज नोमानी और ब्लिट्ज व इंकेलाब के सम्पादक रह चुके फुजैल जाफरी को उनकी उल्लेखनीय पत्रकारिता के लिए लाइफ टाइम अचीवमेन्ट अवार्ड से सम्मानित किया। हफीज नोमानी अवार्ड लेने व्हील चेयर पर आइएमए हाल पहुंचे। उन्हें अवार्ड देने के लिए सईद नकवी मंच से उतरकर नीचे आए तो नोमानी साहब के सम्मान में खचाखच भरा हाल तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज उठा।
जस्टिस हैदर अब्बास रजा ने रायटर के संवाददाता शरत प्रधान और एनडीटीवी के संवाददाता कमाल खान को मौलवी मोहम्मद बाकर सहाफत अवार्ड से सम्मानित किया। जस्टिस प्रदीप कांत ने राष्ट्रीय सहारा के ताहिर अब्बास और इंकलाब के अहमद जावेद को सदासुखलाल और हरिदत्त सहाफत अवार्ड से सम्मानित किया। ईटीवी उर्दू के ब्यूरो प्रमुख डॉ. तारिक कमर को हिन्दुस्तान टाइम्स की सम्पादक सुनीता एरन ने मिर्जा बेदार बख्त सहाफत अवार्ड से सम्मानित किया। वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता वंदना मिश्रा को प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा ने मिर्जा बेदार बख्त सहाफत अवार्ड दिया।
उर्दू-अरबी-फारसी विश्वविद्यालय के कुलपित अनीस अंसारी ने वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर को मिर्जा बेदार बख्त सहाफत अवार्ड, आईबीएन-७ के सत्यवीर सिंह को मुंशी अजीमुल्लाह खान सहाफत अवार्ड, नया दौर के सम्पादक डॉ. वजाहत हुसैन रिजवी को सैय्यद जमीलुद्दीन हिजरा सहाफत अवार्ड और ईटीवी इलाहाबाद के हुसैन अख्तर को सम्मानित किया।
पत्रकारिता के क्षेत्र में सारी दुनिया में अपनी अलग पहचान रखने वाले सईद नकवी ने मुख्य अतिथि के रूप में इस अवार्ड समारोह में १८५७ से १९४७ के बीच उर्दू अखबारों ने जंगे आजादी के लिए जो कोशिशें कीं उसे जानने के लिए काफी अध्ययन की जरूरत बतायी। उन्होंने कहा कि अगर तारीख को प्रिजर्व करने का शौक नयी पीढ़ी में पैदा नहीं होगा तो धीरे-धीरे तमाम तारीखी चीजें खोती चली जाएंगी। उन्होंने याद किया रायबरेली के उस ऐतिहासिक इमली के पेड़ को जिस पर जंगे आजादी के दीवनों को फांसी पर लटकाया गया था। उस पेड़ को संरक्षित करने के बजाय उसे काटकर उस जगह पर ट्रांसफार्मर रख दिया गया। उन्होंने कहा कि इतिहास को इसी तरह से तोडऩे-मरोडऩे और भुलाने की कोशिशें की जा रही हैं।

जस्टिस प्रदीप कांत ने कहा कि इतिहास को जानने के लिए यह जरूरी है कि उसे पढ़ा भी जाए। उन्होंने अफसोस जताया कि उर्दू पढऩे में लोगों की रूचि कम हो गयी है। उन्होंने कहा कि जब पढऩे में ही रूचि नहीं रहेगी तो फिर इतिहास को जानने की तमन्ना कभी पूरी नहीं हो पाएगी। जस्टिस प्रदीप कांत ने कहा कि यह अजीब सी बात लगती है कि मेरे बहुत से मुसलमान दोस्त भी उर्दू को पढ़ नहीं पाते हैं। उन्होंने कहा कि अखबारों का रोल हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है और रहेगा। इलेक्ट्रानिक चैनलों पर तो सिवाय सियासत के कुछ नजर ही नहीं आता है। चैनलों पर जो बहस दिखायी देती है वह भी सियासत पर ही होती नजर आती है। साहित्य या इतिहास पर कभी कहीं कोई कोशिश दिखती ही नहीं है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में डर की कोई गुंजाइश नहीं है। जैसे ही उसमें डर शामिल हो जाता है वैसे ही वह दागी हो जाती है। इंसानियत को सबसे बड़ा ईमान बताते हुए उन्होंने यह उम्मीद जाहिर की कि ताकतवर लोगों को कमजोरों का सहारा बनना चाहिए। मजदूर दिवस यही अहसास कराने के लिए है कि मजदूरों के बगैर समाज आगे नहीं बढ़ सकता है।
