उत्तरीय लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी (डीओबी) सेक्टर से कई दिनों बाद राहत भरी खबर आई है। चीन की सेना (पीएलए) ने यहां भारतीय सीमा में 19 किमी अंदर तक घुसपैठ करके पांच कैंप लगा लिए थे। पीएलए के 50 जवान 15 अप्रैल से यहां डंट गए थे। कैंपों की निगरानी के लिए ये लोग अपने साथ खूंखार कुत्ते भी लाए थे। बड़े पैमाने पर इनके पास आधुनिक हथियार भी थे।
भारत सरकार ने अगले दिन से ही इस घुसपैठ पर विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया था। लेकिन, चीनी सेना ने अड़ियल रुख अपनाकर यही कहना शुरू कर दिया था कि उन्होंने जो कैंप लगाए हैं, वह चीन के अधिकार वाला क्षेत्र ही है। ऐसे में, वे लोग यहां से अपना कब्जा नहीं हटाने वाले। चीन के इस जिद्दी रुख से पूरे देश में चिंता बढ़ गई थी। संसद में भी विपक्षी दलों ने सरकार के नरम रवैए को जमकर कोसा था। जबकि, सरकार को शुरू से ही भरोसा था कि सीमा विवाद का यह टंटा भी आपसी संवाद से सुलझा लिया जाएगा।
अंतत: 5 मई की शाम को हुई निर्णायक फ्लैग मीटिंग में बात बन गई। पीएलए के कमांडर इस बात के लिए राजी हो गए कि वे लोग डीओबी सेक्टर में लगाए गए अपने कैंप कुछ घंटों में ही हटा लेंगे। इस तरह से 15 अप्रैल के पहले वाली स्थिति बरकरार हो जाएगी। लेकिन, इस ‘समझदारी’ के पीछे भारत को भी एक कदम पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा है। क्योंकि चीनी सेना को यह बात हजम नहीं हो रही थी कि डीओबी सेक्टर के आस-पास भारत ने विकास के नाम पर कई बुनियादी ढांचागत निर्माण कार्य करा लिए हैं। इस क्षेत्र में ढांचागत निर्माण की कई परियोजनाएं जारी भी हैं। समझौते के तहत भारत इन योजनाओं का काम स्थगित करने के लिए राजी हो गया है। इसी के साथ चीन ने अपना रुख नरम कर लिया है। खबर तो यह भी है कि भारत ने इस इलाके में बनाए गए अपने कई बंकर भी तोड़ दिए हैं।
क्या अपने अवैध कब्जे को हटाने के एवज में चीन ने कोई बड़ी सौदेबाजी कर ली है? इसको लेकर यहां राजनीतिक हल्कों में कई आशंकाएं भी पैदा हो गई हैं। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, भारत ने चूमर सेक्टर में अपनी चौकियों और बंकरों के निर्माण रोक देने का वायदा किया है। जबकि, रक्षा विशेषज्ञ सामरिक दृष्टिकोण से यहां पक्की चौकियों का निर्माण कई लिहाज से जरूरी मानते रहे हैं। लेकिन, इस मामले में यही कहा जा रहा है कि ऐसे विवादों का निपटारा हमेशा कुछ ले-देकर ही होता है। इसलिए यह नहीं कहा जाना चाहिए कि भारत ने कोई बड़ी कीमत देकर समझौता किया है।
मेजर जनरल (रिटा.) दीपांकर बनर्जी ने चीन की ताजा घुसपैठ खत्म होने के बाद यही कहा है कि यह मामला भारतीय कूटनीति की एक बड़ी सफलता है। चीनी उकसावे के बाद भी भारत ने बड़े धैर्य और कौशल से इस मामले को निपटाया है। दो बड़ी शक्तियों के बीच सीमा जैसे विवाद हमेशा आपसी संवाद से ही सुलझाए जा सकते हैं। उन्हें इस बात की हैरानी है कि इस मामले में कुछ कथित रक्षा विशेषज्ञ और कई दलों के बड़े नेता भी उकसावे वाली बातें कर रहे थे। जबकि, इन्हें मालूम होना चाहिए कि सीमा पर भारत-चीन के बीच छोटी-सी सैन्य मुठभेड़ भी दोनों देशों के लिए बड़ी बर्बादी का कारण बन सकती है। मेजर जनरल बनर्जी का सुझाव है कि इस मौके पर भारत सरकार को अपनी कूटनीतिक रणनीति के जरिए चीन को और विश्वास में लेना चाहिए। ताकि, सीमा के बड़े विवाद सुलझाने के लिए कुछ कारगर फार्मूले बन सकें।
