Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

आवाजाही, कानाफूसी...

चरैवेति विवाद : संपादक अनिल सौमित्र की विदाई, सुमित्रा महाजन को लिखा पत्र

मध्‍य प्रदेश में भाजपा के मुख पत्र चरैवेति की असली-नकली वेबसाइट को लेकर संपादक अनिल सौमित्र तथा भाजपा के मीडिया प्रभारी डा. हितेश बाजपेयी के बीच पैदा हुए टकराव ने असर दिखा दिया है. पत्रकार अनिल सौमित्र को संपादक पद से कार्यमुक्‍त कर दिया गया है. इस प्रकरण लेकर पिछले दिनों मध्‍य प्रदेश में जमकर बवाल मचा था, जिसके बाद दैनिक भास्‍कर ने भी मीडिया प्रभारी बाजपेयी के पक्ष में कई खबरें प्रकाशित कीं.

मध्‍य प्रदेश में भाजपा के मुख पत्र चरैवेति की असली-नकली वेबसाइट को लेकर संपादक अनिल सौमित्र तथा भाजपा के मीडिया प्रभारी डा. हितेश बाजपेयी के बीच पैदा हुए टकराव ने असर दिखा दिया है. पत्रकार अनिल सौमित्र को संपादक पद से कार्यमुक्‍त कर दिया गया है. इस प्रकरण लेकर पिछले दिनों मध्‍य प्रदेश में जमकर बवाल मचा था, जिसके बाद दैनिक भास्‍कर ने भी मीडिया प्रभारी बाजपेयी के पक्ष में कई खबरें प्रकाशित कीं.

चरैवेति के असली-नकली वेबसाइट को लेकर शुरू हुआ बवाल अनिल सौमित्र की विदाई के बाद खतम हुआ है. इसके बाद अनिल सौमित्र ने भाजपा के मुख पत्र चरैवेति की अध्‍यक्ष सुमित्रा महाजन को पत्र लिखकर भाजपा के न्‍याय प्रक्रिया पर सवाल उठाया है तथा उनको हटाए जाने का कारण जानना चाहा है. नीचे अनिल सौमित्र द्वारा सुमित्रा महाजन को लिखा गया पत्र… 



भाजपा में न्याय का अजीब तरीका

प्रति,

माननीया सुमित्रा महाजन

अध्यक्ष, पं. दीनदयाल विचार प्रकाशन

भोपाल

आदरणीया ताईजी,

सादर प्रणाम!

चरैवेति संपादक दायित्व से मुक्ति की घोषणा के दो दिन बाद पत्र लिखने का मन बना पाया हूँ| इन दो दिनों में मन:स्थिति ऐसी नहीं थी कि कुछ लिखा जा सके| लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं और संगठनों में दायित्व मिलने और मुक्त या च्युत होने की एक प्रक्रिया होती है| दायित्व मिलना और मुक्त होना सामान्य और स्वाभाविक बात है| मुझे आज नहीं अपनी नियुक्ति के दिन से ही अंदाजा था कि जिस प्रकार मेरी मौखिक नियुक्ति हुई थी, मुक्ति भी मौखिक ही होगी| लेकिन आपने जिस अंदाज में मुझे मुक्त किया उसका अंदाजा कत्तई न था, क्योंकि संपादक की कुर्सी पर बैठने के पहले मैंने भगवान और माँ सरस्वती-लक्ष्मी के चित्र पर फूल-माला चढाई और धूप-अगरबत्ती दिखाई थी|

