लगभग सात महीने पहले जाने माने मीडिया समीक्षक केन ऑलेट्टा ने अमेरिकी पत्रिका न्यूयॉर्कर के 8 अक्टूबर के अंक में टाइम्स ग्रुप के मालिकों के बारे में नौ पन्नों का आलेख लिखा था। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे टाइम्स ऑफ इंडिया और टाइम्स नाउ के मालिक देश का नंबर वन मीडिया हाउस अपनी जेब में रखने के बावजूद अपने पाठकों से धोखा कर रहे हैं। अखबार के पन्नों में पवित्रता नाम की कोई चीज नहीं है। इसका हर कॉलम पैसा लेकर बेचा जा सकता है, क्यों कि इनके लिए अखबार केवल एक माल है।
पाक्षिक (न्यूयॉर्कर) ने उल्लेख किया था कि किस तरह जैन बंधु पत्रकारिता को महज जरूरी मुसीबत की तरह देखते हैं और विज्ञापनदाताओं को असली ग्राहक मानते हैं। इसमें आश्चर्य वाली कोई बात नहीं है कि टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रिंट लाइन में संपादक का नाम नहीं छपता, क्योंकि अखबार में कोई संपादक ही नहीं है। जैन बंधुओं ने नहीं, बल्कि किसी और ने बहुत पहले कहा था कि अखबार में लिखना विज्ञापन की पीठ पर लिखने जैसा होता है। जैन बंधु इस कथन का पूरी तरह पालन करते हैं।
खैर, इस मामले का फिर से चर्चा करने का कारण यह है कि लगभग सात महीने बाद टाइम्स ऑफ इंडिया की तरफ से इस लेख पर संज्ञान लिया गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया के एक्जीक्यूटिव एडिटर अरिंदम सेन गुप्ता ने इस खबर को लेकर पत्र लिखा है तथा अपनी सफाई पेश की है।






