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मीडिया का चिटफंड काल यानी पत्रकारिता का बुरा हाल

चैनलों और अखबारों में इन दिनों पश्चिम बंगाल की चिट फंड जैसी कंपनी- शारदा की हजारों करोड़ रूपये की धोखाधड़ी और घोटाले की खबर सुर्ख़ियों में हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, शारदा समूह की कंपनियों ने बंगाल और उसके आसपास के राज्यों के लाखों गरीब और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों से विभिन्न जमा स्कीमों में लुभावने रिटर्न के वायदे के साथ हजारों करोड़ रूपये लूट लिए.

चैनलों और अखबारों में इन दिनों पश्चिम बंगाल की चिट फंड जैसी कंपनी- शारदा की हजारों करोड़ रूपये की धोखाधड़ी और घोटाले की खबर सुर्ख़ियों में हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, शारदा समूह की कंपनियों ने बंगाल और उसके आसपास के राज्यों के लाखों गरीब और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों से विभिन्न जमा स्कीमों में लुभावने रिटर्न के वायदे के साथ हजारों करोड़ रूपये लूट लिए.

हालाँकि पश्चिम बंगाल या अन्य दूसरे राज्यों में कथित चिट फंड या ऐसी ही दूसरी निवेश कंपनियों द्वारा लोगों को झांसा देकर उनकी गाढ़ी कमाई लूटने की यह पहली घटना नहीं है. लेकिन हर बार की तरह इस मामले में भी जब शारदा समूह की कम्पनियाँ लोगों को बेवकूफ बनाने और उनका पैसा हडपने में लगी हुई थीं तो न सिर्फ राज्य और केन्द्र सरकार, रिजर्व बैंक और सेबी, पुलिस और प्रशासन आँखें बंद किये रहे बल्कि अखबार और चैनल भी सोते रहे. यह अकारण नहीं था.

रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में सत्ताधारी तृणमूल और कांग्रेस से जुड़े नेताओं, सांसदों, मंत्रियों और अधिकारियों के अलावा पत्रकारों-मीडिया मालिकों के नाम उछल रहे हैं जिन्होंने इस लूट में खूब माल उड़ाया और ऐश की. मजे की बात यह है कि अब यही चैनल और अखबार ऐसे हंगामा काट रहे हैं, जैसे उन्हें इस घोटाले के बारे में पहले कुछ पता ही नहीं था.       

यह सिर्फ संयोग नहीं है कि शारदा समूह का सी.एम.डी और चेयरमैन सुदीप्तो सेन न सिर्फ खुद कई चैनलों, अख़बारों और पत्रिकाओं का मालिक था बल्कि उसने बंगाल और असम में कई और मीडिया समूहों में भी निवेश कर रखा था. यही नहीं, वह इस क्षेत्र के अखबारों और चैनलों का एक बड़ा विज्ञापनदाता भी था. सच यह है कि वह बंगाल का उभरता हुआ मीडिया मुग़ल था जिसके चैनलों और अख़बारों ने तृणमूल के पक्ष में हवा बनाने में खासी भूमिका निभाई.

लेकिन शारदा और सुदीप्तो का असली धंधा मीडिया नहीं था बल्कि उसने चैनल और अखबार अपनी साख बनाने, अपनी फर्जी निवेश/रीयल इस्टेट/ट्रेवल कंपनियों के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण हासिल करने और पत्रकारों/मीडिया का मुंह बंद करने के लिए शुरू किये थे. लेकिन शारदा समूह और सुदीप्तो अपवाद नहीं हैं. इससे पहले भी कुबेर से लेकर जे.वी.जी जैसी कई चिट फंड कम्पनियों में लोगों का सैकड़ों करोड़ रुपया डूब चुका है जो मीडिया बिजनेस में भी खूब धूम-धड़ाके के साथ उतरे थे. इनाडु से लेकर सहारा जैसी कई कंपनियों इसी रास्ते आगे बढ़ीं.

यही नहीं, आज भी बंगाल और पूर्वोत्तर भारत से लेकर पूरे देश में ऐसी दर्जनों छोटी-बड़ी कम्पनियाँ हैं जो लाखों-करोड़ों लोगों को लुभावने और ऊँचे रिटर्न का झांसा देकर इस या उस स्कीम में पैसे बटोर रही हैं, उसका कुछ हिस्सा अख़बारों और चैनलों में और कुछ हिस्सा राजनेताओं, अफसरों और पत्रकारों में निवेश कर रही हैं.   

नतीजा यह कि इन चिट फंड/निवेश कंपनियों की मदद से आए दिन नए चैनल और अखबार खुल रहे हैं, पत्रकारों और संपादकों को नौकरियां मिल रही हैं और चौथा खम्भा ‘मजबूत’ हो रहा है. सच पूछिए तो पिछले एक-डेढ़ दशकों में मीडिया कारोबार के ‘विकास और विस्तार’ में इन चिट फंड और निवेश कंपनियों का ‘भारी योगदान’ रहा है. भारतीय पत्रकारिता के ‘चिट फंड काल’ के ‘विकास’ में उनके इस ‘योगदान’ को देखते हुए किसी मीडिया समूह को सुदीप्तो सेन, शारदा, कुबेर, जे.वी.जी आदि के नामों से पत्रकारिता पुरस्कार शुरू करने चाहिए. उन्हें स्पांसरशिप की चिंता करने की जरूरत नहीं है. कोई न कोई 'सहारा' मिल ही जाएगा.

आईआईएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान का यह लेख उनके ब्‍लॉग तीसरा रास्‍ता से साभार लिया गया है. यह तहलका में भी प्रकाशित हो चुका है.

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