दायित्व मिलने से पहले कम से कम दो महीने तक, कई बार अलग-अलग स्तरों पर चर्चा में भागीदार हुआ था मैं| अपेक्षा तो यही थी कि विदाई भी कुछ इसी तरह होती| ईमानदारी, मेहनत और लगन से काम करने का पुरस्कार-सम्मान न सही, थोड़ी शाबासी का हकदार तो था ही मैं| खैर हकदार को हमेशा और सब जगह हक मिले ये जरूरी नहीं होता| लेकिन आपसे एक सामान्य प्रेमपूर्ण और निश्छल व्यवहार की स्वाभाविक अपेक्षा थी| आप सुमित्रा ताई हैं, और मैं अनिल सौमित्र| मेरी माँ का नाम भी सुमित्रा ही है| इससे पहले आपसे कभी भी राजनीतिक सम्बन्ध नहीं रहा| हमेशा ही आपके चहरे पर मातृत्व देखता रहा हूँ| जब आपके बुलावे पर मैं इंदौर गया था, तब भी यही सोचा था कि चरैवेति प्रकरण में भी आप एक माँ के समान ही न्याय करेंगी| लेकिन रविवार (बैठक) के दिन आपके प्रति मेरा विश्वास और मेरी धारणाएं सब खंडित हुई| मैं समझ नहीं पाया कि आपने जो घोषणा की वह सच था या संगठन महामंत्री श्री अरविंद मेनन जी ने मुझे जो बताया वह झूठ था! या दोनों अपनी-अपनी जगह सही थे! आपने मुझे मुक्त करने और आगे का काम श्री जयकृष्ण गौड़ जी द्वारा किये जाने की घोषणा की, जबकि श्री मेनन जी फोन पर मुझसे खुलकर, अच्छे से काम करने की बात कर रहे थे| उनके शब्द थे- गौड़ जी अपना काम करेंगे और आप अपना काम करो| खैर तब तक मैं चरैवेति से स्वयं को समेट चुका था| बाद में पत्रकार मित्रों ने बैठक के भीतर का आँखों देखा हाल बताया और यह सूचना भी दी की आपके अतिरिक्त समिति में सभी पदाधिकारियों का बदलाव हो गया है| गौड़ जी का आना सुखद है, लेकिन वे जिस तरह से आये वो जरूर दुख:द है|

आपके बारे में मेरी एक और धारणा खंडित हुई कि आप सच कहती हैं और हमेशा सच का पक्ष लेती हैं| मुझे वो वाकया याद आया जब प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया को आपने गलत बताते हुए बैठक का बहिष्कार कर दिया था| तब अप्रिय सत्य कहने के लिए आपके प्रति मेरी श्रद्धा और सम्मान में बढ़ोत्तरी हुई थी| लेकिन तब मैं दुखी और निराश हुआ जब चरैवेति की नवगठित कार्यकारिणी की चुनाव प्रक्रिया के बारे में जानकारी मिली, जिसमें आप स्वयं अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित हुईं| दूसरे दिन के अखबारों में इसका थोड़ा जिक्र हुआ था, सही और विस्तृत प्रक्रिया की जानकारी तो आपको होगी ही! प्रक्रिया गलत हो या सही, लेकिन एक सामान्य परंपरा तो है ही कि नव-निर्वाचित को पुराने पदाधिकारी और सदस्य बधाई देते, गले मिलते और आगे के काम में सहयोग का आश्वासन देते| पता नहीं यह सब कुछ हुआ कि नहीं, लेकिन मुझे तो ऐसा ही लगा कि सब कुछ चोरी-चोरी चुपके-चुपके हो गया| आपके बारे में नहीं, लेकिन नए सचिव के बारे में कह सकता हूँ कि उनके चहरे के हाव-भाव से लग रहा था कि कोई चोरी का माल उनको मिल गया है जिसे वे अपराधभाव से ग्रहण कर रहे हैं| पुराने सचिव भी चोरी का माल अपने दुश्मन को टिका देने की चाल में सफल होने की खुशी में थे| साथ ही उन्हें अपने विरोधी संपादक को निपटा देने की खुशी भी थी| वे इस बात से भी खुश थे कि लाखों की हेरा-फेरी करने, तीन साल में एक भी बैठक न बुलाने, ऑडिट और आयकर रिटर्न जमा न करने, फर्म्स एंड सोसायटीज को जानकारी न देने तथा इसके अलावा अपने ही सहयोगी को लांछित करने, मीडिया के द्वार संगठन को नुकसान पहुंचाने के बावजूद उसका कोई बाल-बांका नहीं कर सका|

आप भी पिछले तीन सालों से चरैवेति प्रकाशित करने वाली संस्था की अध्यक्ष हैं, फिर से तीन सालों के लिए बन गईं| पिछले तीन सालों में समिति की कितनी बैठकें हुई? समिति की अनियमितताओं और निष्क्रियता के बारे में आपने सचिव या अन्य पदाधिकारी से कितनी बार पूछा? संगठन के पदाधिकारियों से आपने कितनी बार बात की? मुझे पता नहीं इसलिए जिज्ञासा है| आप फिर भी दुबारा अध्यक्ष बन गईं| क्या भाजपा संगठन में अनियमितता को नजरअंदाज करने, दायित्व का निर्वहन न करने और गलत करने वालों को प्रश्रय देने से ही पुरस्कार और सम्मान मिलता है? क्या यह नई परम्परा है?