लेकिन जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला सीमा विवाद पर हुए इस समझौते को लेकर कुछ आशंकित हैं। उन्होंने मांग कर दी है कि रक्षा मंत्रालय देश को यह बताए कि चीनी सेना ने अवैध कब्जा छोड़ने के एवज में भारत से क्या करार किया है? क्योंकि, ऐसा लगता है कि डीओबी के कुछ इलाकों से भारतीय सैनिक भी हटाए गए हैं। इसको लेकर लद्दाख के स्थानीय निवासियों में कई तरह की अफवाहें भी फैल रही हैं। अच्छा यही रहेगा कि आधिकारिक रूप से रक्षा मंत्रालय स्थिति स्पष्ट करे।
चीनी सेना अब डीओबी सेक्टर के राकीनाला से 30 किमी दूर दक्षिण की ओर चली गई है। जबकि, डीओबी में उसके कब्जे से कराकोरम पास के हाइवे के लिए सुरक्षा खतरा बढ़ गया था। क्योंकि, डीओबी में कैंप लगाने से चीन की सेना आसानी से कराकोरम हाइवे की निगरानी कर सकती थी। यह स्थिति सामरिक दृष्टि से भारत के लिए ठीक नहीं होती। 9 मई को विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद चीन यात्रा पर जा रहे हैं। डीओबी में चीन की घुसपैठ के चलते खुर्शीद की यात्रा खतरे में पड़ गई थी। सूत्रों का दावा है कि भारत ने चीन सरकार से साफ-साफ कह दिया था कि यदि डीओबी से चीन के सैनिक नहीं हटते, तो दोनों देशों के बीच पारस्परिक रिश्तों में फर्क पड़ जाएगा। ऐसे में, विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की चीन यात्रा रद्द हो जाएगी।
उल्लेखनीय है कि 20 मई को चीन के नए प्रधानमंत्री ली ख छयांग दिल्ली की यात्रा पर आ रहे हैं। चीनी प्रधानमंत्री यह इच्छा जता चुके हैं कि चीन, भारत से अपने व्यापारिक रिश्तों को और विस्तार देना चाहता है। उन्होंने विश्वास जताया है कि सीमा सहित सभी विवाद दोनों देश आपसी संवाद से सुलझा लेंगे। जरूरी हुआ तो दोनों देश आधिकारिक स्तर पर नया संयुक्त तंत्र विकसित कर लेंगे। प्रधानमंत्री के बाद ली ख छयांग की यह पहली विदेश यात्रा है। उन्होंने पहली यात्रा के लिए भारत को ही चुना है। कूटनीतिक जानकारों का आकलन है कि इससे ही अनुमान लगता है कि चीन का नया नेतृत्व भारत से रिश्ते खराब नहीं करना चाहता। इसकी कई और वजहें भी हैं। यदि मौजूदा दौर में चीन की सेना डीओबी से अपने कैंप नहीं हटाती, तो चीनी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा भी खटाई में पड़ जाती। भारत ने बीजिंग को इस आशय के साफ-साफ संकेत भी दे दिए थे।
सवाल यह उठ रहा है कि क्या चीन की यह नरमी स्थाई प्रकृति की है या महज फौरी है? चीन के रवैए पर बहुत भरोसा करना कूटनीतिक जानकारों के लिए भी मुश्किल होता जा रहा है। क्योंकि, तमाम मीठी-मीठी बातें करने के बाद भी चीन के हुक्मरान टंटा खड़ा करने से बाज नहीं आते। 2005 में तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ भारत यात्रा पर आए थे। