उप्र में जहां समाजवादी पार्टी की सरकार है और जो लोहिया की बात करती है और दावा करती है कि पूर्ववर्ती मायावती सरकार के गुण्ड़ाराज के खिलाफ आंदोलन के बूते वह पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब हो सके है। उस राज्य के सोनभद्र जनपद में पुलिस प्रशासन के सहयोग से दबंगों द्वारा दलितों-आदिवासियों पर लगातार हमले हो रहे है और न्यायालयों तक के आदेशों की अवहेलना करते हुए उनकी जमीनों को कब्जा करने की घटनाएं हो रही है। हालत इतनी बुरी है गरीबों की कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है और इसके खिलाफ आवाज उठाने वाले नेताओं समेत अधिवक्ताओं तक को शांतिभंग की आशंका में पाबंद किया जा रहा है, उन पर फर्जी मुकदमें कायम किए जा रहे हैं।
गौरतलब हो कि सोनभद्र माओवाद प्रभावित इलाकों में रहा है जहां चले लोकतांत्रिक आंदोलन के बदौलत इस क्षेत्र में शांति हासिल हुई है। ताजा घटना नगर पंचायत चुर्क की है जहां दलित राजबली की भूमिधरी जमीन पर सपा समर्थक वन कर्मी को लाभ पहुंचाने के लिए सपा के जिला महासचिव के नेतृत्व में स्थानीय चौकी इंचार्ज और पुरुष पुलिसकर्मियों ने दलित महिलाओं पार्वती उम्र 30 साल, सविता राव उम्र 30, ममता उम्र 24 साल, सरस्वती 40 साल, कुन्ती 50 साल को जिसमें 80 साल की रामदुलारी बूढ़ी महिला भी शामिल थी, को बुरी तरह मारा पीटा, उनके स्तन तक नोंच लिए गए और उन्हें अर्द्धनग्न अवस्था में जमीन पर पटका गया। हद तो यह हो गयी कि गैरकानूनी तरीके से दलितों की जमीन पर कब्जा करने और उन पर हमला करने वाले बेखौफ घूम रहे है वहीं पीड़ितों को ही मुल्जिम बना दिया गया। सपा नेताओं की गुण्ड़ागर्दी का आलम यह था कि सपा के जिला महासचिव सरकारी अस्पताल में सरकारी डाक्टर को भगाकर पीड़ितों का मेडिकल तक नहीं होने दे रहे थे।
दरअसल चुर्क नगर पंचायत में इस समय जेपी समूह का सीमेन्ट कारखाना चल रहा है जिसके कारण यहां की जमीनें काफी कीमती हो गयी है और इस इलाके में खाली पड़ी जमीनों पर दबंगों की निगाहें है वह स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर इन जमीनों के मालिकों को आतंकित कर इन पर कब्जा कर रहे है। ऐसी जमीनें जो अभी भी खाली है उनमें से ज्यादातर दलितों और आदिवासियों के पास है क्योंकि धन के अभाव में वह इन जमीनों पर निर्माण कार्य नहीं करा पाएं है। चुर्क में हुई यह घटना भी इसी का परिणाम है। इस घटना के खिलाफ न्याय के लिए पीड़ित दलित परिवार को सोनभद्र जिला कचहरी पर धरना देते हुए 15 दिन से ज्यादा बीत गया लेकिन जिला प्रशासन ने घटनास्थल पर जाना और इसकी जांच कराना तक मुनासिब नहीं समझा और उसे पीड़ितों की दुखभरी दास्तान को सुनने के लिए आज तक वार्ता करने का वक्त नहीं मिला।
आश्चर्य है कि यह सब तब हो रहा है जब महिलाओं पर हमले का सवाल राष्ट्रीय सवाल बना हुआ है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय तक ने महिलाओं के प्रति पुलिस द्वारा किए जा रहे दुर्व्यवहार पर बार-बार रोष प्रकट किया है। वास्तव में उप्र की राजनीति में दलितों, महिलाओं और समाज के गरीब तबके पर हमला करने वाली ताकतों का जो मनोबल बढ़ा हुआ है उसकी बड़ी वजह कारपोरेट पूंजी के बदौलत माफियाओं की संरक्षणदाता मुलायम-मायावती मार्का राजनीति को भी जाता है। मायावती की राजनीति ने तो दलितों का सबसे बड़ा अहित किया उन्हें डा. अम्बेडकर के संघर्ष के रास्ते से हटाकर मात्र वोट बैंक में तब्दील कर दिया परिणामस्वरूप