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दिवालिया घोषित होने के लिए लंबी कतार लगी है टीनेजर्स की

: पश्चिम का संकट-2 : युवाओं को समाज से जोड़ने की चुनौती : ।। ब्रिटेन से लौट कर हरिवंश की रिपोर्ट ।। द इंडिपेंडेंट में एक महत्वपूर्ण स्टोरी (खबर) छपी है. इसमें 22 साल के जैक कर्जन के बारे में बताया गया है. वे बेरोजगार हैं, ड्रामा के छात्र हैं. इसमें बताया गया है कि कैसे युवा वर्ग क्रेडिट कार्ड के कारण बरबाद हो रहा है. उसने अखबार को बताया कि उसके कर्ज का चक्र तब बढ़ा, जब उसने क्रेडिट कार्ड लिया. क्रेडिट कार्ड से पहले, मैंने वही खर्च किया जो मेरे अकाउंट में था. लेकिन जब मैंने क्रेडिट कार्ड लिया और तब जो मैंने खर्च किया, वह वास्तव में मेरे पास था ही नहीं. अगर कुछ था, तो वह थी मेरी इच्छा. उसने शीघ्र ही तीन कार्ड और ले लिये. नये कार्ड लेने के लिए न्यूनतम बैलेंस की जरूरत होती है, उसे भी मैंने दूसरे कार्ड के बैलेंस को ट्रांसफ़र करके पूरा किया. मेरा कर्ज लगातार बढ़ रहा था और मैं राशन खरीदने के लिए भी क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल कर रहा था.

: पश्चिम का संकट-2 : युवाओं को समाज से जोड़ने की चुनौती : ।। ब्रिटेन से लौट कर हरिवंश की रिपोर्ट ।। द इंडिपेंडेंट में एक महत्वपूर्ण स्टोरी (खबर) छपी है. इसमें 22 साल के जैक कर्जन के बारे में बताया गया है. वे बेरोजगार हैं, ड्रामा के छात्र हैं. इसमें बताया गया है कि कैसे युवा वर्ग क्रेडिट कार्ड के कारण बरबाद हो रहा है. उसने अखबार को बताया कि उसके कर्ज का चक्र तब बढ़ा, जब उसने क्रेडिट कार्ड लिया. क्रेडिट कार्ड से पहले, मैंने वही खर्च किया जो मेरे अकाउंट में था. लेकिन जब मैंने क्रेडिट कार्ड लिया और तब जो मैंने खर्च किया, वह वास्तव में मेरे पास था ही नहीं. अगर कुछ था, तो वह थी मेरी इच्छा. उसने शीघ्र ही तीन कार्ड और ले लिये. नये कार्ड लेने के लिए न्यूनतम बैलेंस की जरूरत होती है, उसे भी मैंने दूसरे कार्ड के बैलेंस को ट्रांसफ़र करके पूरा किया. मेरा कर्ज लगातार बढ़ रहा था और मैं राशन खरीदने के लिए भी क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल कर रहा था.

इसके बाद भी बैंक या कंपनियों के निर्णयों को देखें. उसके बढ़ते हुए ऋण के बावजूद, उसके बैंक ने उसे दूसरा क्रेडिट कार्ड दिया. यह एक ऐसे आदमी को दिया गया, जिसके पास नियमित नौकरी तक नहीं थी. उस व्यक्ति ने बताया कि उसने इस नये कार्ड से खर्च करना शुरू किया. जैसे ही मैं फ़िर उसी स्थिति तक पहुंचा, उन्होंने फ़िर से एक कार्ड दे दिया. एक समय उसके पास चार क्रेडिट कार्ड थे, जिससे कुल मिला कर 20000 पौंड का ऋण चढ़ गया था. तब उसने कंज्यूमर क्रेडिट काउंसेलिंग सर्विसेज से संपर्क किया. उन्होंने बताया कि इस कर्ज को वापस करने में उसे दस साल से भी अधिक समय लगेंगे. उन्होंने सलाह दी कि इससे बचने का एक ही रास्ता है कि एक साल के लिए आप अपने आप को दिवालिया घोषित कर दें.