जस्टिस हैदर अब्बास रजा ने इस मौके पर हजरत फातिमा जहरा और हजरत अली अलैहिस्सलाम की उन कोशिशों पर रौशनी डाली जिसमें उन्होंने मजदूरों के हक में आवाज उठायी थी। उन्होंने कहा कि दुनिया की सबसे बड़ी हुकूमत के हुक्मरां होने के बावजूद हजरत अली ने कभी खुद की भलाई के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने जो भी किया वह मजदूरों और कमजोरों के हक में किया। जस्टिस रजा ने कहा कि जिन पत्रकारों को आज अवार्ड दिया गया है उनकी इज्जत को हमने नहीं बढ़ाया है। सच्चाई यह है कि उन्होंने यह अवार्ड हमसे कुबूल कर हमारी इज्जत में इजाफा कर दिया है।
प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा ने कलम की आजादी की लड़ाई लडऩे वालों को सलाम करते हुए कहा कि कलम की लड़ाई ही दुनिया को बनाने के काम आती है। जिन विभूतियों को अवार्ड मिला उन्हें रूपरेखा वर्मा ने मुबारकबाद दी।
प्रोफेसर शारिब रुदौलवी ने कहा कि जिन नामों से अवार्ड मिले हैं, यह वह नाम हैं जिन्होंने कलम की हिफाजत में अपनी जानें कुर्बान की हैं। उन्होंने कहा कि मई दिवस को यौम-ए- जहरा से जोडऩा बहुत अच्छी बात है। उन्होंने कहा कि हजरत फातिमा जहरा ने न सिर्फ मजदूरों के हक की आवाज को सबसे पहले उठाया बल्कि उन्होंने काले-गोरे के फर्क को भी खत्म किया। उर्दू मीडिया गिल्ड के जनरल सेक्रेटरी को इस आयोजन की बधाई देते हुए शारिब रुदौलवी ने कहा कि इस तरह के आयोजनों को जारी रखने की जरूरत है।
हिन्दुस्तान टाइम्स की सम्पादक सुनीता एरन ने यह माना कि पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन में बदल चुकी है लेकिन आज भी पत्रकारिता ही वह क्षेत्र है जो समाज निर्माण में पूरी जद्दोजहद कर रहा है। शरत प्रधान ने इस आयोजन के लिए उर्दू मीडिया गिल्ड के जज्बे को सलाम करते हुए कहा कि जंगे आजादी के हीरो को याद करना बड़ी बात है। खुशबीर सिंह शाद के शेर 'हम अपने दर्द की शिद्दत को कम नहीं करते, जरा सी बात पे आंखों को नम नहीं करते' के जरिये अपनी बात लोगों तक पहुंचायी।
सीतापुर के मुख्य विकास अधिकारी शाहिद मंजर ने इस मौके पर कहा कि अब तक के इतिहास में किसी भी खातून को ऐसी इज्जत नहीं मिली कि उसके आने पर उसका बाप उठकर खड़ा हो जाए। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया क्राइसिस आफ आइडियल्स से जूझ रही है। हम जिसे अपना आदर्श बनाते हैं उसे पूजा का जरिया समझ लेते हैं। जैसे सीता को हिन्दुस्तान के लोग अपना आदर्श मानते हैं तो उन्हें पूजा तक सीमित कर दिया लेकिन निजी जिन्दगी में ब्रिटनी स्पियर्स से प्रेरणा लेने लगे हैं। यही वजह है कि हमारे समाज में औरतों पर लगातार जुल्म हो रहे हैं।
शायर संजय मिश्रा शौक ने कहा, 'जिस कल्ब से गायब है अली की खुश्बू, उस कल्ब में कुरआन नहीं ठहरेगा'। उर्दू मीडिया गिल्ड के जनरल सेक्रेटरी वकार रिजवी ने आए हुए मेहमानों का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि जंगे आजादी में अहम रोल निभाने वाले पत्रकारों के नाम पर अवार्ड की परम्परा नहीं थी। उर्दू मीडिया गिल्ड ने यह शुरुआत इसलिए की ताकि जंगे आजादी के लिए अपनी कुर्बानियां देने वाले पत्रकारों की याद को जिन्दा रखा जा सके। उन्होंने कहा कि मजदूर दिवस को हजरत फातिमा जहरा से जोडऩे की सबसे बड़ी वजह यही है कि हजरत फातिमा जहरा ने ही सबसे पहले मजदूर की आवाज को उठाया था। अपने नौकर को एक दिन की छुट्टी देकर खुद काम करते हुए उन्होंने यह अहसास दिलाया कि मजदूर भी इंसान ही होता है। कार्यक्रम का संचालन लखनऊ विश्वविद्यालय की रशियन विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. साबरा हबीब ने किया।





