आलोचना तो आलोचना है। लेकिन आलोचना की भाषा में अपसंस्कृति की बू आ जाये तो वह विवाद में आ जाता है। ऐसे ही एक आलोचक हैं कंवल भारती। जो अक्सर अपनी आलोचना में ऐसी बातें लिख मारते हैं, जिससे वे विवादों के घेरे में आ जाते हैं या फिर जानबूझ कर आना चाहते हैं ! क्योंकि वे जो टिप्पणी करते हैं उसकी भाषा कहीं से आलोचक की नहीं लगती। वे आलोचना में विषयवस्तु को खारिज तो करते हैं। साथ ही, लेखक व लेखन को खारिज करने में भी परहेज नहीं करते। आलोचना की भाषा जाहिर करती है कि वे अपने समक्ष किसी को स्वीकार नहीं करना चाहते ! खासकर दलित मुद्दे पर।
श्री भारती ने फेसबुक पर, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित मेरी पुस्तक ‘मीडिया में दलित ढूँढ़ते रह जाओगे’ की फेसबुकिया समीक्षा की। समीक्षा की भाषा ने सवाल खड़े किये। फेसबुक पर बहस शुरू हुई। मैंने समीक्षा का स्वागत किया। लेकिन उनकी भाषा का प्रतिरोध। मेरे प्रतिरोध पर वे बीच बहस छोड़ निकल लिये, मुझे “अंफ्रेंड” कर दिया। यही नहीं उनके विचारों से मेल नहीं खाते कमेंट करने वालों को भी अपने फेसबुक खाता से अनफेंड कर जाहिर कर दिया कि उनकी मंशा दलितों के पक्ष में खड़ा होना नहीं बल्कि द्विजों के साथ गठजोड़ बढ़ाना है। अब ये भला दलित मुद्दों पर बहस क्यों करेंगे।
मेरा प्रतिरोध कंवल भारती की ओर से की गयी आलोचना पर नहीं है, बल्कि उनके दलित विरोधी सोच से है, उनकी अपसंस्कृति से ओतप्रोत भाषा से है। जो कहीं से एक आलोचक की नहीं होती है। जहाँ तक मेरी पुस्तक ‘मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे’ का सवाल है तो इसमें ‘मीडिया‘ में दलितों हिस्सेदारी और दलित सरोकारों की अनदेखी को का मुद्दा बनाया गया है। ऐसे में कंवल भारती लिखते हैं कि, ‘इस किताब को देख कर कि इसमें किसी भी कोण से दलित पत्रकारिता पर गंभीर काम नहीं हुआ है। किसी विषय पर किताब कैसे लिखी जाती है, उसका रत्ती भर शिल्प भी लेखक नहीं जानता है। दरअसल यह किताब संजय कुमार के लेखों का संग्रह है और ये लेख भी उनकी गंभीर लेखन-प्रतिभा का परिचय नहीं देते हैं’। एक ओर तथ्यों को वे खारिज करते हैं और पुस्तक को लेखों का संग्रह बताते हुए किताब कैसे लिखी जाती है, शिल्प पर सवाल उठाया। यह अपने आप में विरोधाभास है। उन्होंने अपने कथन में प्रकाशक के उपर भी उंगली उठायी है। पुस्तक के प्रकाशक किसी परिचय के मोहताज नहीं है। शांति स्वरूप बौद्ध जी केवल प्रकाशक ही नहीं वे जाने माने विद्वान हैं। विभिन्न विषयों पर दर्जनों पुस्तकें लिख चुके हैं। कंवल भारती की यह वैचारिक-सामाजिक सोच स्वयं उन्हें कटधरे में खड़ा कर जाता है।
कंवल भारती की फेसबुकिया समीक्षा पर मेरा जवाब, ‘प्रतिरोध’ का है, उस प्रतिरोध का जो दलित विरोधी है। दलितमत को आगे बढ़ाने के बजाये श्री भारती पीछे ले जाना चाहते है । वैचारिक द्वंद के बीच वे घोषणा करते कि ‘मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे’ में जो सवाल छूट गये हैं उसे मैं उठाउंगा! तो उनके इस जज़बे को सलाम करता। लेकिन, उन्होंने दलित विमर्श को ही पीछे ठकेलने का काम किया है। चर्चा में वे कहते हैं कि ‘मीडिया में दलित आना ही नहीं चाहते’। पता नहीं श्री भारती को यह आंकड़ा कहा से मिल गया। फारवर्ड प्रेस के मई13 के अंक में ‘जातीय पैकेजिंग के टी.वी. चैनल’ में वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने दलितों के मीडिया में आने और उनके प्रवेश पर अघोषित रोक पर लिखा है कि ,‘हर साल एक अच्छी-खासी संख्या में पिछड़े, दलित, आदिवासी लड़के-लड़कियां भारतीय जनसंचार संस्थान से डिग्री लेकर निकलते हैं। आईआईएमसी, भारतीय जनसंचार संस्थान में प्रवेश लेने के लिए इस वर्ग के लड़के-लड़कियां परीक्षा देते हैं। फिर कई परीक्षाएं पास करने के बाद वे डिग्री लेती हैं। लेकिन, उसके मीडिया संस्थानों में फिर उनकी योगता की परीक्षा शुरू होती है। वह मीडिया संस्थान चाहे सरकारी हों या पूंजीपति के। हर जगह इस वर्ग के युवा अयोग्य करार दिए जाते हैं दरअसल, समाजिक प्रतिनिधित्व की अपनी एक सीमा है और उस पर पूरा समाज आश्रित नहीं हो सकता।’
कंवल भारती के विरोधी तेवर से ऐसा लगता है कि वे दलित विमर्श पर अपना एकाअधिकार चाहते हैं वे जो लिखे वहीं बेहतर बाकी बेकार। उनकी समीक्षा का स्वर व्यक्ति विरोध में तब्दील हो जाता है। दलित चिंतक डा.धर्मवीर हो या दलित दस्तक के संपादक अशोक दास या फिर चर्चित लेखक सतनाम सिंह, कोई दलित-गैरदलित चिंतक-लेखक दलित विमर्श की बात करता है, तो कंवल भारती उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। भगवान दास जी की किताब ‘धोबी समाज’ के बारे में भी श्री भारती ने 30 अप्रैल 13 को अपने फेसबुक वाल पर लिखा, किताब के विरोध में खड़े हुए और जब उन्हें जवाब दिया गया तो खामोश हो गये। देखिये उन्होंने क्या लिखा………………