जूलिया स्टुअर्ट एक पत्रकार हैं. उन्होंने दिन भर कोर्ट में समय बिताया और पाया कि टीनेजर्स की लंबी कतार लगी है. दिवालिया घोषित होने के लिए. गौरतलब है कि दिवालिया घोषित होने के लिए नियमों को थोड़ा सरल बनाया गया है. वहां वह दिवालिया घोषित होने के लिए खड़ी एक 20 साल की लड़की से मिली, जो अपनी मां के साथ आयी थी. उसकी मां भी क्रेडिट कार्ड होल्डर थी. वह इस बात को लेकर परेशान थी कि उसे इसकी इजाजत नहीं दी जा रही कि वह अपने क्रेडिट कार्ड से अपनी बेटी की ऋण की राशि की अदायगी करे.

क्रेडिट कार्ड और लोन के आसानी से उपलब्ध होने को लेकर हर जगह चिंता जतायी गयी है, जिसके कारण टीनेजर्स में कर्ज लेने का स्तर भयंकर रूप से बढ़ा है. ऐसा माना जा रहा है कि इसके कारण कुल राष्ट्रीय घरेलू ऋण की राशि 1000 बिलियन पौंड तक पहुंच गयी है. ऐसी खबरें आ रही हैं कि ऋण के चक्र में घिरने के कारण कई लोग आत्महत्या कर रहे हैं. हाल के वर्षो में जिस तरह से डेट काउंसेलिंग सर्विसेज (कर्ज काउंसेलिंग सेवा)की संख्या बढ़ी है, उससे यह संकेत मिलता है कि समस्या कितनी गंभीर है, कितनी व्यापक स्तर पर है. विशेषज्ञ सावधान कर रहे हैं कि व्यक्तिगत ऋण जिस तरह से बढ़ रहा है, उससे पूरा परिवार तबाह हो सकता है. इससे अर्थव्यवस्था की स्थिरता को भी खतरा पहुंच सकता है. सरकार पर इस बात को लेकर दबाव है कि वह ऋण देनेवाली एजेंसियों पर कड़ा नियंत्रण रखे, जिन पर आरोप है कि वे अपने ग्राहकों को ऋण या लोन के बारे में ठीक से नहीं बतातीं.

संसदीय समिति की हाल की एक रिपोर्ट में क्रेडिट कार्ड कंपनियों की इस बात की आलोचना की गयी है कि वे अपने ग्राहकों से लाभ लेने के मामले में पारदर्शिता नहीं रखतीं. राष्ट्रीय स्तर पर देखें, तो क्रेडिट कार्ड देनेवाली कंपनियां और बैंक हरेक साल आधे बिलियन पौंड से भी ज्यादा लाभ कमाते हैं. वो भी ब्याज से जु़ड़ी शर्तों में उलटफ़ेर करके. राजनीतिज्ञों ने ग्राहकों को इस जालसाजी से बचाने के लिए अधिक पारदर्शी व्यवस्था की मांग की है. लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने इसे अर्थव्यवस्था के लिए अकेला सबसे बड़ा खतरा बताया है और साथ ही गैर जिम्मेदार कंपनियों पर लगाम लगाने के लिए विधेयक की मांग की है. इसके प्रवक्ता बिंसे केबल ने बताया कि व्यक्तिगत ऋण की जो वर्तमान स्थिति है, उससे निपटा जा सकता है, क्योंकि अर्थव्यवस्था में तेजी है, सूद की दर कम है, बेरोजगारी कम है, पर यदि अर्थव्यवस्था में थोडा सा भी मंदी आ जाये, तो इससे अफ़रा-तफ़री मचेगी.

ऋण से संबंधित काउंसलिंग चलानेवालों का कहना है कि सरकार द्वारा हस्तक्षेप स्वागतयोग्य है. पर वास्तव में यह आम लोगों को ही तय करना होगा कि वे ऋण से संबंधित बातों को सही तरीके से जान लें. वे परिवारों को सलाह दे रहे हैं कि वे बेसिक्स (बुनियादी बसूलों) की ओर लौटें. जीवन जीने की जो पुरानी पद्धति है, उसे फ़िर से सीखें. पैसे को लेकर क्या किया जाना चाहिए, यह भी अपने बच्चे को जरूर बतायें.