यहाँ एक बात उल्लेख करना जरूरी है कि दिसंबर अंक में चर्च से सम्बंधित दो आलेख थे| इसके बारे में किसी ने कोई चर्चा नहीं की, लेकिन अप्रैल माह में यही विषय विवादित हो गया| शायद आपको भी याद नहीं होगा कि इसके पहले आपने चरैवेति के अंक को कब देखा था! वैसे भी पत्रिका देखने-पढने की किसी को कहाँ फुर्सत है| लेकिन मुझे खुशी और संतुष्टि है कि मैंने पत्रिका को पाठकों के लिए पढने लायक बनाया| पाठकों और आलोचकों से मुझे प्रशंसा मिली| हाँ ! आपसे और समिति के अन्य पदाधिकारियों से की गयी अपेक्षा व्यर्थ ही गई |

सबसे पहले चर्च वाले आलेख में मुझे आरोपित करने की कोशिश की गई| उसमें कोई मामला नहीं बना तो फर्जी वेबसाईट बनाकर विज्ञापन लेने का आरोप लगाया गया| वह भी झूठा सिद्ध हुआ तो मुझे श्री प्रभात झा का आदमी सिद्ध करने की कोशिश की गयी| आज भले ही चरैवेति में व्यवस्थाओं को बढाने की बात हो रही है| लेकिन पिछले डेढ़ साल में कोई व्यक्ति चरैवेति कार्यालय में झांकने तक नहीं गया| एक कमरे में, जर्जर संसाधनों और बिना सम्पादकीय सहयोगी के पत्रिका का प्रकाशन हुआ| अगर विश्लेषण करना हो तो चरैवेति के पुराने अंको और पिछले डेढ़ साल के अंकों की तुलना की जा सकती है|  

जहां तक मेरी बात है तो मैं अपने को ठगा-सा महसूस कर रहा हूँ | लोग सवाल पूछ रहे हैं, मेरे पास जवाब नहीं है| चरैवेति संपादक दायित्व से मैं क्यों मुक्त हुआ? क्या कोई गलती हुई? मैंने कोई भ्रष्टाचार किया? मेरा काम संतोषजनक नहीं था? मैंने भाजपा की विचारधारा के खिलाफ काम किया? या कोई और वजह थी? जहाँ तक मुझे पता है मैंने जानबूझकर किसी के काम में कोई हस्तक्षेप भी नहीं किया| अपनी किताबों, अपने कम्पयूटर और अपने संसाधनों से मैं चरैवेति पत्रिका का काम करता रहा| क्या मेरे कारण चरैवेति, भाजपा या विचार परिवार को किसी प्रकार की कोई हानि हुई? या फिर मैंने चरैवेति का उपयोग कर किसी प्रकार का राजनैतिक-आर्थिक लाभ ले लिया? तो फिर ऐसी क्या वजह थी जो मुझसे एक दोषी और अपराधी की तरह व्यवहार किया गया? मेरे साथ धोखा क्यों हुआ? हो सकता है आपके लिए ये सामान्य बात हो, लेकिन मैं तो इस क्षेत्र में नया हूँ, इसलिए मेरे लिए तो यह हादसे के सामान हो गया|

चरैवेति संपादक के रूप में मेरी नियुक्ति भाजपाई होने के कारण नहीं, बल्कि संघ पृष्ठभूमि, पत्रकारीय योग्यता, वैचारिक निष्ठा और सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण हुई थी| आपके निर्णय से मेरा पूरा व्यक्तित्व सवालों के घेरे में आ गया| अब लोग सिर्फ मुझसे ही नहीं, बल्कि मेरे परिवार से भी सच्चाई जानना चाहते हैं| घर में, पड़ोस में और समाज में शुभचिंतक ताना दे रहे हैं – क्या मिला संपादक जी? आर्थिक नुकसान की भरपाई तो हो जायेगी, लेकिन मैं अपनी धूमिल हुई प्रतिष्ठा और सामाजिक छवि को कैसे पुनर्स्थापित करूं? आपने अपने निर्णय से संघ के एक स्वयंसेवक, एक पत्रकार और एक कार्यकर्ता को कटघरे में खड़ा कर दिया | चर्च आलेख विवाद के बाद कांग्रेस और ईसाई संगठनों ने जरूर संपादक के खिलाफ कार्यवाई की मांग की थी| क्या आपने कांग्रेस और ईसाई संगठनों की मांग के आधार पर यह कार्यवाई की?   

