: लाल पद्मधर के साथी को नम आंखों से दी अंतिम विदाई : इलाहाबाद। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सूर्य नारायण मिश्र का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। इलाहाबाद जिले के सोरांव क्षेत्र के कंजिया निवासी मिश्र पिछले कई साल से बीमार थे। इनका इलाज लखनऊ के एक प्राइवेट अस्पताल में चल रहा था। वहां वे तीन दिनों से आईसीयू के गहन चिकित्सा कक्ष में भर्ती थे। बुधवार को भोर में स्वंत्रता सेनानी मिश्र का शव उनके पैतृक गांव कंजिया पहुंचा तो परिजनों में शोक की लहर फैल गई। घर आकर शोक संवेदना व्यक्त करने वालों का तांता लग गया।
स्वंतंत्रता संग्राम सेनानी संगठन के प्रदेश अध्यक्ष लल्लू मरकरी, सांसद प्रतिनिधि घनश्याम शुक्ल ‘चुन्नू’, पूर्व विधायक प्रभाशंकर पांडेय के अलावा एसडीएम सोरांव विवेक श्रीवास्तव, सीओ फूलपुर गीतांजलि सिंह, कानूनगो बिरजू प्रसाद आदि दरवाजे पहुंचे। यहां शोक संवेदना देने वालों का तांता लग गया। शव पर पुष्पांजलि अर्पित की। गार्ड ऑफ आनर के बाद दोपहर करीब बारह बजे तिरंगे में शव लपेट कर गंगा तट श्रृंग्वेरपुर लाया गया। छोटे भाई सुरेंद्र नारायण मिश्र ने मुखाग्नि दी। गंगा तट पर सपा के वरिष्ठ नेता व कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त कृषि सलाहकार रामपूजन पटेल, जिला पंचायत सदस्य दूधनाथ पटेल, वरिष्ठ अधिवक्ता एसके पांडेय ‘मानस सांस्कृतायन’ आदि प्रमुख लोग उपस्थित रहे।
आखिरी वक्त अंजुरीभर मिट्टी देने की भी फुर्सत नहीं : ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा।’ यह लाइनें लिखने वाले प्रसिद्ध शायर व स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल ने शायद यह नहीं सोचा होगा कि विसंगतियां इस कदर भी बिगड़ जाएंगी। स्वतंत्रता सेनानी की अंत्येष्टि के मौके पर गंगा तट पर शासन-प्रशासन का कोई भी प्रतिनिधि मौजूद नहीं रहा। जिला से भी कोई अधिकारी नहीं पहुंचा। गार्ड ऑफ आनर दरवाजे पर देकर ही फुर्सत पा लिया गया। एसडीएम सोरांव, सीओ फूलपुर, कानूनगो दरवाजे तक आए जरूर पर जल्द ही वहां से वापस लौट गए। कांग्रेसी के उपनाम से जाने गए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सूर्य नारायण मिश्र ‘कांग्रेसी’ को आखिरी वक्त में एक अंजुरी मिट्टी देने के लिए कांग्रेस का भी कोई प्रमुख नेता यहां नहीं आ सका। परिजनों को शिकायत है कि गिरे वक्त पर शासन-प्रशासन के प्रतिनिधियों ने कोई मदद नहीं की। दत्तक पुत्री रेनू मिश्रा का कहना है कि इस बारे में कई बार चिट्ठियां भी लिखी गईं पर नतीजा शून्य रहा।
देश सेवा के जुनून में नहीं की शादी : वो जंग-ए-आजादी का दौर था। सन् 1942 के दरम्यिान महात्मा गांधी द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन में साथ आए कंजिया निवासी देवी दयाल मिश्र के युवा पुत्र सूर्य नारायण मिश्र ने आजादी की लड़ाई में प्रमुख भूमिका का निर्वाह किया। कई बार जेल गए। अंग्रेजों की लंबी यातनाएं झेलीं। आजादी के इस दीवाने ने शादी तक नहीं की। आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लिया। एक समय ऐसा भी आया जब इलाहाबाद के गवर्नर हाऊस के सामने तिरंगा लेकर विरोध प्रदर्शन करने वालों का नेतृत्व किया। शहीद लाल पद्मधर साथ थे। वहां लाल पद्मधर अंग्रेज सिपाहियों की गोली के शिकार हो गए। सूर्य नारायण मिश्र ने हिम्मत नहीं हारी। अकेले ही तिरंगा लेकर अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा बुलंद करते हुए शहर के चौक तक पहुंचे। 14 अगस्त 1942 को सुबह कौड़िहार में अंग्रेजी हुकूमत ने गिफ्तार कर लिया। एक साल एक दिन बाद 15 अगस्त 1943 को रिहा कर दिए गए। जेल से वापस लौटने के बाद सूर्यनारायण मिश्र ने देश सेवा के लिए आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लिया। शोक संवेदना व्यक्त करने आए ब्लाक प्रमुख के पति कुंदन सिंह यादव से सेनानी की याद में स्मृति द्वार और एसडीएम सोरांव विवेक श्रीवास्तव से कौड़िहार-पचदेवरा मार्ग का नाम स्वतंत्रता सेनानी सूर्य नारायण मिश्र के नाम से करने की मांग की। इस संबंध में परिजनों ने उन्हें मांगपत्र भी सौंपा।
नेहरू ने लगाया गले तो फफक कर रो पड़े ‘सेनानी’ : देश को आजाद कराने में अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने वाले सूर्यनारायण मिश्र को आखिरी समय तक व्यवस्था को लेकर काफी मलाल रहा। अपने साथी-संगियों के साथ बातचीत में वे इसे अक्सर जाहिर भी करते रहे। दत्तक पुत्री रेनू मिश्रा पुरानी बातों का जिक्र करते हुए स्मृतियों में खो-सी जाती हैं। कहती हैं-अक्सर कई बड़े नेता उनसे मिलने के लिए आते थे। एक बार पंडित जवाहर लाल नेहरू बड़े पापा से मिलने के लिए आए तो गले लगा लिया। गले लगाते ही बड़े पापा फफक कर रो पड़े। थोड़ी देर माहौल गमगीन हो गया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू अवाक। इसके बाद सूर्यनारायण मिश्र ने नेहरू से सवालों की झड़ी लगा दी। बोले-नेहरू! ये कैसी आजादी? गरीबी बढ़ रही है, ज्यादातर लोगों को रोटी-कपड़ा, मकान मयस्सर नहीं है। क्या इसीलिए शहीदों ने अपनी कुर्बानी दी है। काफी देर तक रूंधे गले से वे सवाल करते रहे और नेहरूजी बगलें झांकते रहे। इसके अलावा कई बार घर पर विजय लक्ष्मी पंडित, विश्वनाथ प्रताप सिंह, जनेश्वर मिश्र आदि बड़े नेता भी आकर उनका कुशल क्षेम लेते रहे।
इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.






