Om Thanvi : निदा फ़ाज़ली को 20 अप्रैल को राष्ट्रपति ने पद्मश्री से नवाजा। 21 को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मित्र नाज़िम नक़वी ने एक पार्टी की। 22 तारीख को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में ही निदा ने क़ौमी काउंसिल के एक मुशायरे में शिरकत की। निदा ने एक शेर पढ़ा, जो सुनने वालों में कुछ को नागवार गुजरा और उनसे माफी मांगने को कहा गया। निदा ने माफी नहीं मांगी और अपनी जगह जाकर बैठ गए। उनका शेर इस तरह थाः
उठ-उठ के मसजिदों से नमाज़ी चले गए,
दहशतगरों के हाथ में इसलाम रह गया।
मुशायरा आया-गया हुआ। निदा फ़ाज़ली भी मुंबई लौट गए। लेकिन उर्दू अखबारों में इस शेर को लेकर अब हंगामा बरपा है। कल उन्हें पटना से किसी ने फोन कर बताया कि वहां भी उग्र प्रतिक्रिया हुई है। एक कवि और कलाकार की आजादी को हमारे यहां जब चाहें चुनौती दे दी जाती है।
मुझे याद है, मुंबई के दंगों में जब हिंदू दंगाइयों ने मुसलमानों को मारा, तब भी निदा फ़ाज़ली ने बहुत अच्छी नज़्म लिखी थी। चंडीगढ़ में हमारे घर एक महफिल में वह नज़्म 'रोशनी के फरिश्ते' उन्होंने खूब डूब कर सुनाई थी: हुआ सवेरा/ ज़मीं पर फिर अदब से आकाश/ अपने सिर को झुका रहा है/ कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं…. हवाएं सर-सब्ज़ डालियों में/ दुआओं के गीत गा रही हैं… घनेरा पीपल/ गली के कोने से हाथ अपने हिला रहा है… फरिश्ते निकले है रोशनी के/ हरेक रास्ता चमक रहा है/ ये वक़्त वो है ज़मीं का हर ज़र्रा/ मां के दिल सा धड़क रहा है… कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं।
मैं जब भी उस नज़्म को याद करूं, मेरी आंखें नम हो आती हैं।
निदा ने कट्टर इसलाम और कट्टर हिंदुत्व दोनों के खिलाफ आवाज बुलंद की है। किसी भी तंग घेरे से उनकी शायरी कोसों दूर है। लोग निदा की किसी अभिव्यक्ति से असहमत हो सकते हैं, लेकिन उनके खिलाफ रोष हरगिज उचित नहीं।
जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.