यह है, छह वर्षों पहले के ब्रिटेन की स्थिति की झलक. छह वर्षों पहले छपा यह लेख, कितना महत्वपूर्ण और आनेवाले भविष्य को इतना साफ़ पढ़नेवाला. दो वर्षों पहले जो मंदी, पश्चिम के मुल्कों में आयी, उसकी पृष्ठभूमि समझने के लिए यह सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है. आज यूरोप-ब्रिटेन जिस आर्थिक संकट-चुनौतियों से घिरे हैं, उसके कारणों-जन्म पर इतना साफ़ भविष्य बतानेवाला लेख नहीं पढ़ा. यह लेख मुझे याद रहता है, भारत के संदर्भ में. भारत की प्रथा और युवा पीढ़ी को बाजारवाद, उपभोक्तावाद और बैंक उधर ही ढकेल रहे हैं, जिसमें ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप फ़ंसे हैं.

आज पश्चिम के इन महाशक्तिशाली देशों की क्या स्थिति है. यह स्थिति अचानक नहीं बनी. कैसे धीरे-धीरे सबसे ताकतवर लोग दीनता और बेबसी की हालत में पहुंच रहे हैं. यह समझना हर भारतीय के लिए जरूरी सबक है. इतिहास की यह घटना हमें भविष्य के प्रति चौकस करती है, सीख देती है कि हमारा समाज या देश कैसे इन हालात से बच सकता है?

यह समझने में हसन सुरूर का लेख बड़ा मददगार है. आज क्रेडिट कार्ड जेनेरेशन भारत में भी पैदा हो गयी है. एक-एक आदमी के पास कई-कई क्रेडिट कार्ड हैं. क्रेडिट कार्ड यानी भोग-उपभोग की प्रबल इच्छा पैदा करने का इंस्ट्रमेंट या माध्यम. भविष्य की तबाही और कंगाली का औजार. एक-एक आदमी दर्जनों क्रेडिट कार्ड, इन देशों-मुल्कों में रखने लगे. भारत के युवा भी उसी राह पर हैं. 2005 में हसन सुरूर ने लिखा- वहां की ब्रिटिश पार्लियामेंट ने इस बात पर डिबेट किया. पर वे कोई राह नहीं तलाश सके और अब 2011 में हुए दंगों की जिम्मेदारी ऐसी ही युवा कर्जखोर पीढ़ी पर है. जो समाज ‘भोगी पीढ़ी’ पैदा करे, ‘लुंपेन’ पीढ़ी पैदा करे, जहां परिवार और समाज का कोई रिश्ता इंसान से न हो, वह समाज तो बेकहल, कंगाल और अराजक बनेगा ही. यही हाल पश्चिम का है.

आज महाशक्तिशाली पश्चिम, महाबली अमेरिका के नेतृत्व में अपने आर्थिक उद्धार और मुक्ति के लिए चीन की ओर देख रहा है. यूरोप-अमेरिका, चीन के बल अपनी कंगाली से मुक्ति चाहते हैं. तीन यूरोपीय देशों के सरकारी बांड रद्दी कागज की स्थिति में हैं. इटली और खराब हाल में है. उसकी साख का लगातार क्षय हो रहा है. उनके चर्चित प्रधानमंत्री बरलुसकोनी के बारे में फ़ाइनेंशियल टाइम्स (21 सितंबर 2011) में एक मजाकिया उल्लेख था कि इटली के प्रधानमंत्री एक कथित वेश्या से बात कर रहे थे, कि मैं खाली समय में ही प्रधानमंत्री पद का काम करता हूं. (प्राइम मिनिस्टर इन माइ स्पेयर टाइम्स.) कॉलगर्ल्स प्रसंग में दुनिया के सबसे चर्चित चेहरे हैं, इटली के प्रधानमंत्री. इटली की अर्थव्यवस्था नाजुक दौर में है. मजाक में उन्हें पार्ट टाइम पीएम कहा जाता है. शेष समय वह सुंदरियों के साथ गुजराते हैं. यूरोप के 17 देश को यह अर्थसंकट घेर चुका है. बेलआउट पैकेज बन रहे हैं.

पर जर्मनी का रुख कड़ा है. ब्रिटेन अपने वित्तीय घाटों को पाटने के लिए बेचैन है. ब्रिटेन में साझा सरकार है, पर उसके सामने आर्थिक संकट से निकलने की कठिन चुनौतियां हैं. लगातार खर्चो में कटौतियां हो रही हैं. सादगी और मितव्ययता के कदम उठाये जा रहे हैं. सरकार अपने खर्चो में कटौती कर रही है. ग्रीस की हालत तो सबसे बदतर है. कठोर कदम उठाये जा रहे हैं, ग्रीस को कंगाली या तबाही से बचाने के लिए. मई 2010 में 110 बिलियन डॉलर देने का अंतरराष्ट्रीय रेस्क्यू पैकेज (बचाव राशि) की योजना बनी. ग्रीस, इटली, आयरलैंड, पुर्तगाल और स्पेन बड़े कर्जो से लदे हैं. पुर्तगाल, आयरलैंड और शायद स्पेन कंगाल या दिवालिया होने के करीब है. ग्रीस तो उस हाल में है ही. स्पेन की हालत भी बहुत खराब है. अमेरिका और यूरोप में आज बाजार का विश्वास डिगा है.

