Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

शराब पीकर पड़े लोगों की तस्वीरें छाप रहा लंदन का एक अखबार

: पश्चिम का संकट-1 : परिवार टूटने के परिणाम : ।। ब्रिटेन से लौट कर हरिवंश की रिपोर्ट ।। पश्चिमी दुनिया, जिसने लगभग 500 वर्षो तक पूरी दुनिया की अगुवाई की. जिसे शक्ति (आर्थिक और सामरिक दोनों) और आधुनिकता (वैचारिक से लेकर वैज्ञानिक तक) का पर्याय माना जाता था, आज वही पश्चिमी समाज दोराहे पर खड़ा है. वह जिन सामाजिक-आर्थिक मसलों से जूझ रहा है, उससे हम भारतीयों को भी सीख लेने की जरूरत है. इस श्रंखला में पढ़िये पश्चिमी समाज के दरकने-भटकने की कहानी. यह हमारे लिए भी सबक है, क्योंकि हम जिस पश्चिम की राह पर चलने को लालायित हैं, वह खुद अपनी राह बदलने के लिए छटपटा रहा है..

: पश्चिम का संकट-1 : परिवार टूटने के परिणाम : ।। ब्रिटेन से लौट कर हरिवंश की रिपोर्ट ।। पश्चिमी दुनिया, जिसने लगभग 500 वर्षो तक पूरी दुनिया की अगुवाई की. जिसे शक्ति (आर्थिक और सामरिक दोनों) और आधुनिकता (वैचारिक से लेकर वैज्ञानिक तक) का पर्याय माना जाता था, आज वही पश्चिमी समाज दोराहे पर खड़ा है. वह जिन सामाजिक-आर्थिक मसलों से जूझ रहा है, उससे हम भारतीयों को भी सीख लेने की जरूरत है. इस श्रंखला में पढ़िये पश्चिमी समाज के दरकने-भटकने की कहानी. यह हमारे लिए भी सबक है, क्योंकि हम जिस पश्चिम की राह पर चलने को लालायित हैं, वह खुद अपनी राह बदलने के लिए छटपटा रहा है..

बचपन, फ़िर विद्यार्थी जीवन से सुनता रहा हूं. इतिहास में भी दर्ज है, ब्रिटेन का वह दौर, उस दौर, राज या ब्रिटेन के प्रताप की बात. जब उसके शासन में सूर्यास्त नहीं होता था. ब्रिटेन ने वह वैभव भी देखा है. केरल के बराबर या उससे भी छोटा एक मुल्क, जिसने यूरोप और संसार के इतिहास को गहराई से प्रभावित किया. आज कहां खड़ा है, उसका प्रताप, वैभव और उसकी ताकत?ब्रिटेन की यह चौथी यात्रा थी. पहली 1994 में अमेरिका से लौटते हुए. फ़िर 2000 के आसपास विश्व हिंदी सम्मेलन में, फ़िर 2002-03 के बीच में सूरीनाम से अमेस्टरडम होकर लौटती में. ब्रिटेन यात्रा इस बार लंदन स्कूल ऑफ़ इकानामिक्स के एक कार्यक्रम के तहत थी. 1994 से 2011 तक, इन 14 वर्षो में ब्रिटेन का समाज कहां खड़ा है? ब्रिटेन का न डूबने वाला वह सूरज कहां है? ऐसे सवाल लंदन में पांव पड़ने से पहले ही दिमाग में उठ रहे थे. मुलाकात हुई प्रो. सतेंद्र श्रीवास्तव से.