अपने बारे में विश्लेषण करने पर एक बात समझ में आई कि मैं किसी का आदमी नहीं बन पाया| यहाँ भी एक स्वयंसेवक की तरह काम करता रहा| राजनीतिक क्षेत्र में अराजनैतिक काम करने के लिए भी यह जरूरी है कि आप किसी के खास हों| मुझे बात देर से समझ आई, मैं पत्रकारिता कर रहा था और मैं जिनके बीच काम कर रहा था वे मेरे साथ राजनीति कर रहे थे|

जो भी हो इस पूरे प्रकरण से झूठ जीतता हुआ दिखाई दे रहा है| क्योंकि लोगों को सच पता भी चल गया हो तो आपके माध्यम से उसे उजागर नहीं किया गया| सच और झूठ एक बराबर हो गया| जिसने गलती की उसे भी फांसी और जिसने गलती नहीं की उसे भी फांसी| कोई नया कार्यकर्ता कैसे किसी पर भरोसा करेगा? अगर भरोसा और सम्मान ही नहीं रहेगा तो कार्यकर्ता काम कैसे करेगा? बस ! मुझे एक ही बात कचोट रही है कि डा. हितेष वाजपेयी से किसी ने यह क्यों नहीं पूछा कि चार-पांच दिनों तक वे किसके इशारे पर अखबारों में बयानबाजी करते रहे?  मेरे ऊपर कानूनी कार्यवाई करने की धौंस अखबारों में देते रहे! क्या एक संपादक को बदलने के लिए इतनी मशक्कत करनी पडती है? बस ! एक ही सवाल आपसे और श्री मेनन जी से है – जब पैसे डा. हितेष वाजपेयी ने खाए, अखबारों में बयान उसने दिए तो फिर मेरे साथ अन्याय क्यों हुआ? आपके निर्णय से तो डा. हितेष वाजपेयी सच्चे और मैं झूठा सिद्ध हुआ, क्या वाकई ऐसा ही है? कुछ पत्रकार यह कह रहे हैं कि आपने अपने राजनीतिक भविष्य के लिए श्री मेनन जी के एजेंडे को पूरा किया, क्या यह भी सच है?

अंत में एक बात और – मैं चापलूसी, चाटुकारिता और प्रपंच करने में फेल हो गया| किसी का आदमी नहीं बन सका| अगर इसके कारण मेरी ऐसी विदाई हुई है तो मुझे बहुत खुशी है| भाजपा ही नहीं पूरे विचार परिवार से जुडने और बिछुडने वालों के लिए चरैवेति का यह प्रसंग एक मिसाल की तरह काम करेगा| मेरे बहाने एक अच्छा उदाहरण स्थापित हो गया | कोई भी नया व्यक्ति जब विचार परिवार से जुडने की सोचेगा तो उसे अपने साथ होने वाले छल, प्रपंच, धोखे और अपमान का अंदाजा जरूर होगा| मैं राजनैतिक व्यक्ति नहीं हूँ, एक स्वयंसेवक, कार्यकर्ता और पत्रकार के रूप में यह सब कुछ लिखा है| अगर कुछ अन्यथा हो तो उसे आप नजरंदाज कर देंगी, यही अपेक्षा है| मेरे पास अपनी बात रखने का यही एकमात्र उपाय बचा था, क्योंकि अन्य असफल कोशिशें मैं पहले ही कर चुका हूँ| 

भवदीय

अनिल सौमित्र

प्रतिलिपि,

१.      माननीय डा. मोहनराव भागवत, परमपूज्य सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
२.      माननीय सुरेश भैया जी जोशी, सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
३.      माननीय सुरेश सोनी, सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
४.      समस्त केन्द्रीय, क्षेत्रीय और प्रांतीय पदाधिकारी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
५.      माननीय श्री राजनाथ सिंह, अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी
६.      माननीय श्री लालकृष्ण आडवाणी, वरिष्ठ नेता, भारतीय जनता पार्टी
७.      माननीय श्री रामलाल, संगठन महामंत्री, भारतीय जनता पार्टी
८.      समस्त केन्द्रीय पदाधिकारी, भारतीय जनता पार्टी
९.      माननीय श्री शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश
१०.     माननीय श्री नरेन्द्र सिंह तोमर, अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी, मध्यप्रदेश
११.     माननीय श्री अरविंद मेनन, संगठन महामंत्री, भारतीय जनता पार्टी, मध्यप्रदेश


इस मामले से जुड़ी खबरों के बारे में जानने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें –

भाजपा के मुख पत्र चरैवेति को लेकर बवाल, अनिल सौमित्र एवं डा. हितेश बाजपेयी उलझे

चरैवेति प्रकरण : कौन असली-कौन नकली में उलझा मामला, भास्‍कर भी कूदा

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...