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भारत में भी नवधनाढ्यों के प्रति समाज में गहरी नफरत-घृणा है

: भारत, युवाओं का देश माना जा रहा है. पर नये रोजगार के अवसर कहां हैं? लाखों छात्र इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट की डिग्री लेकर निकल रहे हैं, पर न उनमें हुनर या योग्यता है, न नौकरी के अवसर. पर इन छात्रों के सपने तो बाजार, भोग, दर्शन और युगधर्म ने बदल दिये हैं. ये न गांवों में काम कर सकते हैं, न इन्हें छोटी तनख्वाह या मामूली सुविधाएं चाहिए. जब इस युवा पीढ़ी के सपने और अरमान अधूरे-अतृप्त रहेंगे, तो व्यवस्था के खिलाफ आग सुलगेगी :

: भारत, युवाओं का देश माना जा रहा है. पर नये रोजगार के अवसर कहां हैं? लाखों छात्र इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट की डिग्री लेकर निकल रहे हैं, पर न उनमें हुनर या योग्यता है, न नौकरी के अवसर. पर इन छात्रों के सपने तो बाजार, भोग, दर्शन और युगधर्म ने बदल दिये हैं. ये न गांवों में काम कर सकते हैं, न इन्हें छोटी तनख्वाह या मामूली सुविधाएं चाहिए. जब इस युवा पीढ़ी के सपने और अरमान अधूरे-अतृप्त रहेंगे, तो व्यवस्था के खिलाफ आग सुलगेगी :

भोग और बाजार ने आंदोलन या परिवर्तन की सभी संभावनाओं को खत्म कर दिया है? क्यों 1968 के पेरिस छात्र आंदोलन या भारत में 1974 के छात्र आंदोलन या नवनिर्माण आंदोलन जैसे बदलाव के संकेत अब नहीं दिखते? अण्णा हजारे का उदय, फिर अस्त. अरविंद केजरीवाल के धमाके, फिर खामोशी. बाबा रामदेव का उफान, फिर उनके खिलाफ कार्रवाई और चुप्पी. यानी यथास्थिति तोड़ने के हर प्रयास का अंत विफलता में क्यों? फिर परिवर्तन की आग या संभावना कहीं है?

यह स्थिति समझने में मदद मिली रोचेस्टर विश्वविद्यालय के प्रोफे सर जान आसबर्ग का इंटरव्यू पढ़ कर. एक अंग्रेजी अखबार में छपी बातचीत का शीर्षक था, द रिच आर वाइडली हेटेड इन चाइना (धनवानों के प्रति पूरे चीन में नफरत). ओसबर्ग का काम प्रेरक है. चीन को समझने के लिए उन्होंने चार वर्षो तक चीनी भाषा (दुनिया की सबसे कठिन भाषा) सीखी. खूब डूब कर. तप कर. गरमी की छुट्टियों में बीजिंग में रह कर, विशेष कोर्स करके. फिर तीन वर्ष चीन में फील्डवर्क किया. एक लोकल टीवी चैनल में वर्षों काम किया. चीन के समृद्ध और गरीब तबके से नजदीकी रिश्ते बनाये. नेटवर्क बन जाने पर नौकरी छोड़ दी. फिर आंकड़े-तथ्य जुटाये. फील्डवर्क किया. लगभग सात-आठ वर्ष गहराई से चीनी समाज को समझा. चीनियों से नजदीकी रिश्ते बना कर. उनकी भाषा में, उनकी संस्कृति की दृष्टि से उनकी चिंता-भाव समझ कर. तब पुस्तक लिखी एनक्शस वेल्थ (बेचैन या चिंतित धन). पुस्तक के निष्कर्ष गहरे हैं और भारतीय परिवेश-समाज में भी समान रूप से लागू हैं. भारत के लिए भी अर्थपूर्ण पुस्तक है.