किताब ‘धोबी समाज’ के बारे में
(कँवल भारती)
किसी भी बड़े लेखक की किताब में अगर कोई कुछ अपना जोड़कर किताब में अपना नाम भी लेखक के साथ जोड़ दे, तो भले ही कोई उसपर ध्यान न दे, पर मेरी नजर में वो साहित्यिक अपराध है। ऐसी ही एक किताब है भगवान दास जी की ‘धोबी समाज’। यह एक छोटी सी पतली किताब थी, जिसे अब सतनाम सिंह ने अपना कुछ जोड़ कर 151 पृष्ठों की मोटी किताब बना दिया है और अब उसपर लेखक के रूप में भगवान दास और सतनाम सिंह दोनों के नाम छपे हैं। इसे सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है। इस पुस्तक को जो भी पढ़ेगा, उसे यही लगेगा कि इस किताब को भगवान दास और सतनाम सिंह दोनों ने मिलकर लिखा है जबकि ऐसा नहीं है। इस किताब को पढ़ कर किसी भी पाठक या शोध छात्र के लिए यह तय करना सम्भव ही नहीं है कि भगवान दास जी का लिखा हुआ कौन सा है और सतनाम सिंह का लिखा कौन सा है? जो लोग भगवान दास जी को मूल रूप में पढ़ना चाहते हैं, उन्हें इस किताब से कोई मदद नहीं मिलेगी। यह किताब भगवान दास जी की मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई है, इसलिए उनसे इस सम्बन्ध में पूछताछ भी नहीं की जा सकती। भगवान दास जी के पुत्र राहुल दास का वक्तव्य इस किताब में ‘अपनी बात’ के रूप में छपा है, जिसमें वह कहते हैं, ‘मैं सतनाम सिंह जी का ह्रदय से आभारी हूँ, जिन्होंने दिन-रात खोज करके पिता जी की पुस्तक के नये संस्करण में आभूषण जैसी सूचनाएँ जड़ दीं।’ यानी पिता की कृति में छेड़छाड़ के इस कर्म में पुत्र भी शामिल हैं। इसका कारण साहित्य में पुत्र राहुल दास की अरुचि और नासमझी भी हो सकती है, जिससे वह अपने पिता की कृति के महत्व को नहीं समझ सके। अगर भगवान दास जी जीवित होते, तो हरगिज वे सतनाम सिंह को ऐसा करने के लिए कभी अधिकार नहीं देते। मेरी राहुल दास जी से प्रार्थना है कि वह यह जो हुआ सो हुआ, पर आगे भगवान दास जी की कोई अन्य कृति के साथ ऐसा अपराध न कराएँ। सतनाम सिंह अपने अपराध का परिमार्जन इस तरह कर सकते हैं कि इसमें छपवाकर जोड़ें कि भगवान दास जी की मूल सामग्री कौन सी है और उनकी अपनी कौन सी है? यदि इस संस्करण में यह सम्भव न हो, तो अगले संस्करण में यह काम वह जरूर करें। मुझे इस किताब में ‘दो शब्द’ लिखने वाले डा0 विवेक कुमार से भी शिकायत है कि इस समस्या पर उनका ध्यान क्यों नहीं गया?
कंवल भारती के लिखे पर सतनाम सिंह ने जवाब दिया जिसे कपिल स्वरूप बौद्ध ने श्री भारती के वाल पर पोस्ट किया………..
कंवल भारती जी को ‘धोबी समाज’ पुस्तक के बारे में गलत फहमी है। यह पुस्तक भगवान दास और मेरे नाम सहित दास जी के जीते जी ही संवर्धित हो गई थी जिसे कंवल भारती जी उनके परिनिर्वाण के बाद छपी बता रहे हैं। सम्यक प्रकाशन में जब उन्होंने अपनी मात्र 8-10 पृष्ठों की ‘धोबी समाज’ पुस्तिका भेजी थी तो मैंने स्वयं उनसे कहा था कि अब तो धोबी समाज पर बहुत सी सामग्री उपलब्ध है। उन्होंने ही मुझसे वह सामग्री अपनी पुस्तिका में जोड़ने का आग्रह किया था। मैंने कठोर परिश्रम करते हुए उसमें वह सामग्री जोड़ी। पुस्तिका 8-10 पृष्ठों से 152 पृष्ठों की बन गई। यह परिश्रम मैंने को-राईटर के रूप में अपना नाम छपवाने के लालच में नहीं किया था। भगवान दास जी ने उसमें से कुछ सामग्री हटा दी, कुछ नई जोड़ दी। साथ-ही-साथ सम्पादन भी कर दिया। जब उन्होंने फाईनल प्रूफ छपने के लिए भेजा, तो को-राईटर के रूप में उन्होंने अपने नाम के नीचे मेरा नाम स्वयं ही लिख भेजा। पाण्डुलिपि के साथ ही उन्होंने कवरिंग लेटर भी लिखा था, उसमें भी उन्होंने भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए मेरा नाम अपने नाम के साथ को-राईटर के रूप में लिखने के लिए लिखा। यह बात मैंने पुस्तक में प्रकाशित अपनी भूमिका में भी लिख दी है, जिसे कंवल भारती जी अनदेखा कर गए हैं। वह पाण्डुलिपि प्रमाण स्वरूप आज भी सम्यक प्रकाशन के कार्यालय में मौजूद है। कंवल भारती जी उसे जांचने के लिए सम्यक प्रकाशन के कार्यालय में सादर आमंत्रित हैं। इस पूरी कवायद के गवाह स्वयं भगवान दास जी के बेटे डॉ. राहुल दास जी हैं। मुझे लगता है कि यदि कंवल भारती जी को इस बात की जानकारी होती और यह भी पता होता कि यह पुस्तक भगवान दास जी के जीते जी ही संवर्धित हो गई थी, तो फिर वे ऐसी टिप्पणी ही न करते। पुस्तक के बैक कवर पर लेखक परिचय में भगवान दास जी की मृत्यु का इसीलिए जिक्र नहीं है कि टाईटल उनके जीते जी ही छपा। वैसे कंवल भारती जी को टिप्पणी करने से पहले सम्यक प्रकाशन से, मुझ से और डॉ. राहुल दास जी से पहले पूछताछ कर लेनी चाहिए थी। भगवान दास जी से मेरा भावनात्मक रिश्ता था। मैंने तो एक वयोवृद्ध मिशनरी की सहायता भर की थी, कृपया इसे साहित्यिक अपराध न कहा जाए। अपराध तब माना जाता, जब यह काम उनकी बिना सहमति से किया जाता। पुस्तक में डॉ. राहुल दास जी ने जो वक्तव्य दिया है वह एकदम सटीक है। क्यों कि उन्हें नहीं लगता कि उनके पिता की कृति से छेड़छाड़ हुई है। वे तो स्वयं लिख रहे हैं कि, ‘सतनाम सिंह जी का हृदय से आभारी हूं, जिन्होंने दिन रात खोज करके पिता जी की पुस्तक के नए संस्करण में आभूषण जैसी सूचनाएं जड़ दी हैं।’ कंवल भारती जी को ‘दो शब्द’ लिखने के लिए डॉ. विवेक कुमार जी से भी शिकायत है। डॉ. विवेक कुमार जी इतने कच्चे् खिलाडी नहीं हैं जितने की कंवल भारती जी उन्हें समझ रहे हैं। वे बिना छाने किसी भी तथ्य को ग्रहण नहीं करते। अतरू पुस्तक के संवर्धन का मेरा कमर तोड़ काम भगवान दास जी के जीते जी ही हो गया था और यह उनकी सहमति से ही हुआ था। वे इस काम से बेहद खुश थे। पुस्तक जब प्रेस में थी, उसी दौरान भगवान दास जी का दुखद देहांत हो गया। मुझे गर्व है कि ऐसे वरिष्ठ हस्ताक्षर के साथ मुझे धोबी समाज पर शोध करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तथा ‘धोबी समाज’ पुस्तक का को-राईटर बनने का मौका मिला। उनके हाथ का स्पर्श मैं अपनी पीठ पर आज भी महसूस करता हूं —सतनाम सिंह।
देखिये कंवल भारती ने मेरी पुस्तक “मीडिया में दलित ढूँढते रह जाओगे” पर भी फेसबुक पर 28 अप्रैल13 को क्या लिखा…………..
(कँवल भारती)
‘‘मीडिया में दलित ढूँढ़ते रह जाओगे’ दलित पत्रकारिता की सबसे घटिया किताब है। महिना भर पहले संजय कुमार की इस किताब की फेसबुक पर बहुत चर्चा थी। लखनऊ में उसका विमोचन हुआ था, उसके भी फोटो फेसबुक पर पोस्ट हुए थे। अतरू इसे पढ़ने की जिज्ञासा होना स्वाभाविक था। संयोग से पटना में अपने मित्र दलित लेखक इं राजेन्द्र प्रसाद के सौजन्य से यह पुस्तक मुझे मिल गयी। अव्वल तो किताब का नाम ही बहुत भद्दा है। जैसे किसी विज्ञापन में था-दाग ढूँढ़ते रह जाओगे, उसी को चुरा कर इसका नाम रख दिया-‘मीडिया में दलित ढूँढ़ते रह जाओगे’। यह भद्दा नाम भी चल जाता, अगर इसमें भारत की मीडिया का कोई ताजा सर्वे होता और कुछ अखबारों के अन्दर की कहानी होती। मीडिया में कुछ दलित पत्रकार काम भी कर रहे हैं। काश उनकी कहानी भी इसमें होती! बहुत अफसोस हुआ। इस किताब को देख कर कि इसमें किसी भी कोण से दलित पत्रकारिता पर गंभीर काम नहीं हुआ है। किसी विषय पर किताब कैसे लिखी जाती है, उसका रत्ती भर शिल्प भी लेखक नहीं जानता है। दरअसल यह किताब संजय कुमार के लेखों का संग्रह है और ये लेख भी उनकी गंभीर लेखन-प्रतिभा का परिचय नहीं देते हैं। उनसे बढ़िया और गंभीर काम तो पत्रकारिता पर डा0 श्योराज बेचैन और चंद्रभान प्रसाद कर चुके हैं।
संजय कुमार की इस किताब में क्या है? आइये देखते हैं। पहला अध्याय हीरा डोम की कविता ‘अछूत की शिकायत’ पर है, जो पत्रकारिता का विषय ही नहीं है। शुरुआत होनी चाहिए थी स्वामी अछूतानन्द की दलित पत्रकारिता से, जो उन्होंने बीस के दशक में ‘आदि हिन्दू’ अखबार निकाल कर शुरू की थी। शायद संजय कुमार को यह सब मालूम ही न होगा। दूसरा अध्याय वही है, जो किताब का नाम है। इसमें भी लेखक या उसकी टीम का अपना कोई सर्वे नहीं है। पहले जो सर्वे हो चुके हैं, उनको आधार बनाकर ही लेखक ने अपनी बात कहने की कोशिश की है। इसमें भी इस सवाल को पूरी शिद्दत से नहीं उठाया गया है कि मीडिया में दलित क्यों नहीं है ? दलित को लिया नहीं जाता या दलित मीडिया में जाना नहीं चाहते, इन दोनों सवालों पर चर्चा होनी चाहिए थी। अगर सर्वे किया जायेगा तो शायद हमें यह जानकार निराशा ही हो सकती है कि दलित जातियों में पत्रकारिता को पेशा बनाने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। क्यों? इस पर भी विचार होना चाहिए। एक अध्याय है-‘दलित सवालों की अनदेखी’। हिंदी पत्रकारिता में यह सबसे ज्वलंत मुद्दा है। लेकिन लेखक ने इसे सबसे ज्यादा हास्यास्पद बना दिया है। इस पूरे अध्याय को संजय कुमार ने रामगोपाल भारतीय की पुस्तक ‘दलित साहित्य के यक्ष प्रश्न’, से लेकर चूंचूं का मुरब्बा बना दिया है, जबकि इतने ज्वलंत मुद्दे पर हिंदी पत्रकारिता की वस्तुगत समीक्षा की जानी चाहिए थी। इसी तरह का मलीदा उन्होंने ‘दलित पत्रकारिता की दिशा’ और दलित पत्रकारिता’ अध्यायों में बनाया है।
इस पुस्तक को पढ़ कर पाठक को न तो दलित पत्रकारिता की जानकारी होगी कि वो क्या है और न दलित पत्रकारिता के उद्भव और विकास के बारे में वो कुछ जान पायेगा।’’
‘कंवल भारती के फेसबुकिया समीक्षा को मैंने स्वीकारा और अपनी बात रखी तो मुझे अनफेंड कर बहस को बीच में छोड़ भाग खडे हुए ! मैंने जो जवाब दिया………..