उन्होंने 25 वर्षो से अधिक समय तक कैंब्रिज में पढ़ाया. हार्वर्ड में भी रहे. उन्होंने कहा, अगस्त में हुए (6 अगस्त से शुरू) दंगों ने ब्रिटेनवासियों को उदास बना दिया है. इस तरह के दंगे पहली बार हुए. पूरा समाज या अंगरेज अपने अतीत के अवलोकन में डूबे हैं. कहां गलती हुई? कहां हम फ़िसले? अंगरेज चुप हैं. सतेंद्र जी के अनुसार अंगरेज जब चुप होते हैं, मौन या खामोश हो जाते हैं, तो उनके वैचारिक संसार में तूफ़ान चलता है. सतेंद्र जी की बात सुनते हुए लंदन की उस खुशनुमा दोपहर में, जब हम बंगलोर नाम के एक रेस्तरां में लंदन के मुख्य हिस्से में बैठे थें, तब भारत के राजाओं-महाराजाओं-जमींदारों की याद आयी. भारत के जमींदार या पुराने प्रभुत्व वर्ग के लोग आज किस हाल में हैं? अधिसंख्य सड़क पर हैं. पुरानी संपत्ति बिक चुकी है. कुछ पुराने रईस फ़टेहाल स्थिति में खेत बेच कर, शराब प़ीते हुए मिलेंगे.

पिछले दिनों पढ़ा था. जुलाई 2009 में. यह खबर खूब चली भी कि कलकत्ता की एक गरीब विधवा सुल्तान बेगम की पांच बेटियों में से सबसे छोटी अनपढ़ बेटी को कोलकाता में कोयला विभाग के मंत्री ने कोल इंडिया में छोटे-मोटे काम करने के लिए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नियुक्त करने की पहल की. सुल्तान बेगम के पति की मौत 1980 में हुई थी. घोर गरीबी और अभाव में. पति के न रहने पर सुल्तान बेगम ने अपनी पांचों बेटियों को अपने बूते पाला. बड़ी जद्दोजहद और कठिनाई से. स्लम में रह कर. खुद और पांच बेटियों को पालने के लिए चाय का ठेला चलाया. एक अखबार की इस पर निगाह गयी. उन्होंने उनके हालात सार्वजनिक किये.सुल्तान बेगम की खास बात क्या थी? अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफ़र की पड़पोती थी. सुल्तान बेगम की सबसे छोटी बेटी, जो कोल इंडिया में चतुर्थ श्रेणी की कर्मचारी है, हिंदुस्तान के अंतिम बादशाह की पड़पड़पोती है. (सितंबर 2011, यस. ओशो).यह घटना याद आयी इस लोक कहावत के साथ कि समय होत बलवान. किसी का समय एक जैसा नहीं रहता. डा. लोहिया की प्रसिद्ध पुस्तक है इतिहास चक्र (ह्वील ऑफ़ हिस्ट्री). महान साम्राज्यों का उदय और अंत दुनिया ने देखा. अनेक साम्राज्य, योद्धा, बादशाह और पराक्रमी सम्राट हुए, जिन्होंने इस धरती को अपना मान लिया. पर आज उनके वंशज का नाम भी सुनायी नहीं देता? हां, ब्रिटेन जरूर अपवाद है. वहां आज भी बरमिंघम पैलेस में इंग्लैंड की रानी और उनके राजकुमार बसते हैं, पर खुद ब्रिटेन का वह ताप, वह राज आज बिखर रहा है. मैं सतेंद्र जी से पूछता हूं, गड़बड़ कहां हुई? क्या यह उदय-अस्त का नैसर्गिक या प्राकृतिक नियम है, उत्थान-पतन या फ़िर उदय-क्षय का हिसाब?

सतेंद्र जी कहते हैं, समाज के स्तर पर बड़ी भूल दिखाई देती है. वेलफ़ेयर स्टेट (कल्याणकारी राज्य) की अवधारणा पर ही सवाल उठ रहे हैं. ब्रिटेन में कल्याणकारी व्यवस्था है. बच्चा जब गर्भ में आता है, उसी क्षण से उसकी जिम्मेदारी सरकार ले लेती है. उसकी दवा-देख-रेख का इंतजाम, सब राज्य या शासन की ओर से. गर्भ में बच्चे के आने से लेकर उसके बूढ़े होने तक की जिम्मेदारी सरकार की. पेट में बच्चा आया नहीं कि मां को दूध मुफ्त. दवा, देख-रेख सब मुफ्त. रिटायर होते ही अनेक तरह की सुविधाएं. तबीयत खराब तो स्टेट की जिम्मेदारी. 60 की उम्र के बाद लंदन में यात्रा मुफ्त. इस तरह यहां परिवार बना ही नहीं. परिवार में लोग एक-दूसरे से भावात्मक रूप से बंधते हैं. यहां यह माहौल ही नहीं बना. परिवार नामक इकाई खड़ी ही नहीं हुई. जब परिवार ही नहीं बने, तो सामाजिक ताना-बाना नहीं बना, भावात्मक लगाव नहीं हुआ. परिवार और समाज के स्तर पर देश बिखर गया. चरित्र का विकास नहीं हुआ. मूल्य नहीं गढ़े गये. इस तरह पहले परिवार खत्म हुए, फ़िर सामाजिक ताना-बाना कमजोर हुआ. तनख्वाहें बहुत बढ़ गयीं.

