Shambhunath Shukla : मुझ पर लगातार दबाव पड़ रहा है कि मैं अपने अखबारी जीवन के संस्मरण लिखूं। लिख तो लिए हैं लेकिन उन्हें पुस्तक रूप में छपाने का मतलब हिंदी पत्रकारों के बीच हाहाकार मचा देना है। वैसे भी जीवन भर अगर आप निष्पक्ष, न्यायप्रिय और ईमानदार संपादक रहे हैं तो आपके दुश्मनों की संख्या भी अनगिनत होगी। और सिर्फ पत्रकार ही नहीं गैर पत्रकार अखबार कर्मी भी आपके दुश्मन होंगे। चाहे वह सामान्य प्रबंधन के लोग हो, मार्केटिंग के लोग हों या एचआर के अथवा एकाउंट के।
कोई इसलिए नाराज होगा कि उसकी बीट क्यों बदली तो कोई इसलिए कि उसका बस्ता यानी कि डेस्क क्यों बदल दी? किसी-किसी को किसी शहर विशेष से बहुत लगाव होता है या कहा जाए कि उसके अपने तमाम निहित स्वार्थ होते हैं। आपने उसका शहर बदला नहीं कि अचानक कल तक आपको भगवान से भी ऊपर मानने वाला शख्स आपको परले दरजे का शैतान मानने लगता है। कोलकाता में तो एक सज्जन ने तो अपना ट्रांसफर रुकवाने के लिए एमडी के श्वसुर से सिफारिश करवा दी। शुक्र है कि मैने उन्हें कह दिया कि अब तो मैने तबादला कर दिया है अगर रुकवाना है तो अब आप अपने दामाद अथवा बेटी से ही कहिए। अब वही रुकवा सकते हैं। उस ट्रांसफर को नहीं रोकने के कारण कोलकाता के एक वरिष्ठ समाजवादी को मैने नाराज कर दिया। वे मारवाड़ी समाज में बड़ी प्रतिष्ठा रखते थे उसके बाद उन्होंने मुझसे बात करनी बंद कर दी। हालांकि जब मैं कोलकाता गया था वे सज्जन अगले ही रोज मेरे आवास पर मुझसे मिलने आए थे।
कानपुर में एक सज्जन डिप्टी न्यूज एडिटर हो जाने के बावजूद चीफ रिपोर्टर का पद नहीं छोडऩा चाहते थे। पहले के संपादकों ने उन्हें बनाए रखा तो वे ठीक थे मैने कामकाज उनके पद के अनुरूप कर दिया तो वे मेरे इतने बड़े दुश्मन हो गए कि चरित्र हनन पर उतर आए। लखनऊ में एक साथी शराब पीकर दफ्तर आया करते थे और पंचम तल से आई विज्ञप्तियां बनाया करते थे, मैने उन्हें टोका तो इतने नाराज हो गए कि छुट्टी पर चले गए। नोएडा में तो खैर तमाम लोग दुश्मन हुए लेकिन मेरठ से तो भगवान बचाए। किसी की बीट तक बदलो तो फौरन वह दुहाई देने लगता कि देखिए मेरे संबंध ऊपर तक हैं। लेकिन मैने किया वही जो मुझे सही लगा तो शायद इसकी वजह काम करने की मेरी अपनी शैली रही। पर अब शायद ऐसे लोग नहीं मिलेंगे।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के एफबी वॉल से साभार.