“मेरी किताब ‘मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे” को कंवल भारती जी ने फेसबुक पर समीक्षा करते हुए इसे घटिया पुस्तक बताया है। यानी दलित विमर्श उनकी नजर में घटिया है? मीडिया में दलित नहीं हैं उस पर चर्चा करना घटिया है? दलितों के सवाल मीडिया में नहीं उठते हैं-यह बताना घटिया है ? तो कंवल भारती जी यह पुस्तक घटिया ही सही!
‘मीडिया में दलित ढूँढते रह जाओगे’ शीर्षक पर सवाल उठाया है और उसे भद्दा विज्ञापन करार दिया है। क्या उन्हें पत्रकारिता की ए बी सी डी आती है ? मुझे लगता है-नहीं। अगर आती होती तो शायद इस तरह की बात नहीं करते? क्योंकि पत्रकारिता की नजर में शीर्षक होते ही आकर्षित करने के लिए हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ‘मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे’ दलित पक्ष में खड़ा है। जहाँ तक शीर्षक का सवाल है तो पुस्तक यहीं से दलित विमर्ष शुरू कर देता है। और यह सौ प्रतिशत सत्य है। अगर भारती जी इसे नकारते हैं तो यह उनकी बौद्धिक व सामाजिक सोच है ? या उनके द्विज मानसिकता का द्योतक होना दर्षाता है। जहाँ तक उन्होंने पुराना सर्वे का सवाल उठाया है तो लगता है पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। सर्वे के आंकड़े आज भी वैसे ही खड़े हैं और हां, आप ने शायद मेरी पुस्तक ठीक से नहीं पढ़ी, सरकारी मीडिया में दलितों की भागीदारी पर ताजा सर्वे है……जरा पन्ने पलट लें। और हां आपके पास कोई ताजा सर्वे हो तो कृपया दें अगलें संस्करण में डाल दिया जायेगा।
हीरा डोम पर आप भड़क क्यों गये! यहाँ भी आप चूक गये। आश्चर्य आप जैसे विद्वान चूक कैसे गये? किताब हीरा डोम को समर्पित है। वो इसलिए कि जो पीड़ा हीरा डोम ने 1913-14 में दर्ज करायी थी वह आज भी मौजूद है। पता नहीं आप जैसे द्विज मानसिकता वालों को दिखती क्यों नहीं ?
जहाँ तक अछूतानंद जी की बात है तो बता दूं , मेरी पुस्तक दलित सरोकार और मीडिया से है। दलित पत्रकारिता के इतिहास-उद्भव-विकास पर फोकस नहीं। मेरा मकसद मीडिया में दलित के वर्तमान संदर्भों को उठाना और उनकी भागीदारी-उनके सवालों को को लेकर खड़ा होना है। गोलबंद होना है। मुझे लगता है कि इस मामले में पुस्तक से कुछ काम हुआ भी है, जिस साथी से आपको पुस्तक मिली है वे मुझे व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते थे, उन्होंने पुस्तक खरीदी और फोन कर चर्चा भी की। देष भर से फोन/पत्र आये और मीडिया में दलितों की भागीदारी नहीं होने पर चर्चा हुई।
आपकी आलोचना का फिर भी स्वागत है। लेकिन मैं, इससे पीछे हटने वाला नहीं हूं। मेरी मुहिम दलित-शूद्र को हर धारा में आगे लाने को लेकर है और यह जारी रहेगी। आप जैसे द्विज सोच वाले मेरी सोच को हिला नहीं सकते। मुझे लगता है कि आपने ठीक से पुस्तक नहीं पढ़ी…….आलोचना होनी चाहिये लेकिन दंभता के साथ नहीं आपकी भाषा में दंभीपन की बू आती है तभी तो पुस्तक में श्री सतनाम सिंह के लिखे को भूल गये बल्कि गोल कर गये। खैर मैं अपनी पुस्तक के साथ दलित-शूद्र के पक्ष में खड़ा हूं। आपको लगता है कि यह पुस्तक खड़ा नहीं है तो आप लिख मारिये और खड़े हो जाइये। मैं आपका स्वागत करूगा।’’
संतनाम सिंह और मेरे जवाब के बाद कंवल भारती का खामोश होना दर्शाता है कि उनकी आलोचना साकारात्मक नहीं बल्कि अपने समाज व लेखकों की टांग खींचने व उन्हें हतोत्साहित करना भर है। सवाल खड़ा करता है कि उनका यह द्विज व्यवहार कैसा? कंवल भारती द्वारा बीच बहस से जाना और आ रही प्रतिक्रिया से बौखला कर दोस्तों की सूची से विरोध करने वालों को हटाना, जाहिर करता है कि उनकी विचारधारा ब्राह्मणवादी है। आलोचना सुनने का मादा उनमें नहीं दिखा। यह व्यवहार दिखाता है कि उनका दलित हित से कोई लेना देना नहीं बल्कि वे द्विज हित के पुरोधा है। आइये देंखे फेसबुक पर उनके लिखे और मेरे जवाब पर क्या कमेंट आया……..