दलितों पर हमले के मामले में अन्य किसी दल की रूचि नहीं रह गयी है। लेकिन जनपद की आंदोलन की ताकतें आईपीएफ, सीपीएम, सीपीआई, अपना दल ने पीड़ितों के इस घरने का समर्थन करने का फैसला लिया। सीपीएम, सीपीआई और आईपीएफ के राज्य नेतृत्व ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर हस्तक्षेप करने का आग्रह किया। जनपद के सहित्यकारों ने प्रख्यात साहित्यकार अजय शेखर के नेतृत्व में घरने का समर्थन किया एवं अधिवक्ताओं के विभिन्न संगठनों ने भी इस परिवार का समर्थन किया है।
इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे आईपीएफ के राष्ट्रीय प्रवक्ता दिनकर कपूर ने कहा कि चुर्क में दलितों और महिलाओं पर लाठीचार्ज किस अधिकारी के आदेश पर हुआ है और इस हमले के वक्त प्रशासन का कौन सा मजिस्ट्रेट घटनास्थल पर मौजूद था, जिस जमीन पर कथित सार्वजनिक हित के लिए सड़क को बनवाने के लिए नगर पंचायत के चेयरमैन और सपा महासचिव पुलिस के साथ पहुंचे थे क्या उसका टेण्ड़र हुआ था, दलित की जिस भूमिधरी की जमीन पर सड़क बनाने की बात की जा रही है क्या उसकी पक्की पैमाइश करायी गयी थी, क्या इस जमीन का अधिग्रहण कथित सावर्जनिक उपयोग के लिए बनने वाली सड़क के लिए जिला प्रशासन ने किया था, ऐसे बहुतेरे सवाल है जिसे सोनभद्र की जनता प्रशासन से जानना चाहती है। यह हालत मात्र चुर्क की ही नहीं है, अनपरा थाना क्षेत्र के कहुआनाला में माननीय न्यायालय के आदेश के बाबजूद कोल आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का घर रात के अंधेरे में पुलिस के सहयोग से दबंगों द्वारा कब्जा कर लिया गया, राबर्ट्सगंज के पकरी में कोलों और अल्पसंख्यकों को मारा पीटा गया और उनका धर गिरा दिया गया, चतरा के ऊंची में दलितों को मारा पीटा गया, बुड़हर में दलितों की झोपड़िया तोड़ दी गयी, सिलहटा और राजपुर में वनाधिकार कानून के बाद भी वन विभाग ने दर्जनों आदिवासियों पर मुकदमें कायम कर उन्हें जेल भेज दिया।
हालत इतनी बुरी है गरीबों के पक्ष में आवाज उठाने वाले नेताओं समेत अधिवक्ताओं तक को आतंकित किया जा रहा है। अनपरा में ठेका मजदूरों के लोकप्रिय नेता और आइपीएफ के जिला प्रवक्ता सुरेन्द्र पाल, युवा अधिवक्ता शुद्धिनारायण पाण्डेय को 107/16 पाबंद कर दिया गया और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले नागरिक आंदोलन के लोगों को फर्जी मुकदमें में जेल भेज दिया जा रहा है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि सोनभद्र, मिर्जापुर व चंदौली में दलित- आदिवासी समाज के लोग व्यवस्था से अलगाव और विक्षोभ की वजह से ही माओवाद के प्रभाव में चले गए थे जो उस क्षेत्र में लगातार चले लोकतांत्रिक आंदोलन की वजह से प्रभावित होकर राजनीति की मुख्यधारा में लौट आएं और इस क्षेत्र में माओवाद का प्रभाव समाप्तप्राय है। आज जनपद में कानून के लोकतांत्रिक शासन को खत्म कर दिया गया है और प्रशासन द्वारा लोकतांत्रिक आंदोलन की अवहेलना की जा रही है। दलितों और आदिवासियों के उत्पीड़न के मामलों में प्रशासन द्वारा जारी संवेदनहीनता लोकतांत्रिक आन्दोलन के बदौलत हासिल इस क्षेत्र की शांति को भंग करने का काम करेगी। इस नाते सोनभद्र में जारी आंदोलन गुण्ड़ा राज का मुकाबला करने और कानून के लोकतंत्रिक शासन की स्थापना के लिए है। यदि सरकार और प्रशासन ने पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं दिया तो इसका खामियाजा सपा को भुगतना होगा।