इसका असर मैनुफ़ैकचरिंग सेक्टर पर पड़ा. मैनुफ़ैकचरिंग सेक्टर ही खत्म हो गया. आलू के अलावा यहां कुछ पैदा नहीं होता. हां, यहां ऐसे अनंत अविष्कार होते रहे हैं, जिन्होंने दुनिया को बदला है. पर एक खास बात है कि अंगरेज घबराते नहीं है. अमेरिकी घबराते हैं. इस दंगे के बाद ब्रिटेन में या लंदन में ऊपर-ऊपर शांति है. पर इसके असर का विस्फ़ोट होना बाकी है. लगभग 3000 से अधिक लोग गिरफ्तार हो चुके हैं. 800 लोगों को सजा मिल चुकी है. अगस्त में दंगे हुए और 800 लोगों को सजा. एक माह में. यह चुस्ती ब्रिटेन की पुलिस और न्यायपालिका में आज भी है. गवर्नेस का प्रताप है. जो लोग अब तक गिरफ्तार नहीं हुए हैं, उन्हें गिरफ्तार करने का अभियान चल रहा है. ब्रिटेन के अखबार ऐसे लोगों की गिरफ्तारी की मुहिम में सरकार और व्यवस्था के साथ खड़े हैं.

अखबारों में फ़रार लोगों की तसवीरें छप रही हैं. अखबार लोगों से भगोड़े दंगाइयों को गिरफ्तार करवाने की मदद का आह्वान कर रहे हैं. उन्हें पहचानने और गिरफ्तार कराने की बात कर रहे हैं. यह देख कर समाज में मीडिया की सार्थक भूमिका समझ में आयी. इतना ही नहीं, एक अखबार में तो देखा कि लंदन में फ़ूहड़ता, ईलता, शराब पीकर पड़े लोगों की तसवीरें छाप कर अपरोक्ष रूप से अपने समाज की हालत भी बता रहे हैं. यह मनोवैज्ञानिक आह्वान है कि हम सोचें कि हम क्या थे, क्या हो गये, और क्या होंगे अभी? दुर्भाग्य यह है कि ब्रिटेन का समाज अपनी जिन बुराइयों के खिलाफ़ लड़ रहा है. जिन बुराइयों ने उस समाज की प्रतिभा, तेजस्विता और शौर्य का हरण कर लिया है, वे ही बुराइयां आज भारतीय समाज में तेजी से फ़ैल रही हैं. सतेंद्र जी से मैंने पूछा कि ब्रिटेन की इस संक्रमण स्थिति या संकट के मूल में और क्या हैं? उन्होंने कहा ओवरस्पेंडिंग (आय से अधिक खर्च). उन्होंने एक भारतीय प्रसंग का उल्लेख किया. कहा, मेरी मां कहती थी कि दुर्दिन के लिए हमेशा बचत करो (सेव फ़ॉर रेनी डेज). पश्चिम का समाज या अंगरेज यह नहीं करता. पैदा होते ही उसे राज्य, देश या समाज से मनोवैज्ञानिक सुरक्षा मिल जाती है, इसीलिए बचत उसकी आदत में नहीं है.