उनके शोध- अध्ययन का निष्कर्ष है कि माओ के बाद चीन में नवधनाढ्य वर्ग खूब धनी हुआ है. अपार संपदा का मालिक. पर इन धनिकों की स्थिति चीन में अत्यंत खतरनाक या अनिश्चित है. इनके प्रति शेष चीनियों में गहरी नफरत या रोष है. आम धारणा है कि इन लोगों ने अनैतिक व गैरकानूनी ढंग से संपदा बनायी है. माओ की पोती भी चीन के सबसे धनी लोगों की सूची में है. पांच बिलियन युआन की मालकिन. चीन की द न्यू फार्चून पत्रिका के अनुसार वह चीन के धनी लोगों की श्रेणी में संख्या 242 की सीढ़ी पर खड़ी हैं. माओ की पोती ने अपनी संपदा बढ़ाने में माओ के ब्रांड नाम का भी उपयोग किया है. उसने माओ पर चार किताबें लिखी हैं, जो बेस्टसेलर मानी जाती हैं. चीन के तासिंहुआ विश्वविद्यालय ने एक शोध कराया है. इस विश्वविद्यालय के चीनी डाटा केंद्र से मिले आंक ड़ों के अनुसार, जिन चीनी बच्चों के परिवार के लोग या माता-पिता सरकारी पदों पर हैं, वे उन चीनी बच्चों के मुकाबले, जिनके माता-पिता सरकारी पदों पर नहीं हैं, 15 फीसदी अधिक कमाई करते हैं. साफ है कि यह व्यवस्था का समर्थन है.

भारत की तरह. भारत में भी बंसल ताजा उदाहरण हैं. मंत्री बने, तो परिवार खाकपति से अरबपति हो गया. भारत में ऐसे करोड़ों किस्से हैं. इस रास्ते अमीर होनेवालों के प्रति चीन में भी जलन और घृणा है. इस धनी वर्ग को अनैतिक और चीन के परंपरागत गुणों, मूल्यों और संस्कारों से रहित माना जाता है. धनी चीनी वर्ग अपनी संतानों या संपदा को बाहर के मुक्त पश्चिमी देशों में भेजना चाहता है. सबसे अधिक चीनी छात्र आज विदेशों में पढ़ते हैं. चीन की केंद्रीकृत व्यवस्था का लाभ लेकर धनी होनेवाले चीनी भी अपने बच्चों का भविष्य बाहर के मुक्त देशों में ही देखते हैं. प्रोफेसर ओसबर्ग बताते हैं कि ‘ब्यूटी इकानामी’ (सौंदर्य अर्थव्यवस्था) शब्द का प्रयोग, सबसे पहले चीनी पत्रकारों ने शुरू किया.

इसका आशय है, चीनी चीजों को बेचने और वाणिज्यिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर सुंदर, युवा व आकर्षक युवतियों (सेल्सगर्ल) का उपयोग-इस्तेमाल. वैसे भी बाजार दर्शन के तहत उपभोक्तावाद का दर्शन सौंदर्य की सीढ़ी पर परवान चढ़ता है. ओसबर्ग कहते हैं कि यह फिनामिना (प्रचलन) अन्य पूंजीवादी देशों में भी है. औरतों का जिस्म-सौंदर्य, जिंस या पदार्थ के रूप में इस्तेमाल होने लगा है. रोमांटिक संबंध, यौन संबंध, रखैल परंपरा, सबकुछ प्रचलन में आया है. कुछ धनी चीनियों ने कहा कि उनकी रखैल, महज पूंजी एकत्र करने के लिए वर्षो से साथ हैं, ताकि पूंजी संग्रह के बाद व्यवसाय शुरू कर सकें. अन्य धनी चीनियों ने कहा कि औरतों का सौंदर्य-यौवन, एक तरह से पूंजी और संसाधन हैं. ये व्यर्थ न हों या उम्र बढ़ने के साथ अनुपयोगी न हो जायें, इसके लिए इनका उपयोग जरूरी है. इस ‘ब्यूटी इकानामी’ (सौंदर्य की अर्थव्यवस्था) को धनी चीनी सही ठहराते हैं. पर कनफ्यूशस या लाओत्से के देश चीन में गहरे परंपरागत संस्कार रहे हैं. आम चीनी इन संस्कारों पर चोट से तिलमिलाता है. चीन के लोग अब भी याद करते हैं कि सत्ता में आने के बाद माओ ने देह व्यापार बंद कराया था. इस तरह चीन के एक बड़े तबके में इस पर चिंता है कि यह उदारीकरण की अपसंस्कृति है. फिर भी इस नफरत में बदलाव की आग नहीं है. पेच कहीं और है.