-शम्भू दयाल वाजपेयी: किताब तो मैंने नहीं देखी अपने पत्रकारीय अनुभव से यह कह सकता हूं कि दोनों बातें होती हैं। लोग आते भी कम हैं और मठाधीशि व गुटबाजी में फंसे स्टाफ में इन्हें अपेक्षित संरक्षण-प्रोत्साहन और वरीयता भी नहीं मिलती। मेहनत और लिखने-उखने में ये किसी से कम नहीं होते। कथित सवर्ण भी पहले दिन से तीसमारखां नहीं होते। धीरे धीरे सीखते-बढते हैं।
-कंवल भारती: यह किताब इस विषय पर कोई चर्चा नहीं करती।
-संजीव खुदशाहः यह ठीक बात है, अच्छी को अच्छा और बुरी किताब को बुरा कहना। नाम से तो किताब मुझे भी अटपटी लगी।
-अनिल कुमार विशवा: सर, आपकी पुस्तक माझी जनता दलित पत्रकारिता और विमर्श में भी लेखांे का ही संग्रह है, उसमें भी दलित पत्रकारिता क्या है किसको कहते हैं ऐसा कुछ नहीं है।
-कंवल भारती: मुझे आपकी पढ़ाई पर तरस आता है।
-अनिल कुमार विशवा: आप लोगों की दिक्कत यही है।
-संजय कुमार: धन्यवाद भारती जी…….आपने मेरी किताब पढ़ी और समीक्षा की। सबसे पहले तो यह बता दूं कि यह पुस्तक दलित पत्रकारिता पर या इसके इतिहास-उद्भव-विकास पर नहीं है। मैंने ऐसा कहीं या किताब में भी कहा या लिखा नहीं है। इसमें सिर्फ मैंने मीडिया में दलितों की स्थिति की वस्तुस्थिति की चर्चा की है। लेकिन बताये कि जो लिखा, जो सवाल उठाए गए है, क्या वह गलत है ? किसी किताब में किन विषयों को उठाना चाहिये यह हर लेखक की अपनी सोच होती है अगर आप को ऐसा लगता है कि इन सवालों को लेकर किताब लिखी जानी चाहिये तो बेहतर होगा आप ही लिखें। वैसे तो शोध-सर्वे-चर्चा का कोई अंत नहीं है यह तो निरंतर चलता रहता है और बेहतरी के लिए चलते रहना भी चाहिये।
-कंवल भारती: आपसे काम करना ही नहीं आया।
-शेख अहमद: किताब के अंदर की सामग्री कुछ भी हो लेकिन किताब का नाम सच्चाई का आइना है।
-कवि विजय मिश्र विजय: कब तक ऐसी सोच रहेगी, ऐसा बोला जायेगा, जातिवाद का जहर देश में…..कब तक धोला जायेगा…….?
-कंवल भारती: शेख अहमद जी, नाम को सही साबित भी तो करना होता है।
-शेख अहमद: देखिये, कंवल जी अगर किताब ना भी छपे तो भी शीर्षक एक दम स्टीक है। क्योंकि मीडिया में सिर्फ बाह्मण का ही बर्चस्व है। लेकिन अफसोस ये कि बाह्मण इसके खिलाफ बोलने को जातिवाद का जहर कहते हैं ।
-कंवल भारती: मुझे बताएँगे कि इस वर्चस्व् को तोड़ने के लिए आपने या दलितों ने क्या किया ?
-शेख अहमद: बाह्मणवादी मीडिया बेहद खतरनाक जहर है जिसमें सिर्फ जेनउ को वरीयता मिलती है प्रतिभा को नहीं।
-कंवल भारती: शेख जी, न तो आप दलित हैं, और न आपने संजय कुमार की किताब पढ़ी है, फिर आप किस हैसियत से बात कर रहे हैं?
– स्वदेश कुमार कोरी: दलित चिंतन, दलित चिंतक और दलित चिंता में सबसे महत्वपूर्ण है पहले ये तय हो ।
-कंवल भारती: आपने तय किया क्या।
-शेख अहमद: मैं मीडिया से जुड़ा हूं और संजय जी कि किताब मैंने नहीं पढ़ी है लेकिन इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि दलितों की संख्या मीडिया में ढूंढने वाली हैं।
– स्वदेश कुमार कोरी: तय करने वाले तो सवर्ण होंगे।
-कंवल भारती: शेख जी, जब दलित मीडिया में जाना ही नहीं चाहते, तो आप क्या करेंगे ? आप इस फील्ड में कमेंट न ही करें तो ठीक होगा।
– स्वदेश कुमार कोरी: दलित मीडिया में नहीं जाते यह तो ठीक है, मीडिया में दलित कैसे जाये इस पर सोचा जाये।
-कंवल भारती: क्या आपके बच्चे मीडिया में गये ? अगर नहीं गये, तो क्यों?
– स्वदेश कुमार कोरी: हमारे बच्चे मीडिया में इस लिये नहीं जाते क्योंकि वो बनिये की नौकरी नहीं करना चाहते वो तो ठाकुर, पंड़ित की गुलामी करना चाहते हैं।
-कंवल भारती: आपको अपने सवाल का जवाब मिल गया अब आप खामोश हो जाये…गुड नाइट।
-संजय कुमार: मेरा मकसद मीडिया में दलित के वर्तमान संदर्भ को उठाना था, सवालों को खड़ा करना था और मुझे लगता है कि इस मामले में पुस्तक से कुछ तो काम हुआ ही है। अन्यथा आप यहाँ इस पुस्तक की चर्चा नहीं कर रहे होते ?