भारतीय महिलाएं या भारत के लोग कैसे दुर्दिन के लिए बचत करते हैं. राष्ट्रीय जीवन में इसका महत्व क्या है? यह बात ब्रिटेन के मौजूदा संकट के संदर्भ में समझ में आयी. याद आयी 2007-08 की विश्वव्यापी मंदी. पुराने-बड़े बहुराष्ट्रीय घरानों को इस मंदी ने मिटा दिया. पर भारत पर इसका असर कम पड़ा. क्यों? एस. गुरुमूर्ति के भाषण का एक अंश याद आया. गुरुमूर्ति को एक व्याख्यान में सुना. जो इस प्रकार है – ‘‘2009 में अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार जीत चुके पांच लोगों ने बैठ कर यह जानने की कोशिश की कि दुनिया में मंदी क्यों और कैसे आयी? निष्कर्ष था कि पश्चिम के विकसित देशों की अर्थनीतियां बेकार साबित हुई हैं. 51 प्रतिशत अमेरिकी एकल परिवारों में रहते हैं. तलाक के कारण परिवार बिखर चुके हैं. मां अलग, बाप अलग. या तो पिता है या माता. ये सभी परिवार अमेरिकी सरकार पर निर्भर हैं. एक तरह से अमेरिका में परिवार का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया है. पिता या बुजुर्ग की देखरेख की जरूरत नहीं. वह सरकार करती है. पुत्र युवा होते ही अपने रास्ते चल पड़ते हैं. औरत-मर्द में जब इच्छा हुई, तब छुट्टा-छुट्टी. तलाक यानी अलग-अलग. इस तरह अमेरिका में पारिवारिक बचत खत्म हो गयी है.’

भारत में यह पारिवारिक बचत ही आय और जीडीपी में विकास के सबसे बड़े कारक हैं. 1986 में अमेरिका में क्रेडिट कार्ड का जन्म हुआ. 11 करोड़ अमेरिकी नागरिकों के पास 120 करोड़ क्रेडिट कार्ड हैं. इस पर 2.5 ट्रिलियन डॉलर उधार लिया गया है. भारतीय रुपयों के अनुसार, यह शायद 120 लाख करोड़ रुपये के बराबर है. गुरुमूक्‍ति का लेख है, फ़ैमिली ऑन बॉरोइंग (उधार पर जीते परिवार) और नेशन ऑन बॉरोइंग (उधार पर जीता देश). ऐसा मुल्क जहां परिवार की बचत ही खत्म हो गयी.

यह परिवार ही भारत की सांस्कृतिक पूंजी या सामाजिक पूंजी (सोशल कैपिटल) है. इसने भारत की अर्थव्यवस्था को तबाह होने नहीं दिया. पर जिस रास्ते हम हैं, क्या उस पर चल कर भारत अपनी संस्कृति बचा पायेगा, जिसके बल वह कायम रहे?आज भारत में क्रेडिट कार्ड ने बड़े वर्ग को अनावश्यक उपभोक्ता बना दिया है. दो-दो लाख के क्रेडिट कार्ड आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं. खर्च भी बढ़ा है. उधार पर जीनेवाली पराश्रित युवा पीढ़ी भारत में भी जन्म गयी है. इस क्रेडिट कार्ड का गहरा असर भी दिखेगा. जब इकबाल ने कहा कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी.. तो उसमें दम था. क्योंकि हमारे परिवार, हमारे स्वस्थ मूल्य, बेहतर परंपराएं वगैरह सामाजिक-सांस्कृतिक पूंजी के रूप में उपलब्ध थे. हमारी अर्थव्यवस्था दूसरों के भरोसे नहीं थी. तब हम सोने की चिड़ियां कहे जाते थे. पर आज?

भारतीय परिवेश में बचपन से ही यह शिक्षा मिलती थी. पैर उतना ही फ़ैलाओ, जितनी चादर है. मतलब आपनी सीमा में रहना. सीमा में रहने का संस्कार परिवार और समाज से मिलता है. परिवार और समाज के स्तर पर लंदन-ब्रिटेन-पश्चिम में टूट है. सतेंद्र जी से पूछता हूं, दुनिया जहां खड़ी है, ब्रिटेन-यूरोप, टूट-फ़िसलन की राह हैं, अमेरिका अपनी जगह खो चुका है. तब आप क्या देखते हैं?

