अब ये दिन भी देखना बाकी रह गया था. राज ग्रुप को फर्श से अर्श पर मालिक अरूण सहलोत ने पहुँचाया, किन्तु कहते हैं न कि महंगी गाड़ी ले लेना एक बात है मगर सही तरह से उसे ड्राइव करना दूसरी बात है. यहाँ जो कुछ गड़बड़ हुआ वो नौसिखिये ड्राइवरों की वजह से हुआ. वो इतिहास की घटना नहीं है जब भास्कर और राज की प्रतियों में उन्नीस का अंतर होता था. तब भास्कर की हालत पतली हो गई थी. कई वरिष्ठ पत्रकार भास्कर छोड़कर राज की तरफ खिंचे चले आते थे
.फिर समय बदला. राज की रीति-नीति में बदलाव आया. न्यूज़ कम विज्ञापनों को ज्यादा तरजीह दी जाने लगी. जिसे विज्ञापन का काम आता हो, उसे ही इस अखबार का ब्यूरो बनाया जाता था. आखिर ऐसा कब तक चलता, एक न एक दिन दुकान बंद होनी थी. राज एक्सप्रेस बैतूल में दफ्तर विहीन है. सीनियर पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद यहाँ राज का काज प्रभावित हुआ. अभी योग्य ब्यूरो की तलाश राज को है. हालांकि पूर्व ब्यूरो चीफ तोमर को फिर से काम पर लगाया गया.
कुछ दिन पहले तक मार्केटिंग का काम देखने वालों से ब्यूोर चीफ का काम कराया जा रहा था. अब जबकि चुनाव सर पर है और नामी अखबार को सारथी नहीं मिला तो तोमर की वापसी कर ली गयी. एक के बाद दूसरी परेशानी से घिरे मैनेजमेंट को राहत कहाँ? नये बीसी के अभाव में पुराने से काम चलाया किन्तु अब दफ्तर में ताला डल गया. आसपास के लोगों का कहना था- डींगे तो बहुत मारते हो लेकिन किराया तीन माह से नहीं दिया. जिस बुजुर्ग दम्पति ने अपनी कमाई के लिए अख़बार को ऑफिस किराये पर दिया था वो अपना माथा दीवार पर मार रहे है. लैंड लार्ड ने साफ कह दिया- पहले किराया दो फिर ताला खुलेगा.
दिलीप सिकरवार की रिपोर्ट. संपर्क: 09425002916