– कवि विजय मिश्र विजय: आदरणीय भारती जी, सादर जय भारती….मैं और उम्र में लगभग आपके समकक्ष हूं। उपर मेरे द्वारा लिखी गयी लाइन मात्र प्रसंगवस थी। उसे मात्र आप कविता में लें, अन्यथा नहीं, फिर भी यदि इस कविता विनोद से आपको कष्ट पहुंचा है तो मैं खेद व्यक्त करता हूं। आप जानना चाहते है इसलिये बता दूं कि मेरा छोटा भाई संपादक है, जिसका एक समाचार पत्र एवं दो पत्रिकाएं प्रकाशित होती है। मेरा दमाद एवं बेटी इलैक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े है, मेरा बेटा पत्रकार है, मेरे दो भतीजे भी प्रेस रिपोर्टर हैं। मेरा उद्देश्य आपको दुख पहुंचाना कतई नहीं था। शुभ रात्रि…….
-शेख अहमद: और कंवल जी आपने पहले ही क्यों नहीं इस पोस्ट पर नोटिस चिपकाया की कृपया गैर दलित इस पर कमेन्ट न भेजें चाहे वो पत्रकार ही क्यों न हो।
(कंवल भारती की समीक्षा से उठे प्रश्न का जवाब मैंने दिया मेरे जवाब के बाद श्री भारती ने मुझे अनफफ्रेंड किया। मेरे जवाब पर जो कमंट आया उसे यहाँ दिया जा रहा है)
-डा.पवन कुमार खरवार: संजय जी बुक बहुत बढिया लिखी है। मैंने पढी हैं। लेकिन आपने इसमें कुछ कमियां रखी अभी तक जो भी योगदान रहा हमारा उसका पेज भी होना चाहिये।
-संजय कुमार: जी, सही है कि कुछ कमियां हैं, रह जाती हैं । सबको एक बार में समेटना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। भविष्य में उस पर भी काम होगा, कई मित्रों ने बताया है कि काम हो भी रहा है। मै करूँ या कोई और !
-डा.पवन कुमार खरवार: दलित दस्तक पत्रिका में एक लेख था मीडिया में दलित उसका चैप्टर होता……खैर आप की किताब का इंजतार रहेगा…दूसरे संस्करण की जल्द उमीद करता हूं।
– सरजीत प्रताप सिंह: आदरणीय कँवल भारती जी सम्मानित ,गुणी एवं बहुत वरिष्ठ साहित्यकार हैं, उनकी आलोचना को एक अभिभावक की आलोचना के रूप में लिया जाना श्रेयकर होना चाहिए…बाकी मैं साहित्यकार नहीं हूँ ..तो ज्यादा बोल नहीं सकता।
– चंदन कुमार मधुकर: सर….आपको बहुत बहुत बधाई…हमारे समाज की एक कङवी सच्चाई पर आपने किताब लिखी है।
– अनिल कुमार विशवा: दलितों लेखकों में भी मठाधीशी शुरू हो गयी है।
-शेख अहमद: संजय जी कुछ लोग सिर्फ आलोचक होते हैं उनको इससे कुछ लेना देना नहीं की इस किताब के शीर्षक द्वारा यह सच सामने लाने की कोशिश की गयी है कि दिन रात समाज की बुराईयाँ और अत्याचार दिखाने गैर बराबरी का विरोध करने वाली मीडिया में भी भेदभाव की जड़ें कितनी गहरीं हैं ! तो कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी इस बात को उठाने के लिए संजय जी को बधाई देने के बजाये इस किताब में सिर्फ बुराईयाँ देखने के लिए दूरबीन लेकर बैठ गए वैसे अब आप को इस बात की चिंता करने की आवशकता नहीं है क्योंकि अब दलित मीडिया को कंवल जी जैसा महान उद्धारक जो मिल गया है।
– अनिल कुमार सिंह: मैं कंवल भारती जी को नहीं जानता, क्या दलित है?
-संजय कुमार: शेख अहमद जी बिल्कुल सही कहा है। मेरा भी मकसद यही है की तस्वीर क्या है और आलोचना से तो सीखने का अवसर मिलता है। लेकिन श्री भारती जी की मनसा ठीक नहीं है और न ही उनकी भाषा। वे केवल हतोत्साहित करने का काम करते है। दलित दस्तक के श्री अशोक दास के साथ भी उन्होने यही किया था।
– राजेश कुमार: लगता है कंवल भारती किसी कंप्फूजन में है।
-शेख अहमद: और जो व्यक्ति किसी के कमेन्ट न बर्दाश्त कर सके और कहे कि आप तो दलित हो नहीं इसलिए आप न कमेन्ट करे तो समझा जा सकता है की कितनी संकुचित सोच का मालिक है ?