सतेंद्र जी बरट्रैंड रसेल से लेकर दुनिया की जानी-मानी अनेक प्रतिभाओं के साथ सार्वजनिक या सामाजिक सवालों को उठाने में ब्रिटेन के अग्रिम मोरचे पर रहे, उनका एक पंक्ति का जवाब था. अब गांधी की ‘रेलीवेंस (प्रासंगिकता) बढ़ गयी है. वह अकेले इंसान हुए, जिन्होंने बदलाव के लिए मन-परिवर्तन की बात की. राजसत्ता, नया मन-मिजाज या नया इंसान नहीं गढ़ सकती. रूस की विफ़लता ने यह साबित कर दिया है. पश्चिम की चुनौतियां-हालात इस के प्रमाण हैं. भोग, लोभ-लालच, अमीरी और वैभव में बढ़े-पनपे देश-समाज, ब्रिटेन, यूरोप, अमेरिका या पश्चिम के संकट सामने हैं.

चार्वाक के अनुयायी, उधार लें, घी पीयें!
5 अगस्त 2011 को जब एस एंड पी ने विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका की आर्थिक विश्वसनीयता को एएए (ट्रिपल) से एए (डाउनग्रेड) कर दिया, तो दुनिया स्तब्ध रह गयी. अमेरिका के इतिहास में यह पहली बार हुआ. अमेरिकी शासन पर 14 खरब डॉलर का कर्ज है. अमेरिका की सबसे बड़ी देनदारी चीन और जापान को है. उसके पास कर्ज का ब्याज चुकाने के पैसे नहीं थे, इसीलिए हाल ही में सीनेट से कर्ज लेकर सीमा बढ़ाने का फ़ैसला लिया गया. अमेरिका की इस स्थिति का दुनिया के शेयर बाजार पर गहरा असर है. यूरोप में हाहाकार है. खासतौर से पश्चिमी देश ग्रीस, पुर्तगाल, आयरलैंड और स्पेन की अर्थव्यवस्था को रेटिंग एजेंसी ने कंगाल और कबाड़ की श्रेणी मान लिया है. वे अपना राष्ट्रीय कर्ज चुकाने में पूरी तरह असमर्थ हैं. आज पुर्तगाल में हर व्यक्ति 46.795 डॉलर, ग्रीस में 47.636 डॉलर, आयरलैंड में 503.914 डॉलर, इंग्लैंड या ब्रिटेन में 144.338 डॉलर के कर्ज में है. भारत में फ़िलहाल यह प्रतिव्यक्ति कर्ज 195 डॉलर है. (स्रोत : यस ओसो सितंबर 2011).

चार्वाक के दर्शन पर पश्चिम चला. ‘ऋणम् कृत्वा,घृतम पीवेत.’ उधार लीजिए और घी पीजिए. पश्चिम की हालत पर पढ़ कर या सुन कर और हालात देख कर 2005 में (22.02.2005 में) हिंदी में छपा हसन सुरूर का लेख याद आया. यह ब्रिटेन के संदर्भ में था. द क्रेडिट कार्ड जेनेरेशन. लेख का भावार्थ हम यहां छाप रहे हैं, ताकि ब्रिटेन या यूरोप या अमेरिकी आर्थिक संकट या सामाजिक बेचैनी के कारणों को हम समझ सकें. हर भारतीय को यह समझना इसलिए भी जरूरी है, ताकि वह जान सके कि भारतीय समाज किस राह पर अग्रसर है और हमारा भविष्य क्या है? इससे हम सीख सकें. हसन सुरूर लंदन में ही रहते हैं. ‘द हिंदू’ में लगातार लिखते हैं. द क्रेडिट कार्ड जेनेरेशन लेख में लेखक हसन सुरूर ने लिखा, हम सब टीनेजर्स थे. पर पैसे को लेकर उतने सहज नहीं थे. मामूली पैसा भी हम बमुश्किल ही अपने पास रख पाते थे. हमारे अभिभावक उपभोक्तावाद के चुंगल में नहीं फ़ंसे थे. उनसे यह बाजारवाद या उपभोक्तावाद कुछ वर्ष ही दूर था. और क्रेडिट कार्ड का फ़ैलाव कुछ ही लोगों तक सिमटा था.