लाखों-लाख की संख्या में चीनी विद्यार्थी पढ़ कर निकल रहे हैं. वे सभी पांच सितारा जीवन का ख्वाब पालते हैं. उन्हें नौकरी चाहिए, पर नौकरी में सुरक्षा और सुविधाएं भी. हालांकि यथार्थ यह है कि लाखों-करोड़ों की संख्या में ऐसे रोजगार हैं ही नहीं. पर ख्वाहिश है कि सबको ‘ह्वाइटकालर जॉब’ (सफेदपोश काम) मिले. चीनियों की इस पीढ़ी ने हर कुरबानी देकर अपने-अपने बच्चों को बेहतरीन शिक्षा देने की कोशिश की है. चीन की यह पीढ़ी बच्चों के भविष्य में ही अपना भविष्य देखती है. इस तरह यही युवा चीनी छात्र हैं, चीनी घरों की उम्मीदें. इस तरह के चीनी बच्चों पर सफल होने के लिए गहरा मानसिक दबाव है. सफल यानी भारी संपदा और सुख-सुविधाओं का होना. इस नये चीन का यह दर्शन पढ़ते हुए, माओ के चीन की याद आयी, जहां निजी संपत्ति प्रतिबंधित थी. सौंदर्य प्रदर्शन या उपभोक्तावाद को बुजरुआ संस्कार कहा गया. उसी धरती पर इतिहास पलट गया है. अद्भुत है, इतिहासचक्र. निजी धन, संपदा या भोग को पतन का प्रतीक माननेवाले चीन में आज यही सब पाने के सपनों के साथ चीनी बच्चे, अपने बूढ़े पिता-परिवार की एकमात्र चिराग या आश हैं. पर इन चीनी युवकों को वह जीवन, सुरक्षा या नौकरी दे पाना मुमकिन नहीं, जो इन चीनी युवाओं के सपनों में है. यह युवा असंतोष, निराशा और उद्देश्यरहित जीवन-दर्शन ही वह आग है, जो चीन का भविष्य बदल सकती है.

पर चीन ही क्यों? दुनिया की मशहूर पत्रिका द इकानामिस्ट (27 अप्रैल-3 मई) की कवर स्टोरी है, ‘जेनरेशन जॉबलेस’ (बेरोजगार पीढ़ी). आज दुनिया में बेरोजगार युवाओं की संख्या, संयुक्त राज्य अमेरिका की आबादी के बराबर है. यह बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है. हर देश में. भारत में भी आर्थिक विकास दर की स्थिति खराब है. कुशासन, चौपट गवर्नेस और भ्रष्टाचार इस आग में घी का काम कर रहे हैं.