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण समझौते हुए थे। जियाबाओ की भारत यात्रा के बाद ही चीन का बाजार भारत में खूब फला-फूला। इस दौर में संयुक्त सचिव स्तर का एक ज्वाइंट फोरम भी बना था। उम्मीद की गई थी कि सीमा सहित तमाम फौरी विवाद सुझाने के लिए यह सिस्टम काफी कारगर रहेगा। दोनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यास करें। ताकि, दोनों सेनाओं के बीच दोस्ताना रिश्ते बने। इसका भी करार हुआ था। लेकिन, ये करार ज्यादा कारगर नहीं हो पाए। क्योंकि, 2008 से ही चीन की सेना ने भारतीय सीमा में लगातार घुसपैठ की वारदातें बढ़ा दीं। लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक पीएलए का कोई न कोई उपद्रव जारी रहा है।
2010 के दौर में लद्दाख क्षेत्र में पीएलए ने घुसपैठ की दो दर्जन से ज्यादा गंभीर कोशिशें की थीं। इससे दोनों देशों के रिश्तों में काफी तनाव पैदा हो गया था। इसी तनाव के दौर में चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने भारत यात्रा की थी। दिसंबर 2010 में वे दिल्ली आए थे। उस दौर में भी उन्होंने दिल्ली को पक्का भरोसा दिया था कि चीन, भारत का सच्चा दोस्त बनना चाहता है। ऐसे में, जरूरी है कि दोनों देश एक-दूसरे के प्रति विश्वास बढ़ाएं। इसी यात्रा के दौरान यह तय हुआ था कि दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच ‘हॉट लाइन’ जुड़ेगी। ताकि, शीर्ष स्तर पर सीधे संवाद की स्थिति भी बने। यह ‘हॉट लाइन’ चालू भी हो गई है। फिर भी, दोनों देशों के रिश्तों की तस्वीर कोई ज्यादा सुहावनी नहीं हो पाई।
चीन ने भारत पर दबाव बढ़ाने के लिए पाकिस्तान के हुक्मरानों से ज्यादा ‘दोस्ती’ गांठ ली है। पीओके (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) के इलाके में इस्लामाबाद से हाथ मिलाकर बीजिंग के हुक्मरानों ने इस क्षेत्र में कई हजार सैनिक उतार दिए हैं। पीओके में कई स्थानों पर चीन की सेना बड़े निर्माण कार्य भी करती रही है। ये सभी काम भारत की सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक माने जा रहे हैं। 2011 में तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वी के सिंह ने दावा किया था कि पीओके में चीन के चार से पांच हजार सैनिक मौजूद हैं। इसीलिए सेना को ज्यादा सतर्क रखना पड़ रहा है। हालांकि, इस मामले में चीन ने कभी भी साफ-साफ कोई जानकारी नहीं दी। मौजूदा दौर में भी पीओके में चीन की तरफ से कई आधारभूत बड़े ढांचे खड़े किए गए हैं। जाहिर है इन कामों से चीन, भारत पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव भी बनाने की कोशिश करता रहा है।
रक्षा विशेषज्ञ भरत वर्मा का मानना है कि सहज रूप में चीन की नीयत पर पूरा भरोसा कर लेना ठीक नहीं रहेगा। क्योंकि, चीन के हुक्मरान अपने वायदों पर कायम नहीं रहते। हाल के वर्षों की इनकी गतिविधियों से भी इस बात की पुष्टि होती है। चूंकि, चीन के लिए भारत एक बड़ा बाजार है। ऐसे में, वह चालाकी से अपने व्यवसायिक हितों को बचाने के लिए तमाम दरियादिली दिखाने की कोशिश करता है। ऐसे में, भारत सरकार को यह बात पक्की कर लेनी चाहिए कि अब दोबारा डीओबी क्षेत्र में चीन की सेना कभी अपनी दावेदारी नहीं करेगी। क्योंकि, डीओबी क्षेत्र में कब्जे के पीछे चीन की रणनीति कराकोरम हाइवे पर ‘फ्लाइंग प्रोटेक्शन’ देने की हो सकती है। उल्लेखनीय है कराकोरम हाइवे पाक को चीन से जोड़ता है। सामरिक लिहाज से यह महत्वपूर्ण सड़क है। लेकिन, ऊपरी इलाके में भारतीय फौज के रहते चीन की सेना सुरक्षा के लिहाज से ठीक नहीं मानती।