ऋण बोझ बहुत अधिक है. बैंकों के हालात डगमग हैं. यूरोपियन यूनियन (इ.यू.) का अस्तित्व खतरे में है. यूरोप बड़े संकट में है. ग्रीस के बारे में चर्चा भी सुनी कि वित्तीय ढांचे को संभालने और बेहतर करने के लिए सूपर ह्यूमन प्रयास हो रहे हैं, पर पश्चिम के देशों और ब्रिटेन मेंइस बात पर गहरी चर्चा भी हो रही है कि उद्धार कैसे हो? इस संकट से हम उबरें कैसे? एक तरफ़ संकट कैसे-क्यों खड़े हुए, इसके कारणों की तलाश और दूसरी ओर इन संकटों से निकलने के लिए बेचैनी.

1930 में दुनिया की चर्चित आर्थिक मंदी आयी थी. तब लंदन स्कूल आफ़ इकोनॉमिक्स और कैंब्रिज के अर्थशास्त्रियों के बीच बड़ी बहस (डिबेट) चली थी कि किन अर्थनीतियों से हम इस स्थिति से निकलें? सबसे बड़ा सवाल था कि तात्कालिक और फ़ौरी रास्ता क्या है? तब अर्थशास्त्री जॉन का उदय हुआ, जिनका महत्वपूर्ण कथन था, ‘‘इन लांग रन वी आर ऑल डेड’’ (दीर्घकाल में हम सब मर-खप जाते हैं.) इसलिए सवाल है कि तात्कालिक रणनीति क्या हो? यह एहसास ब्रिटेन की साझा सरकार को है. ब्रिटेन सरकार के उपप्रधानमंत्री निक क्लेग (22.09.2011) ने अपने दल के लोगों को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘ब्रिटेन फ़ेस्ड द इकोनोमिक इक्वीवेलेंट ऑफ वार’’ (ब्रिटेन आज युद्ध की तरह आर्थिक संकट से जूझ रहा है). उन्होंने बड़ी मार्मिक बातें कीं.

अपने दल लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी की कान्फ्रेंस में कहा कि साझा सरकार ने अर्थव्यवस्था को संकट के चंगुल से निकाला है. व्यवस्था मेंअवसर बढ़े हैं. न्याय सुलभ हुए हैं. उन्होंने कहा,‘‘वी आर राइट टू पुल द इकोनॉमी बैक फ्रॉम द ब्रिंक’’ (हमने कंगाली के कगार से अर्थव्यवस्था को वापस खींच लिया). पर उन्होंने माना कि यूरोपियन यूनियन देशों में यूरो संकट और अमेरिका का डाउनग्रेड होना, ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था के लिए खराब संकेत हैं. उन्होंने अपने दल के साथियों का आह्वान किया, ‘‘वी नीड टू डू मोर, वी कैन डू मोर एंड वी विल डू मोर फ़ॉर ग्रोथ एंड जस्टिस.’’ यानी, अभी हमें बहुत कुछ करना है, हम और अधिक कर सकते हैं. हम और अधिक करेंगे, विकास और न्याय के लिए.

इस भाषण में उन्होंने ब्रिटेन की उस युवा पीढ़ी का भी उल्लेख किया, जो दिशाहीन है, जो अपनी जड़ नहीं खोज पा रही है, जो बेचैन है. उग्र है. अवसर या रोजगार की तलाश में है, और भोग की इच्छा से ग्रसित है. उन्होंने कहा कि हम उन बच्चों की मदद करेंगे, हू लॉस्ट टच विद देअर ओन फ्यूचर (जिनका अपने भविष्य से नाता टूट गया है). उन्होंने कहा दंगों के बाद सिर्फ़ छह शब्द हम कहेंगे, जो छह सौ भाषणों से भी अर्थपूर्ण हैं (‘सिक्स वर्डस दैट से मोर देन सिक्स हंड्रेड स्पीच’). कहा, हमारी प्राथमिकता है- आवर होम, आवर चिल्ड्रन, आवर फ्यूचर (छह शब्द का यह नारा है, हमारा घर, हमारे बच्चे, हमारा भविष्य).