अब इस पृष्ठभूमि में भारत को देखिए. भारत, युवाओं का देश माना जा रहा है. पर नये रोजगार के अवसर कहां हैं? लाखों छात्र इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट की डिग्री लेकर निकल रहे हैं, पर न उनमें हुनर या योग्यता है, न नौकरी के अवसर. मिकेंजी ने भारत के छात्रों के संबंध में कहा था कि लगभग सत्तर फीसदी इंजीनियर या मैनेजमेंट ग्रेजुएट ‘अनइंप्लायबुल’ (नौकरी के योग्य नहीं) हैं. पर इन छात्रों के सपने तो बाजार, भोग, दर्शन और युगधर्म ने बदल दिये हैं. ये न गांवों में काम कर सकते हैं, न इन्हें छोटी तनख्वाह या मामूली सुविधाएं चाहिए. ‘एवरीथिंग नाऊ’ (तत्काल हर चीज) दर्शन से प्रेरित है, यह भारतीय युवा पीढ़ी भी. पर जब इस युवा पीढ़ी के सपने और अरमान अधूरे-अतृप्त रहेंगे, तो व्यवस्था के खिलाफ आग सुलगेगी. सिर्फ चीन में इस स्थिति की संभावना नहीं है, भारत भी उसी स्थिति में है. उदारीकरण के बाद भारत में सिर्फ भ्रष्टाचार की बाढ़ ही नहीं आयी है, बल्कि धनाढ्य वर्ग की संपदा भी बेशुमार बढ़ी है. कुछ समाजशास्त्री या आर्थिक विश्लेषक मानते हैं कि भारत में भी पैसेवालों की संपदा, सरकार के सौजन्य से कई गुना बढ़ी है. लगभग मुफ्त प्राकृतिक संसाधनों की बंदरबाट कर. लौह अयस्क या कोयला खदान आवंटन या सरकारी जमीन के मामूली दर पर आवंटन से, यानी प्राकृतिक संसाधनों की सौगात दे कर यहां भी सरकार ने अपने प्रियपात्र घरानों को बेशुमार दौलत सौंप दी है. कोयला आवंटन, भ्रष्टाचार प्रकरण यही है.

इसी तरह सिर्फ चीन में, चीन का दौलतमंद वर्ग, कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सहयोग-साझीदारी से संपत्तिवान नहीं बना है, बल्कि भारत में भी ऐसा हुआ है. इसलिए भारत में भी नवधनाढ्यों के प्रति समाज में गहरी नफरत-घृणा है. पर फिलहाल अव्यक्त है. जैसे-जैसे यह आर्थिक विषमता गहरायेगी, यह आग, ज्वाला बनेगी. आज भारत में भी (चीन की तरह) धनी व सक्षम वर्ग अपनी संतानों को विदेश में पढ़ाता है. भारत में तो पहले से ही, पूंजीपति या भ्रष्ट तबका अपनी दौलत विदेशी बैंकों में रखता है. चीन के पूंजीपति अब यह काम करना चाहते हैं, पर भारत की अपार संपदा काले धन के रूप में विदेशों में मौजूद है. समय-समय पर इसके प्रमाण भी मिलते रहे हैं, पर कभी प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी. आज भारत का धन बाहर रखने वाला यह वर्ग सबसे ताकतवर और प्रभावशाली है. 1991 के उदारीकरण के बाद चीन की ‘ब्यूटी इकानामी’ (सौंदर्य अर्थशास्त्र) भारत में भी पग-पग पर दिखती है. उदारीकरण के बाद ही भारत में यह धारणा बनी कि देह, भोग के लिए है. चाहे हथियारों की डील का मामला हो या अन्य उच्च स्तर पर होने वाली डील-पार्टियों के प्रसंग हों, औरतों का इस्तेमाल सहज घटना मान ली गयी है.

दिल्ली में बलात्कार की घटनाओं पर छात्रों का अचानक बड़ा और उग्र प्रदर्शन होना या व्यवस्था के खिलाफ उनमें सुलगती आग को भविष्य में बढ़ रही बेरोजगारी से जोड़ कर देखें, तो एक अस्थिर भविष्य की झलक मिलती है. इस तरह असंतोष या बदलाव या परिवर्तन की आग कहीं और सुलग रही है.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा कुछ समय पहले प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है.

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