Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

काटजू साहब की चिंता के दायरे में सिर्फ प्रेस नहीं है

: काश, काटजू कम बोलते! : जस्टिस मार्कंडेय काटजू के भारतीय प्रेस परिषद का अध्यक्ष बनने से कुछ उम्मीदें जगीं तो उसकी पृष्ठभूमि थी. सुप्रीम कोर्ट का जज रहते हुए उन्होंने कई फैसले देते समय जो टिप्पणियां कीं, उनसे लोकतांत्रिक चेतना को बल मिला था. हालांकि एक मुस्लिम की दाढ़ी पर की गई टिप्पणी और एक फैसले में महिला के लिए कीप यानी रखैल शब्द के इस्तेमाल पर एतराज भी उठे, लेकिन विवाद उठने पर उन्होंने सुधार करने में देर नहीं लगाई.

: काश, काटजू कम बोलते! : जस्टिस मार्कंडेय काटजू के भारतीय प्रेस परिषद का अध्यक्ष बनने से कुछ उम्मीदें जगीं तो उसकी पृष्ठभूमि थी. सुप्रीम कोर्ट का जज रहते हुए उन्होंने कई फैसले देते समय जो टिप्पणियां कीं, उनसे लोकतांत्रिक चेतना को बल मिला था. हालांकि एक मुस्लिम की दाढ़ी पर की गई टिप्पणी और एक फैसले में महिला के लिए कीप यानी रखैल शब्द के इस्तेमाल पर एतराज भी उठे, लेकिन विवाद उठने पर उन्होंने सुधार करने में देर नहीं लगाई.

कोर्ट की अवमानना के मुद्दे पर तो उन्होंने जो वैचारिक हस्तक्षेप किया, वह अब भी प्रासंगिक है. इसलिए जब वे प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष बने और तुरंत मीडिया के विनियमन की बहस को आगे बढ़ाया, तो यह संभावना बनती दिखी कि अब ये बेहद जरूरी मसला गंभीरता से और ठोस रूप में राष्ट्रीय एजेंडे पर आएगा. मीडिया जगत में जारी बहसों से भी उसकी पृष्ठभूमि तैयार थी. ब्रिटेन में जस्टिस लॉर्ड ब्रायन हेनरी लेवसन समिति की रिपोर्ट के बाद यह मुद्दा राजनीतिक एजेंडे पर है. समिति की सिफारिशों को अमली जामा पहनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है. लेकिन भारत में यह मुद्दा कहीं आगे नहीं बढ़ सका है.

लेकिन इस बीच काटजू जरूर उससे आगे बढ़ गए हैं. इतना अधिक जिन लोगों ने उनसे उम्मीद जोड़ी और उनके समर्थन में आगे आए थे, वे उनसे काफी पीछे छूट गए हैं. जाहिर यह हुआ है कि काटजू साहब की चिंता के दायरे में सिर्फ प्रेस नहीं है. उन्हें देश को बताना है कि भारत में कितने मूर्ख हैं, हमारी राजनीतिक व्यवस्था किस तरह के लोगों के वोट से तय होती है, अतीत में भारत कितना महान था, गंगा-जमुनी तहजीब की क्या खासियत है, नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल का सच क्या है, अरुण जेटली विपक्ष के नेता होने लायक हैं या नहीं… और फिर उन्हें सेलेब्रिटी सजायाफ्ता अपराधियों को माफी दिलवाने का इनसानी फर्ज भी निभाना है.

हां, इस दौरान मीडिया जगत की यह चिंता उन्होंने जरूर की है कि पत्रकारिता में नौकरी पाने के लिए न्यूनतम योग्यता क्या हो, इस पर सुझाव देने के लिए एक समिति उन्होंने बना दी है. ये समिति बिना मीडिया घरानों की आंतरिक संरचना का ख्याल किए और बिना इस पर गौर किए कि आज देश में मीडिया के कारोबार का संदर्भ और परिप्रेक्ष्य क्या है, अपनी सिफारिशें पेश करेगी. उन सिफारिशों का क्या होगा- यह शायद समिति के सदस्यों और यहां तक कि जस्टिस काटजू को भी पता नहीं होगा.

वैसे जिन दिनों मीडिया जस्टिस काटजू की चिंताओं में था, तब उन्होंने बताया था कि देव आनंद की मृत्यु की खबर लीड नहीं बननी चाहिए. सिनेमा और क्रिकेटरों की खबर छापने के लिए उन्होंने मीडियाकर्मियों को खूब फटकार लगाई थी. उसे यह सुनते हुए न्यूज डेस्क पर दशकों तक काम कर चुके पत्रकार (जिसमें इन पंक्तियों का लेखक भी शामिल है) आवाक थे. मनुष्य का जीवन और मनोविज्ञान जिन तर्कों और भावनाओं से चलता है, उस पर आधारित खबर की हमारी समझ गलत है- यह एक ऐसा व्यक्ति बता रहा था, जिसने शायद खुद कभी पत्रकारिता नहीं की हो. जिन लोगों ने ताउम्र अपनी रोजी-रोटी खबर के पेशे से कमाई है, उन्हें न्यूज सेन्स कानून के पेशे से आए व्यक्ति से सीखना पड़े, तो यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण होगा.