दरअसल, पश्चिम में या यूरोप में या अमेरिका या ब्रिटेन में अर्थव्यवस्था से बड़ा संकट है, सामाजिक संकट या सामाजिक ताना-बाना का बिखर जाना. वहां घरों में दरारें आ चुकी हैं (बढ़ते तलाकों से). बच्चे-परिवार बिखर चुके हैं (परिवार टूटने के कारण). और जब घर या परिवार टूट जायें, तो भविष्य से नाता तो टूटना ही है. दरअसल, पश्चिम के विकास का मॉडल ही ऐसा है, जिसमें ये सारी चीजें अंतर्निहित हैं. हाल के दंगों के बाद वहां बच्चों में मूल्य और संस्कार डालने की बात पर समाज में जोरदार चर्चा है.

कैसे ताकतवर लोग बेबसी की हालत में पहुंच रहे हैं, यह समझना हर भारतीय के लिए जरूरी सबक है.चीन के बल अपनी कंगाली से मुक्ति चाहते हैं यूरोप-अमेरिका.हाल के दंगों के बाद ब्रिटेन के बच्चों में मूल्य और संस्कार डालने की बात पर समाज में जोरदार चर्चा है.

टूटता परिवार, बिखरता समाजस्ट्रीट पर लावारिस लाशों की तरह पड़े लोग, नशे में सड़कों के किनारे नाचते-गाते युवक-युवतियां, सार्वजनिक स्थानों पर भावनाओं का फूहड़ प्रदर्शन करते किशोर-किशोरियां, नशे के कारण उल्टियां करते लोग और मदद में जुटी पुलिस, रोते-बिलखते-चिल्लाते युवकों की टोलियां. यह नजारा किसी पब या बार का नहीं, बल्कि लंदन की गलियों का है, जिसे सप्ताह के अंत में शहर के हर हिस्से में देखा जा सकता है. शहर की ये गलियां और चौराहे उच्छृंखल जीवन शैली में डूबे युवाओं की आदतों की प्रत्यक्ष गवाह हैं.

रिपोर्टों के मुताबिक किशोर व किशोरियों की इन आदतों के कारण उनके स्वास्थ्य पर तो असर पड़ ही रहा है, साथ ही स्वास्थ्य विभाग का खर्च भी बढ़ गया है. वहीं, जीवन को भोगने की चाह युवाओं में इस कदर बढ़ी है कि वे जाने-अनजाने में सभी वर्जनाएं भी तोड़ रहे हैं. हाल ही में, एक 24 वर्षीय युवती (शादी नहीं हुई) पूर्वी लंदन के एक अस्पताल में बच्चे को जन्म देने के बाद नवजात को अस्पताल में ही छोड़ कर चली गयी. चिकित्सकों का मानना है कि इस तरह कि घटनाओं में धीरे-धीरे हो रही वृद्धि राष्ट्रीय समस्या बन सकती है. वहीं, समाज वैज्ञानिक कहते हैं कि मां के आंचल व पिता के स्नेह के बगैर पैदा हुए बच्चों की संख्या इस कदर बढ़ती रही तो देश का भविष्य समझा जा सकता है. जिन्हें औरों का सहारा बनना था वो खुद ही कंधे तलाश रहे हैं.

एक समय उसके पास चार क्रेडिट कार्ड थे, जिससे कुल मिला कर 20000 पौंड का ऋण चढ़ गया था. तब उसने कंज्यूमर क्रेडिट काउंसेलिंग सर्विसेज से संपर्क किया. उन्होंने बताया कि इस कर्ज को वापस करने में उसे दस साल से भी अधिक समय लगेंगे. उन्होंने सलाह दिया कि इससे बचने का एक ही रास्ता है कि एक साल के लिए आप अपने आप को दिवालिया घोषित कर दें.

…जारी…

हरिवंश देश के जाने माने पत्रकार हैं. प्रभात खबर हिंदी दैनिक के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर अखबार से साभार लेकर यहां भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित किया गया है. पहला पार्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें- पार्ट एक

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