-अमरेद्र मोहन: शेख अहमद जी मैं आपके इस कथन से सहमत नहीं हूँ, यह जरूरी नहीं की जिसने अपनी पुस्तक लिखी और जिसने पुस्तक पढ़ी, दोनों का विचार समान हो, लेकिन आपने जो विचार व्यक्त किया वो संकुचित दृष्टिकोण का परिचायक लगता है।
-संजय कुमार: अमरेद्र मोहन जी, मान्यवर भारती जी का रवैया ही ऐसा रहता है । वैचारिक सोच ठीक है लेकिन खुंदक में बाते कहना उनकी आदत सी है ….देखिए उन्होने श्री अशोक दास को क्या लिख था……..।
(6 फरवरी13 को दलितमत के वाल पर) कंवल भारती: दलितमत हो या कोई भी दलित प्रकाशक, उनसे मार्केटिंग करना नहीं आती। जो फोटो आपने लगाया है, उससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है।
-जय सिंह: जरूरत संजय कुमार के काम को आगे बढ़ाने की है, न की अपनी कुंठा समीक्षा के बहाने निकालने की है। विद्वता का ठेका किसी एक को नहीं लेना चाहिये।
-शेख अहमद: कंवल जी एक बेहतरीन आलोचक लेकिन बेहद बदतरीन समीक्षक।
-दिनेश कुमार: संजय सर, सबका अपना नजरिया… और बात, रही आपकी किताब की तो वह एकदम शानदार है…. और जहां तक कंवल जी के सजेशन का सवाल है तो आपको किसी के सजेशन से जरूरत नहीं है, क्योंकि अगर कंवल जी किताब की आलोचना कर रहे हैं तो सैकड़ों लोगों ने तारीफ भी की है… ऐसे मामलों में किसी के सर्टिफिकेट या सलाह की बिल्कुल आवश्यता नहीं है…।
-सुशील कुमार: कंवल जी किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित है। तभी ही इस तरह का बयान दे रहे हैं शायद कंवल साहब आरएसएस की आइडियोलोजी से इमपे्रसड हो कर बोल रहे है।
–शशि सागर: मापदंडों पर ही लिखा-बोला जाय….मैं इसका पक्षधर नहीं हूँ। सर, आपने जो लिखा, जिसके लिये, बात उन तक पहुंची यही काफी है। कंवल जी की टिप्पणी मैंने पढ़ी, दुखद उन्हें यह पच क्यों नहीं रहा हैं। आप धन्यवाद के पात्र है जो इस मुद्दे को लिखा। समाज में बेहतर ऐसे लोग है जो वेतन उठाते और बीबी-बच्चों में मग्न रहते हैं कम से कम आपने लिखा तो। साहस तो उठाया।
-संजय कुमार: मित्रों …..मेरे जवाब के बाद श्री कंवल भारती जी बीच बहस से भाग खड़े हुये ……जिन-जिन ने उनकी आलोचना की उसे अनफ्रेंड कर जाहिर कर दिया की वे मुद्दे पर बहस नहीं करना चाहते …केवल अपनी मठाधीशी करना चाहते है …खैर वे बड़े है सम्मान है उनके कदम का ।
-दलित मत: यह समीक्षा बिना द्वेष की लिखी गई होती तो मैं भी इसका स्वागत करता । पर इस फेशबुकीय समीक्षा की पहली लाइन ही द्वेष से लिखी गई मालूम पड़ती है। वैसे समीक्षक महोदय ने जवाब नहीं दिया अब तक ।
-मंजित आंनद: दलित मुद्दे की अनदेखी और विरोध साफ जाता है कि कंवल भारती जी की टिप्पणी से।
-कंवल भारती: अपनी समीक्षा में जो सवाल मैंने उठाये हैं, उनपर कोई भी बात नहीं कर रहा है। पहले मेरे सवालों का जवाब दीजिये।
– दलित मत: ठीक है कि आपने सवाल उठाया है, लेकिन ऐसा क्यों लग रहा है कि वह दुर्भावना से प्रेरित है। आपकी भाषा और शब्दों के चयन को देखने के बाद एक बार मैं भी भौचक रह गया। इसलिए बहस के केंद्र में आप आ गए। अगर आपने अग्रज की तरह कमियां ढूंढ़ी होती तो मुझे लगता है कि संजय जी भी उसका स्वागत करते। इसलिए नियत पर सवाल तो उठेंगे। मुझे तो यह भी याद आ रहा है जब आपने दलित दस्तक के मार्च अंक के कवर पर ही टिप्पणी कर दी थी कि-वह अंक खास नहीं है। आप बताएंगे, बिना देखे आपने वह किस आधार पर कहा? कहीं किसी ज्योतिष वगैरह के चक्कर में तो नहीं पड़ गए थे ?
– संजय कुमार: कंवल जी आपके सारे सवालों के जवाब मैंने दिये है……..और हाँ एक बात और आपने एक कमेंट डाला था ….सैर-सपाटे और ऐयाशी के लिए गए थे …….और फिर आपने उसे डिलीट कर दिया। क्या यही आप की भाषा है। अगर यह बता दूँ की आप लखनऊ जाकर क्या करते है तो ?
-कंवल भारती: अशोक जी, मैं ऐसा ही हूँ। द्वेष बराबर वालों से होता है, संजय कुमार से क्या द्वेष, जिन्हें मैं जानता तक नहीं। मेरा कभी उनसे संवाद नहीं हुआ। फिर भी अगर आपको लगता है कि मैंने अपना द्वेष निकल है, तो आपकी इस सोच का मेरे पास कोई इलाज नहीं है। मैं आपकी तरह बीच के रास्ते पर नहीं चलता हूँ।
-शेख अहमद: क्या बात है की द्वेष तो बराबरी वालों से होता है जूनियरों को तो हतोत्साहित किया जाता है।
– संजय कुमार: श्री अशोक जी …..श्री कंवल भारती जी के लिखे के बाद मैंने जवाब दिया तब…उन्होने अनफ्रेंड का कदम उठाया और हां वे झूठ बोल रहे है । मुझे अच्छी तरह से जानते हैं।
-विजय अग्रवाल: संजय जी, कंवल भारती जी को दुःख शायद इस बात का है कि दलितों की कोई चिंता क्यों कर रहा है वह भी सरकारी पद पर बैठकर, सरकारी पद पर बैठे पदाधिकारी को तो अपने बराबर वालों के लिए सोचना चाहिए. हाँ एक संतोष की बात भी इसमें है कि पुस्तक अपने मकसद में कामयाब हो गई, नहीं तो कम से कम कामयाब होने की डगर पर तो है ही।
-सगीर अहमद: यह क्या हो रहा है भाई।
-शेख अहमद: इनके हिसाब से यह होना चाहिए वाह वाह कंवल जी क्या समीक्षा की है आपने तो पूरा किताब का चीरहरण ही कर डाला इस युग के सबसे महान समीक्षक तो आप ही हैं तो कंवल जी फूल के कुप्पा हो जाते।
-शेख अहमद: यह ए के हंगल कहाँ से आ गए।
-कंवल भरती: शेख अहमद लगता है तुम जन्मजात बदतमीज हो।
-शेख अहमद: कंवल जी मैंने आपकी प्रतिभा पहचानने की क्षमता पर कभी शक नहीं किया।
-संजय जादव: ये कंवल भारती कौन है?