बहरहाल, सार्वजनिक जीवन में सबको अपने विचार रखने का हक है. जैसे पत्रकारों को न्यायिक फैसलों पर अपनी राय जताने का अधिकार है, जजों की संदर्भ से बाहर जाकर की गई टिप्पणियों पर एतराज करने हक है, वैसे ही किसी पूर्व जज- या किसी आम नागरिक को यह राय रखने का अधिकार है कि पत्रकारिता कैसे की जानी चाहिए. मगर जब यह राय प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष पद पर आसीन व्यक्ति जताए, तब यह अपेक्षा लाजिमी हो जाती है कि वह राय ठोस धरातल पर आधारित हो और संबंधित पेशे के सामाजिक-आर्थिक संदर्भ के अनुरूप हो.

इसी तरह अगर कोई आम नागरिक या किसी दूसरे पेशे से जुड़ा व्यक्ति पत्रकारों को अनपढ़, अज्ञानी या समाज के प्रति गैर-जिम्मेदार माने तो उसे अपनी राय रखने के हक से महरूम नहीं किया जा सकता- हालांकि किसी भी पेशे के बारे में अपमानजक आम राय सार्वजनिक रूप से जताना कतई वाजिब नहीं होता और उसका विरोध जरूर होना चाहिए. ऐसा इसलिए कि किसी भी पेशे में सभी लोग एक जैसे नहीं होते. जैसे कानून की अभिनव और प्रगतिशील व्याख्याएं करने वाले जज होते हैं तो रूढि़वादी और लकीर के फकीर न्यायाधीशों का भी वजूद होता है, उसी तरह पत्रकारिता में विद्वान एवं निष्ठावान लोग हैं, तो पेशेवर कौशल में कमजोर और ऐसे लोग भी हैं जिनकी ईमानदारी संदिग्ध है. बहरहाल, अगर कमजोर या नाजानकार लोग भी पत्रकारिता में हैं, तो इसका कारण यह नहीं है कि पत्रकारिता में नौकरी पाने के लिए किसी न्यूनतम डिग्री की शर्त लागू नहीं है.  

हकीकत तो यह है कि गुजरते वक्त के साथ मीडिया घरानों में डिप्लोमा या डिग्रीधारी पत्रकारों की संख्या बढ़ती गई है. इसके बावजूद अगर पत्रकारों के स्तर से जस्टिस काटजू खुश नहीं हैं, तो इसका कारण कोर्स में कमजोरी या पत्रकारों की अयोग्यता नहीं है. इसकी वजह मीडिया घरानों का ढांचा है.

मीडिया एक स्वंतत्र और निजी क्षेत्र का उद्योग है, जिसमें कैसे लोग रखे जाने हैं- यह इस उद्योग के प्रवर्तक (प्रोमोटर) अपनी और अपने बाजार की जरूरत के हिसाब से तय करते हैं. बाजार में अगर बड़ी संख्या में ऐसे प्रशिक्षित लोग हों जो जस्टिस काटजू की कसौटी पर खरे उतरें, तब भी मीडिया घरानों के लिए ऐसी कोई मजबूरी नहीं होगी कि वे उन्हें ही नौकरी दें. बल्कि तब भी वे वैसे ही लोगों को नौकरी देंगे, जिनकी उन्हें आवश्यकता होगी. आखिर इस हकीकत को बदलने का प्रेस काउंसिल के पास क्या फॉर्मूला है?

यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसा कोई फॉर्मूला नहीं है. इसलिए कि मौजूदा परिस्थितियों में यह हो नहीं सकता. ऐसे में यह शक निराधार नहीं है कि पत्रकारों की न्यूनतम योग्यता तय करने जैसे शिगूफे महज उसी मीडिया की चर्चा में बने रहने के लिए छोड़े जाते हैं, जिससे हजार शिकायतें जताई जाती हैं. लेकिन मीडिया में चर्चित बने रहने का मोह अक्सर बड़े उद्देश्यों या संभावनाओं के लिए हानिकारक होता है.

जस्टिस काटजू अगर खुद को मीडिया संबंधी उन्हीं बहसों तक सीमित रखते, जिसके साथ उन्होंने शुरुआत की थी, तो वे भारतीय लोकतंत्र की बेहतर सेवा कर सकते थे. लेकिन आज अक्सर उनकी सही बातों को भी बहुत से वैसे लोग भी गंभीरता से नहीं लेते, जो आम तौर उन्हें अच्छे इरादों वाला व्यक्ति समझते हैं और यह भी मानते है कि उनकी बातों में अतिशोयक्ति हो सकती है, लेकिन वे निराधार नहीं हैं.

मीडिया में सुधार मीडियाकर्मियों के प्रति अपमान-भाव रखते हुए नहीं हो सकता, जैसे कि देश की राजनीतिक व्यवस्था में सुधार आम जन के प्रति अपमान-भाव रखते हुए नहीं हो सकता. नब्बे फीसदी जनता हो सकता है कि मूर्ख हो, लेकिन वही भारत भाग्य विधाता है और तमाम सुधारों का लक्ष्य भी वही है. लोकतंत्र में आप ना तो अपनी सुविधा से अपनी अलग जनता चुन सकते हैं और ना ही जो यथार्थ है उसे झुठला सकते हैं. दुर्भाग्य से काटजू ऐसा ही करते नजर आते हैं. नतीजतन वे अपना प्रभाव खोते गए हैं. काश, वे कम बोलते!

लेखक सत्‍येंद्र रंजन पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. उनका यह लेख रविवार से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...