आज की दुनिया में टीनेजर्स और अभिभावक को एक साथ रखें, तो यह लगेगा जैसे किसी दूसरे ग्रहों के लोगों को एक साथ रखा गया हो. एक ऐसी लाइफ़स्टाइल, जिसमें वास्तविक आय नहीं है, पर क्रेडिट कार्ड के जरिये बेशुमार पैसे उपलब्ध हैं. इस नयी दुनिया में ऋण लेना बिल्कुल ही आसान है. एक अध्ययन के अनुसार, ब्रिटेन में युवा आज पहले से अधिक क्रेडिट कार्ड की मांग कर रहे हैं, उनके लिए क्रेडिट कार्ड एक मैजिक की तरह है, जिससे वे हर चीज खरीद सकते हैं. अपनी इच्छा की पूत्तर्ि कर सकते हैं.

बैंक और क्रेडिट कार्ड कंपनियों ने युवा वर्ग की पहचान बड़े उपभोक्ता या खर्च करनेवालों के रूप में की है. जैसे महंगे इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, डिजाइनर लेबल की चीजें खरीदना ओद. ये कंपनियां ऐसे टीनेजर्स को ही अपना लक्ष्य बना रही हैं. 18-20 साल के कई ऐसे लोग मिलेंगे, जिनके पास कई कार्ड रहते हैं, जिन्हें वे बमुश्किल हैंडल कर पाते हैं. आपको आश्चर्य होगा कि उनमें से कइयों को यह भी नहीं पता होता कि क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड में क्या फ़र्क है.

अभिभावक अपने बच्चों को यूनिवर्सिटी एजुकेशन दिलाने में अधिक पैसे खर्च करने पर हिचकते हैं, पर किसी नये गैजेट या उपकरण को वे हंसते-हंसते अपने बच्चे को देते हैं. अगर पूछिए, तो कहा जाता है कि जब उनके मित्र और पड़ोसी अपने बच्चे को यह सब दे रहे हैं, तो फ़िर हम अपने बच्चे को भला कैसे इंकार कर सकते हैं? यह अलग बात है कि वही पड़ोसी और मित्र अपने बजट को संतुलित करने के लिए संघर्षशील रहते हैं और उन्हें इंतजार रहता है कि दूसरे अभिभावक अपने बच्चे पर इस तरह खर्च न करें.एक सर्वे के अनुसार, ब्रिटिश टीनेजर्स में से 80 प्रतिशत के पास अपना टेलीविजन सेट, स्टीरियो और मोबाइल है. अधिकतर घरों में टीनेजर्स के पास महंगे गैजेट्स जैसे कंप्यूटर, आइपॉड्स, डिजिटल कैमरा, गेम मशीन ओद हैं. एक फ़ायनेंसियल गाइड मनी के रिसर्च के अनुसार, अधिकतर युवाओं को पैसे को लेकर कोई समझ ही नहीं है. यह सब उनके माता-पिता द्वारा उपलब्ध करायी गयी सुविधाओं के कारण है. जब वास्तविक दुनिया से उनका पाला पड़ता है, तो वे अपने पैसों को सही तरीके से हैंडल नहीं कर पाते. गाइड के अनुसार, इनके लिए मां और पिता के साथ रहना, किसी भयंकर सपने के साथ रहने जैसा होता है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि ब्रिटिश टीनेजर्स के मुकाबले भारतीय बच्चे अपने माता-पिता पर ज्यादा निर्भर होते हैं. यह सही है कि पश्चिम में टीनेजर्स पार्ट टाइम जॉब करते हैं, जब वे अपने माता-पिता के साथ रहते हैं, तब भी. लेकिन यह भी सच है कि उनकी कमाई का बहुत कम ही घर के खर्च को पूरा करने में लग पाता है. दूसरे शब्दों में कहें, तो यह उनके पॉकेट मनी का ही हिस्सा बनता है, न कि घरेलू बजट को पूरा करने में.

