Ramji Tiwari : राजेन्द्र यादव की किताब ‘स्वस्थ व्यक्ति के बीमार विचार’ ने दुखी कर दिया है | वे भी इतनी घटिया किताब लिख सकते हैं , इसे पढ़कर ज्ञात हुआ | मेरे जैसा कोई भी आदमी , जो उनके कथा साहित्य से परिचित है , जो हंस का डेढ़ दशक से नियमित पाठक रहा है और उनके वैचारिक लेखन का इन्तजार करता है , जिसने उनकी आत्मकथा पढ़ी है , वह यही कहेगा , कि इस किताब ने दो दिन का समय तो बर्बाद किया ही , मेरे 290 रुपये भी पानी में बहा दिए |
इसमें न तो राजेन्द्र जी के पास कहने के लिए कोई ख़ास बात है , और न ही ज्योति कुमारी के पास उनसे कहलवा लेने का हुनर | जैसे तैसे घिसटते हुए 90 पृष्ठों तक राजेन्द्र जी इस किताब को ढोते हैं , और बाकी ६० पृष्ठों को कचरा फैलाने के लिए ज्योति कुमारी के भरोसे छोड़ देते हैं | कुल मिलाकर यह किताब ‘ज्योति कुमारी’ मार्का बनकर रह गयी है , जो राजेन्द्र जी पर इतनी मुग्ध हैं , कि उनके द्वारा अपने को कुतिया कहे जाने को भी तमगे जैसा लटकाए घूमती चलती हैं | जाहिर है , ऐसे में उन्हें यह जानने की क्या जरुरत है , कि जीवनी लेखन करते समय कितनी गहराई और कितनी तटस्थता की जरुरत होती है | क्या कहूं …? बस क्षुब्ध हूँ इसे पढ़कर |
रामजी तिवारी के फेसबुक वॉल से.