-ताहिरा हसन: संजय जी, कमल भारती ने क्या सवाल उठाया। यह सच है कि केवल एक प्रतिशत दलित मीडिया में है।
-विजय कुमार: दलित ही क्यों शूद्रों की भी संख्या नाम मात्र ही है मीडिया में।
-विजय कुमार: वर्गवाद और दलित को अलग कर के मत देखिए उसे भी आगे की बात की गरीब लोग कितने है मीडिया में। जितनी भी ऊपर पोस्ट पर है उसमें आप सर्वे करा सकते हैं।
-शेख अहमद: कंवल जी आप कामरेड है तो मैं भी सीपीएम हूँ।
-रवींद्र रंजन: मेरे खयाल से एक समीक्षक पुस्तक को अपने नजरिये से देखता, पढ़ता और विचारता है। उसे पुस्तक के बारे में अपने निजी विचार लिखने होते हैं जिसकी उसे स्वतंत्रता दी जाती है और हमें इस स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। अगर आलोचना से बचना है तो अपने किसी खास मित्र सें या फिर खुद ही किसी छद्म नाम से समीक्षा लिखी जा सकती है, जिसमें पुस्तक के बारे में सब अच्छा-अच्छा ही लिखा गया हो।
-सगीर अहमद: संजय जी, मैंने न आपकी किताब पढ़ी हैं कवंल साहब की टिप्पणी पढ़ी और आपका जवाब कुल मिलाकर आपने अपनी किताब का पक्ष लेने के बजाय कवंल साहब की भीतरी जिदंगी पर बड़ा घातक हमला किया है जो मेरे विचार से पूर्णतः अनैतिक है। आपने अपने किताब की आलोचना को तथा अपने परिचय की बात को गंभीरता से नहीं लिया है मेरी समक्ष से अपनी व्यक्तिगत परिचय को लेखकीय परिचय मानकर बहुत बड़ी गलती भी है जो अंततः आपको नीचले स्तर पर भी ला खड़ा कर दिया है। जिससे लेकर आप धैर्य खो बैठे। कंवल साहब लंगनऱ है, अधेड़ है या उनका कैसा चरित्र है यह सब कुछ उनके अपने विचारों को बाधित नहीं करता और न तरीका या लेखन परिक्रिया को। जिससे उनकी मुख्य पहचान बनी है। मेरे समक्ष से लिखे गये विचारों को फिर से आपलोग अलग से बोलकर समझाना पड़े। लेखक के रूप में मैं आपका पहले परिचय हुआ है जबकि मैं भी आपके विचारों को पढ़ता रहा हूँ । इसे आप क्या कहेंगे? कंवल साहब महान विचारक है।
-संजय कुमार: जी मैंने कब कहा कि श्री भारती जी की समीक्षा खराब है मैंने उनकी भाषा पर सवाल उठाया था वे एक अच्छे आलोचक है तो उनसे यह ऊमीद नहीं थी …और हाँ मैंने उन्हे लिखने के लिए नहीं कहा था …..आप खुद पढ़े …उनके लिखे में विरोधाभास है। और हाँ वे बड़े है …मान्यवर है ….. उनका कमेंट, जवाब क्या एक आलोचक की भाषा है? और हाँ …मेरे जवाब के बाद..कई ने अपने विचार रहे …जिन्होंने उनके हिसाब से नहीं लिखा उसे दोस्त की सूची से हटा दिया, क्या यह एक आलोचक का उचित रवैया है।
– संजय कुमार: सगीर अहमद जी आभार …..आग्रह है एक बार आप श्री कंवल जी के लिखे को पढ़े और जो कमेंट डिलिट कर दिया उसे भी ……मैंने उनकी भाषा पर सवाल उठाया है……और न ही मैंने अपनी भाषा को खराब किया है…बल्कि सम्मान दिया है..उन्हे व्यक्तिगत तौर पर कुछ नहीं कहा ?…..मीडिया में दलित …. मुद्दे पर लखनऊ में श्री वीरेंद्र यादव जी , श्री अरुण खोटे जी , श्री आर.एस.दारापुरी जी, श्री कौशल किशोर जी ,श्रीमती ताहिरा जी ने चर्चा की। और कई सवाल उठे। जहाँ तक मेरे विचारों का सवाल है तो उस पर मै कायम हूँ और दलित-शूद्र के हक-हूक के लिए काम करता रहूँगा ।
-रंजीत कुमार: आपकी पुस्तक की आलोचना करने वाले शायद इसलिए डरे हैं कि कहीं उनका दलित विमर्श उनसे न छिन जाए जिसको बेचकर उनकी दूकानदारी चल रही है। आप बधाई के पात्र हैं जो आपने ऐसी दलित सरोकार से जुड़ी पुस्तक लिखी। हम आशा करतें हैं आप भविष्य में भी अपनी लेखनी के द्वारा गंभीर विमर्श को धार देंगे ।
-एमएस पासवान: ये भारती अपने आपको बाबा समझता है क्या ? इसके कमेंट से तो यही लगता है ये सब संकुचित मानसिकता वाले लोग है जिसे अपने अलावे दूसरों की ओपिनियन ही अच्छा नहीं लगता है। ये भारती जो हो लेकिन इसके घमंड भरे ये शब्द द्वेष बराबर वालों से होता है (संजय कुमार से क्या द्वेष ?) यह परिलक्षित करता है कि इसके दिलों-दिमाग में दलितों के प्रति क्या भरा है।
संजय कुमार
303, दिगम्बर प्लेस
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मोः 9934293148