कई टीनेजर्स जिनकी आय बहुत ज्यादा है, पर वे अपने माता-पिता को बहुत कम ही दे पाते हैं. सिवाय यह दिखावा के कि, वे अपने माता-पिता का ध्यान रख रहे हैं. जब टीनजर्स को अपने पैर पर खड़ा होना होता है, तब उन्हें दोस्तों के साथ समय बिताने या छुट्टी पर जाने में परेशानी होने लगती है. यही वह समय होता है, जब वे अपने आप को कर्ज में घिरता पाते हैं.

ब्रिटेन के क्रेडिट काउंसिलिंग सर्विसेज की एक रिपोर्ट के अनुसार 18-21 वर्ष के बीच के युवा भ्रमित और डरे हुए हैं. इस कारण इनके पास फ़ोन करने वालों की संख्या में नाटकीय वृद्धि हुई है. बीस की उम्र के युवाओं में दिवालियपन की स्थिति बड़ी भयंकर तरीके से बढ़ी है. इसका क्रेडिट, क्रेडिट कार्ड को दिया जा सकता है. एक महत्वपूर्ण लेखा फ़र्म के अनुसार, कई टीनेजर्स को यह भी पता नहीं है कि किस क्रेडिट कंपनी को कितना वापस करना है. कई ऐसे लोगों के मामले सामने आये हैं, जिनके पास दर्जनों क्रेडिट कार्ड हैं और उनके ऋण की राशि वैसी ही है, जैसे कि टेलीफ़ोन नंबर के अंक.

एक अनुमान के अनुसार, ब्रिटेन के ये नये दिवालिये हैं. इनमें आधे से भी अधिक 30 वर्ष से कम के हैं. ये क्रेडिट कार्ड पर बहुत ज्यादा कर्ज लेते हैं. बिना सोचे-समझे बेतहाशा खर्च करते हैं. उन्हें यह भी समझ नहीं है कि क्या वे उसे एफ़ोर्ड कर सकते हैं? लगभग 60 प्रतिशत दिवालिये होने के मामले में, बीस फ़ीसदी ऐसे हैं, जिनके पास 60,000 पौंड से भी ज्यादा कर्ज की राशि है. क्रेडिट कार्ड एक बड़ा कारण है, जिनके चलते लोग कर्ज में फ़ंसते हैं. टीनेजर्स जिनका पैसे के प्रति एटीटय़ूड बहुत ही लापरवाह है, उनके ज्यादा मुश्किल में फ़ंसने की संभावना रहती है. ओपिनियन पोलवालों का कहना है कि लोग खास कर, युवा जब क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं, तब वे ज्यादा खर्च करते हैं. प्राय ऐसी चीजें खरीदते हैं, जिनकी जरूरत उन्हें न के बराबर होती है. एक महत्वपूर्ण लेखा फ़र्म के प्रवक्ता ने एक अखबार को बताया कि यदि आप क्रेडिट कार्ड के जरिये शॉपिंग करने जाते हैं, तो आप सामान्य से सात गुना अधिक खर्च करते हैं.

भारत में पारिवारिक बचत ही आय और जीडीपी में विकास के सबसे बड़े कारक हैं.परिवार और समाज के स्तर पर लंदन-ब्रिटेन-पश्चिम में टूट है. गांधी अकेले इंसान हुए, जिन्होंने बदलाव के लिए मन-परिवर्तन की बात की. ‘‘यह मनोवैज्ञानिक आह्वान है कि हम सोचें कि हम क्या थे, क्या हो गये, और क्या होंगे अभी? दुर्भाग्य यह है कि ब्रिटेन का समाज अपनी जिन बुराइयों के खिलाफ़ लड़ रहा है. जिन बुराइयों ने उस समाज की प्रतिभा, तेजस्विता और शौर्य का हरण कर लिया है, वे ही बुराइयां आज भारतीय समाज में तेजी से फ़ैल रही हैं.’’

…….जारी…….

लेखक हरिवंश देश के जाने माने पत्रकार हैं. प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर अखबार से साभार लेकर भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित किया गया है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...