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सन्डाहा और जापानी तेल का विज्ञापन पढ़वाना कहां की नैतिकता है?

कई अखबारों के संपादक तो संपादक की तरह दिखते भी नहीं। बात अखबारों की हो रही है। ज्यादा की नहीं। सिर्फ देश के कुछ बड़े अखबारों की बात कर लेते हैं। खासकर हिंदी पट्टी में जागरण और हिंदुस्तान का अपना एक स्थान है। जहां तक आम लोगों को, जो थोड़े पढ़े लिखे और समझदार हैं, उनकी माने तो अखबारों को कागज सस्ते में मिलते हैं। कारण कि अखबार पवित्र कार्य करते हैं। सब्सिडी से मिलने वाले कागजों के जरिए।

कई अखबारों के संपादक तो संपादक की तरह दिखते भी नहीं। बात अखबारों की हो रही है। ज्यादा की नहीं। सिर्फ देश के कुछ बड़े अखबारों की बात कर लेते हैं। खासकर हिंदी पट्टी में जागरण और हिंदुस्तान का अपना एक स्थान है। जहां तक आम लोगों को, जो थोड़े पढ़े लिखे और समझदार हैं, उनकी माने तो अखबारों को कागज सस्ते में मिलते हैं। कारण कि अखबार पवित्र कार्य करते हैं। सब्सिडी से मिलने वाले कागजों के जरिए।

अखबारों को सस्ते में जो कागज दिए जाते हैं उसमें आम जनता की गाढ़ी कमाई लगती है। लेकिन अब इन अखबारों के ढीठपन और शर्मनाक कृत्यों पर नजर डालते हैं। इन्हें पहले पेज पर यदि मैनकाइंड कंडोम और एमआरएफ टायर अथवा किसी सेक्स एस्कार्ट क्‍लब और बिल्डर्स के विज्ञापन मिल जाएं तो ये दूसरे पेज से खबरों की शुरुआत करते हैं। यह तो खैर इन्हें कभी-कभी मिलता है। दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में रोजाना अखबारों के पहले पेज एक बड़ा विज्ञापन रहता है। यह विज्ञापन आम आदमी के सरोकार से दूर वाले होते हैं। पटना जैसे छोटे शहरों में भी यह ट्रेंड शुरू हो गया है।

अखबारों में बड़े से बड़ा संपादक भी हिंदी की मां बहन करने में लगा है। हंस में राजेंद्र यादव संपादकीय में हिंदी के साथ अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करते हैं। शब्द से सटाकर ब्रैकेट में उसका हिंदी मीनिंग भी लिख देते हैं। खैर….कुछ दिन पहले रेल बजट पेश हुआ। खबरों को देखकर ऐसा लगा कि अखबार के संवाददाताओं को किराया और भाड़ा में अंतर मालूम नहीं है। महिला और औरत इन दोनों शब्दों का गलत प्रयोग भी वर्षों से जारी है। अखबारों में ऐसे बहुत सारे शब्द मिल जाएंगे।

अंदर के पेजों में फ्रेंडशिप वाले विज्ञापनों में अवैध देह व्यापार के धंधे की सारा वर्गीकृत जानकारी छपती है। बड़े शहरों में तो बकायदा फिमेल एस्कार्ट पार्टी के विज्ञापन भी छपते हैं खुलेआम। अंतिम पेज पर लिंग वर्धक तेल से लेकर जापानी तेल का ऐसा संगम दिखाई देता है कि एकबारगी तो ऐसा लगता है कि हम अखबार नहीं सेक्स पावर बढ़ाने वाली दवाओं के हैंडविल हाथ में लेकर खड़े हैं। इधर कुछ दिनों से घर की महिलाएं इन अखबारों को बाचने से डरने लगी हैं। यह अकाट्य सत्य है। कुछ कहिए तो मजबूरी का बहाना बनाते हैं। आपलोगों की बहन बेटियां तो लैपटॉप से पढ़ लिख रही हैं। लेकिन हमारी तो मजबूरी है। क्या आप कभी अपने अखबारों के तेल वाले पेज को परिवार में पढ़ने को देंगे। जवाब सोचिए।

अब जरा आप विचार किजिए। देश में जो घराने अखबार निकाल रहे हैं। वह कहां मजबूर हैं। कोई राज्य सभा का सदस्य है। बिजनेस टाईकुन है। अरबों की संपति है। करोड़ो में सलाना लाभ है। सवाल उठता है आखिर क्यों। क्या मजबूरी है। विज्ञापन आप छापिए। किसी ने रोका है। नहीं। लेकिन उसका भी एक स्तर होना चाहिए। जिन मुद्दों, जिन समस्याओं को लेकर हमारी सरकार कई संस्थाएं लोगों को जागरूक कर रही हैं। उन समस्याओं को आप प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने में लगे हैं।

जिन फ्रेंडशिप क्‍लबों में मानव व्यापार जैसे कुकृत्यों को अंजाम दिया जा रहा है। कम से कम उन विज्ञापनों से तो परहेज कीजिए। लेकिन नहीं। जनता के पैसों को पवित्र कार्यों के नाम पर लेकर उसे सन्डाहा और जापानी तेल का विज्ञापन पढ़वाना यह कहां की नैतिकता है।

आपने गुलजार को देखा होगा। बहुत अच्छे गीतकार हैं। जावेद अख्तर। लालकृष्ण आडवाणी। उम्र के इस पड़ाव पर बाल सफेद हैं। सफेद हैं तो हैं। लगते भी अच्छे हैं। क्योंकि उम्र को दबाना या छुपाना यह भी एक अपने प्रति किया गया अपराध होता है। कुछ नहीं तो कम से कम कुछ तो बाल सफेद छोड़ दिजिए। यह क्या भाई साहब। आप प्रधान संपादक हैं क्या भेष बना लिया है आपने। एकदम छिछोरों की तरह। अरे…जरा संभलिए। क्योंकि मैं एक लड़की होकर लिख रही हूं। कहीं से आप अच्छे नहीं लगते। खैर …देश के सभी अखबार मालिकों में यदि थोड़ी सी भी गैरत बची हो और आम लोगों के प्रति थोड़ी सी भी सहानुभूति हो तो कृपया इन तेलों से लोगों को बचाइए। क्या करेंगे इतने पैसे। कफन में जेब नहीं होती। कम से कम इतिहास बना के जाइए। सेमिनारों और बड़े तबकों में आपके मरने के बाद लोग कुछ दिन तक याद तो करेंगे। लेकिन इस देश की वह साठ फीसदी जनता जो आपका सर्कुलेशन बढ़ाती है वह याद नहीं करेगी। उसकी यादों में बसना है तो स्वार्थ छोड़ कर कुछ अच्छा कीजिए। बहुत हुआ। पत्रकारिता के नाम पर इस तरह का गंदा खेल बंद कीजिए….वरना वह दिन दूर नहीं …….जब आपके कार्यालयों पर विरोध में लोग बैठने लगेंगे।

लेखिका रानी विभा पत्रकारिता से जुड़ी हुई हैं.

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