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सुख-दुख...

जिन-जिन ने मेरे चरित्र हनन की कोशिश की है, उनका जीना हराम कर दूंगी

Ila Joshi : तो भई आज से तथाकथित बड़े-बुज़ुर्गों के पाँव छूना बंद, आप चाहे कोई भी हैं, मेरे माँ-बाप ही क्यूँ न हों ये अब नहीं होगा तो नहीं होगा…आपको आशीर्वाद/दुआयें देने का पूरा अधिकार है, आप चाहे सर पर हाथ रखें, माथा चूमें, गले लगायें, मगर मुझसे ये अपेक्षा न रखें कि वो सब पाने के लिए मैं आपके पाँव छुकर अपने माथे पर लगाऊंगी…मुझे अब ये सब बहुत अटपटा सा लगता है, आप चाहे सामने वाले को पसंद करें न करें, वो अव्वल दर्जे का मूर्ख आदमी हो, आपको कभी कभी उसको थप्पड़ मारने का मन करता है, लेकिन चूँकि वो आपसे बड़े हैं तो आपको उनके पाँव छूने ही पड़ेंगे….

Ila Joshi : तो भई आज से तथाकथित बड़े-बुज़ुर्गों के पाँव छूना बंद, आप चाहे कोई भी हैं, मेरे माँ-बाप ही क्यूँ न हों ये अब नहीं होगा तो नहीं होगा…आपको आशीर्वाद/दुआयें देने का पूरा अधिकार है, आप चाहे सर पर हाथ रखें, माथा चूमें, गले लगायें, मगर मुझसे ये अपेक्षा न रखें कि वो सब पाने के लिए मैं आपके पाँव छुकर अपने माथे पर लगाऊंगी…मुझे अब ये सब बहुत अटपटा सा लगता है, आप चाहे सामने वाले को पसंद करें न करें, वो अव्वल दर्जे का मूर्ख आदमी हो, आपको कभी कभी उसको थप्पड़ मारने का मन करता है, लेकिन चूँकि वो आपसे बड़े हैं तो आपको उनके पाँव छूने ही पड़ेंगे….

एक तो ये धर्म-कर्म और आस्था ने पहले ही बेड़ा गर्क किया हुआ है उसके बाद घर के बड़ों के थोपे हुए संस्कार, मतलब मेरे होने न होने से ज्यादा वो संस्कार महत्वपूर्ण हैं, तो भईया चाटो बैठकर वो संस्कार मुझसे तो ये नौटंकी होने से रही…मजेदार तब होता है जब मुझे समझाया जाता है कि बेटा पाँव छू लो न, लोग तुम्हारे बारे में गलत धारणा रखेंगे कि कैसी लड़की है, तो मेरा तर्क यही होता है कि जो लोग सिर्फ पाँव न छूने भर से मेरे बारे में उल्टा सोच सकते हैं तो ऐसों कि तो और ऐसी तैसी…

एक ब्राह्मणवादी परंपरागत परिवार में पैदा होना कभी कभी फांसी के फंदे जैसा लगता है, अब भई मैं पूरी तरह से नास्तिक तो नहीं लेकिन धर्म में मेरा कोई विश्वास भी नहीं, न तो मैंने नास्तिक दर्शन पढ़ा है, न ही हिन्दू धर्म से जुड़ा कोई साहित्य, और न ही इन दोनों को कभी पढ़ने की कोई इच्छा भी है, फिर भी ये धर्म-कर्म , आस्था, संस्कार मेरा पीछा ही नहीं छोड़ते हैं, कभी कभी मन में आता हैं इन्हें भद्दी भद्दी गालियाँ दूं तब शायद ये झेंपकर, गुस्से में आकर, मतलब कैसे भी यहाँ से चलते बनें…

और हाँ, अब तो लोगों को मेरे लिखने तक से दिक्कत होती है, बाकायदा फ़ोन पर धमकी दी जाती है कि ये सब लिखना बंद करो, अब ऐसा लिखती क्या हूँ जो इन तथाकथित बड़े-बुज़ुर्गों को इतनी मिर्च लग जाती है…मुझसे कहते हैं कि घर-परिवार के बारे में सार्वजनिक मंचों पर लिखा बोला नहीं जाता, तो मेरा तर्क होता है कि अरे देश और धर्म से बढ़कर लोगों के लिए कुछ होता है क्या, जब लोग उसके बारे में चर्चा कर लेते हैं, मैं तो सिर्फ अपने घर और आसपास के बारे में ही बात कर रही हूँ, दरअसल देश और धर्म तो मेरी समझ से कोसों दूर हैं न, मगर कौन समझाए इन्हें, तुम मुझे मौके मत दो मैं नहीं लिखूंगी/बोलूंगी…जब जब तुम लोग ऐसा कुछ करोगे जिससे मुझे आपत्ति है तो भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारी सीख भी…

मेरी माँ को मेरे रिश्तेदार ताने देते हैं कि बाप तो विदेश में था, इसी ने इतनी खुली छूट दी हुई थी कि लड़की हाथ से निकल गयी, मानो मैं लड़की न हुई कोई चूड़ी, कंगन थी कि थोड़ी सी चिकनाहट लगी और मैं फिसल कर निकल गयी…उन सब तथाकथित हितैषी रिश्तेदारों में ये बूता तक नहीं कि मुझसे आमने सामने बात कर सकें, चलो फ़ोन पर ही बोल कर दिखाओ ये सब, ज़्यादा कसमसाहट तुम्हे इस बात कि है न कि तुम मुझे अपने जूते की नोक पर रखना चाहते थे और मैंने तुम्हारा जूता तुम्हारे ही सर दे मारा, और अगर कोई बच गए हैं तो चिंता न करें आपका वक़्त भी नज़दीक है, जिन जिन की मेरे चरित्र हनन की नाकाम कोशिश में ज़रा सी भी भूमिका रही है उन सबका जीना हराम करना मुझे भी आता है, अंतर बस इतना है आप झूठ बोलकर जीना हराम करने की कोशिश करते हैं मेरे सच बोलने से आपका जीना हराम हो जाएगा…और हाँ, अब मेरी माँ को किसी ने मुझसे जुडी कोई भी गलत बात कही, सच कह रही हूँ, घर में घुसकर मरूंगी, तब तुम्हारे घर के हट्टे-कट्टे मुस्टंडे भी तुमको न बचा पाएंगे …मारूंगी और रोने भी नहीं दूंगी!!

रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट इला जोशी के फेसबुक वॉल से.

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