1962 में भारत-चीन के बीच एक बड़ी सैन्य झड़प हो चुकी है। इसके चलते दोनों देशों के रिश्ते कई सालों तक काफी खराब रहे हैं। 1976 में दोनों देशों के बीच राजदूत स्तर के रिश्ते फिर से कायम हुए थे। 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बीजिंग की यात्रा की थी। इस यात्रा के बाद ही दोनों देशों के बीच रिश्तों की गर्मजोशी शुरू हुई थी। सीमा विवाद निपटाने के लिए इस दौर में ‘ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप’ भी बना था। शुरुआती दौर में इस वर्किंग ग्रुप की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही थी। 1998 में जब भारत ने परमाणु परीक्षण किया, तो एक साल तक दोनों देशों के बीच रिश्तों में फिर से कटुता आ गई थी। 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चीन की यात्रा की थी। इस यात्रा के दौरान कई बड़े द्विपक्षीय समझौते हुए थे। इस मौके पर भी सीमा विवाद सुलझाने के लिए चीन ने दोस्ताना संकल्प जताए थे। लेकिन, मुश्किल यह है कि चीन की सेना अपनी गतिविधियों से हर बार विश्वास भंग करने की पहल ही कर देती है। जाहिर है कि इसके पीछे कहीं न कहीं चीन के राजनीतिक नेतृत्व की इसमें रजामंदी जरूर रहती होगी।
डीओबी सेक्टर में जिस तरह से इस बार चीन ने अपने तंबू गाड़ दिए थे, तमाम दबाव के बावजूद वे हटने को तैयार नहीं थे। इससे स्थिति गंभीर होने के खतरे खड़े हो गए थे। लेकिन, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन और विदेश सचिव रंजन मथाई की खास पहल से चीन का रुख नरम पड़ा है। विदेश सचिव ने उम्मीद जाहिर की है कि चीनी प्रधानमंत्री ली ख छयांग की दिल्ली यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के हल के लिए कोई कारगर तंत्र जरूर विकसित कर लिया जाएगा। इस समय भारत-चीन के बीच करीब 5, 41,300 करोड़ रुपए का सालाना व्यापार हो रहा है। चीनी प्रशासन ने उम्मीद लगाई है कि अगले 5 सालों में यह व्यापार मौजूदा टर्न ओवर से दोगुना हो जाएगा। जबकि, भारत के औद्योगिक हल्कों में इस व्यापार बढ़ोत्तरी को लेकर चिंता जताई जा रही है। क्योंकि, जिस तरह से भारतीय बाजारों में चीन का माल पट रहा है, उससे कई बड़े खतरे दिखाई पड़ने लगे हैं। क्योंकि, चीन के व्यापार की वजह से कई क्षेत्रों में बेरोजगारी भी बढ़ने लगी है।
मुश्किल यह है कि एक तरफ चीन के हुक्मरान भारत के बाजार में अपने हिस्सेदारी बढ़ाने का लोभ कर रहे हैं। दूसरी
तरफ, ‘चीनी ड्रैगन’ अरुणाचल से लेकर लद्दाख तक लगातार उकसावे वाली कार्रवाईयां करता रहता है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, लद्दाख क्षेत्र में ही पिछले साल चीनी सेना ने करीब घुसपैठ की 400 वारदातें की हैं। भारतीय सीमा के पास लद्दाख क्षेत्र में चीन ने अपनी तरफ बड़े पैमाने पर सड़कें बनाई हैं और युद्धक अड्डे विकसित किए हैं। रक्षा विशेषज्ञ चीन की इन ताबड़तोड़ तैयारियों को सामरिक लिहाज से भारत के लिए ‘शुभ’ नहीं मान रहे। वैसे भी चीनी ड्रैगन हर मोर्चें पर फुफ्कारने से बाज कहां आ रहा है?
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





