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मौर्य टीवी : टूट गया प्रकाश झा का दिल!

मानवीय संवेदना, समाजिक सरोकार और समाजिक समस्याओं को सेल्यूलाइड पर दिखाकर अपने को ग्रास रूट का व्यक्ति बताने वाले का नाम प्रकाश झा है। लेकिन प्रकाश झा में एक और खूबी है….. वह यह कि वह कान के थोड़े कच्चे भी हैं… और दूसरे के माथे पर पैर रखकर अपनी सफलता तय करने का गुर कोई उनसे भी सीख सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि एक अच्छे फिल्मकार हैं। अच्छे इसलिए कि एक समान्य अच्छे फिल्मकार हैं। उनमें सत्यजीत रे या श्याम बेनेगल वाली प्रतिबद्धता नहीं है। ये पैसे के पुजारी हैं।

मानवीय संवेदना, समाजिक सरोकार और समाजिक समस्याओं को सेल्यूलाइड पर दिखाकर अपने को ग्रास रूट का व्यक्ति बताने वाले का नाम प्रकाश झा है। लेकिन प्रकाश झा में एक और खूबी है….. वह यह कि वह कान के थोड़े कच्चे भी हैं… और दूसरे के माथे पर पैर रखकर अपनी सफलता तय करने का गुर कोई उनसे भी सीख सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि एक अच्छे फिल्मकार हैं। अच्छे इसलिए कि एक समान्य अच्छे फिल्मकार हैं। उनमें सत्यजीत रे या श्याम बेनेगल वाली प्रतिबद्धता नहीं है। ये पैसे के पुजारी हैं।

बिहार में इनका एक चैनल चलता है मौर्य जो आजकल अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। इस चैनल से शुरुआती दिनों में कई अच्छे लोग जुड़े। लेकिन चैनल चुकी पूरी तरह चापलूसों और कामचोरों का अड्डा बन चुका था इसलिए अच्छे लोग टिक नहीं पाए। जिनपर प्रकाश झा को भरोसा था उन्होंने बाद में चैनल के एअर होने के बाद खूब मुर्गा और दारू उड़ाया। बिहार से अच्छे मकसद के लिए शुरू हुआ चैनल बरबादी की दास्तां लिखने लगा। शुरू में जो अच्छे लोग जुड़े वो रीढ़ वाले लोग थे बाद में रीढ़विहिनों ने अपने स्पाईनलबोन में गुदगुदी कराकर चरण स्पर्श की परंपरा निकाली और काम की जगह चापलूसी की। चैनल में एक खूबी रही… वहां पीटीएन, बिहार न्यूज और जाने कहां कहां से लफुआ टाईप के लोगों को बहुत दिनों तक रखकर पत्रकारिता करवाया और वो अपने आपको पत्रकार कहने लगे। जबकि उन्हें नीतीश कुमार लिखने तक नहीं आता। उन्हें गीत और गान में अंतर तक नहीं मालूम होता था बस उनमें योग्यता थी तेल लगाने की, झुकने की।

चैनल ने कई ऐसे लोगों को पत्रकार बना गया जो कभी सोच भी नहीं सकते थे कि पत्रकार बने। बाद के दिनों में चैनल गॉसिप का अड्डा, लड़कियों के लिए मारपीट, प्रेम प्रसंग, दारूबाजी और लौंडियाबाजी का अड्डा बन गया। अफसोस यह है कि एक अच्छी पहल अच्छा सिस्टम न होने की वजह से रसातल में चला गया। उसमें नवेंदु जैसे लोग भी जुड़े लेकिन वह भी समान्य बनकर रह गए नवेंदु जो बाहर थे वह अंदर नहीं। उन्होंने भी संबंधों को ताक पर रखा और बौद्धिक आतंकवाद फैलाने लगे। लालावाद के प्रणेता भी बने।

खैर…ऐसे लोगों का यही हस्र होता है। वैसे भी क्षेत्रीय चैनलों का यही हाल है। मौर्य भी उसी का शिकार हुआ। इन चैनलों में काम से ज्यादा चापलूसी, टीटीएम, बेवजह की भैड़ती, एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश, लौंडिया पटाने का प्रयास यहीं सब होता है। यही सब करके रामोजी राव के प्रतिबद्ध चैनल में एक आदमी अभी शीर्ष पर पहुंचा हुआ है। चैनल को गुंजन सिन्हा जैसे एक ईमानदार और प्रतिबद्ध पत्रकार ने अपनी मेहनत के दम पर खड़ा किया। उनसे कई गलतियां भी हुई। लेकिन उन्होंने पत्रकारिता की जान को बरकरार रखा। बाद के दिनों में भी उनमें पत्रकारिता के लिए वहीं पवित्रता रही। बाद में चैनल में एक सरकारी कमिश्नर आया और ईटीवी के दम पर झारखंड में कोयला खदान अपना बिजनेस बढ़ाय़ा ईटीवी की प्रतिष्ठा को उसने कैश किया और ईटीवी भी वहीं बन गया जो शर्म, हया और ईमान बेचने वाले को कहा जाता है।

ईटीवी से भी अच्छे लोगों का पलायन हुआ। वहां काम करने वाले अपने आपको पत्रकार कम और नौकरीपेशा ज्यादा मानते हैं। खैर….बात मौर्य की हो रही थी। मौर्य की कहानी भी बहुत लंबी है। यह चैनल शर्मनाक साजिशों का अड्डा रहा है। इसे उपमा देने के लिए सोचना पड़ता है। मेरी कई सहेलियां जो मौर्य में काम करती थीं बताया करती थीं कि लड़कियों के लिए बहुत सेफ चैनल है, बस आपका मेकअप और हल्का क्लिवेज दिखना चाहिए। यहां तो लोग पैसा और समय दोनों आप पर कुर्बान कर देंगे। कई सहेलियों के मुताबिक चैनल सिर्फ लड़कियों के दम पर खिसकता रहा और अब अंतिम दौर में है जिन लोगों ने इसे बरबाद किया वह अब नयी जगह तलाश रहे हैं… ताकि फिर किसी का सपना बरबाद कर सकें…. बाकी फिर कभी।

लेखिका रानी विभा पूर्व में पत्रकारिता से जुड़ी रही हैं, लेकिन इस पवित्र पेशे में पवित्रता बहुत कम रह गई है इसलिए उन्‍होंने पत्रकारिता छोड़ दिया. अब एक हाउस वाइफ बनकर खुश हैं.

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