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सुख-दुख...

राजीव शुक्ला की जय-जय करने पर शंभुनाथ शुक्ला फेसबुक पर घिरे

राजीव ने राजनीति में ही नहीं पत्रकारिता में भी शिखर को छुआ था। पत्रकारिता के संदर्भ में कुछ इतनी रूढिय़ां रही हैं कि विजुअल मीडिया आने के पहले तक तो पत्रकार की चर्चा चलते ही एक ऐसे व्यक्ति का चेहरा उभरता था जो कांधे पर सर्वोदयी झोला लटकाए रहता था और जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई, नेत्र भकुरे तथा चेहरे की मुद्रा कठोर। जो धुआंधार शराब पीता हो और वह भी मुफ्त की। दस साल पहले तक यह आलम था कि अगर किसी पत्रकार ने कार खरीद ली तो बस सारे लोग कहना शुरू कर देते थे कि उसने कमाई कर ली या कोई डील में लंबा हाथ मारा हो।

राजीव ने राजनीति में ही नहीं पत्रकारिता में भी शिखर को छुआ था। पत्रकारिता के संदर्भ में कुछ इतनी रूढिय़ां रही हैं कि विजुअल मीडिया आने के पहले तक तो पत्रकार की चर्चा चलते ही एक ऐसे व्यक्ति का चेहरा उभरता था जो कांधे पर सर्वोदयी झोला लटकाए रहता था और जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई, नेत्र भकुरे तथा चेहरे की मुद्रा कठोर। जो धुआंधार शराब पीता हो और वह भी मुफ्त की। दस साल पहले तक यह आलम था कि अगर किसी पत्रकार ने कार खरीद ली तो बस सारे लोग कहना शुरू कर देते थे कि उसने कमाई कर ली या कोई डील में लंबा हाथ मारा हो।

आजादी के बाद से २००० तक पत्रकार की यही छवि रही। पर कुछ लोगों ने अपनी मेहनत व लगन से पत्रकारिता की इस छवि को तोड़ा और खूब सफल रहे। ऐसे में राजीव शुक्ला का नाम इन सबसे ऊपर है। उन्होंने पत्रकारिता से अपनी सफलता के झंडे गाड़े और इसके बाद वे राजनीति में गए और बुलंदियों तक पहुंचे। राजीव एक बहुत अच्छे पत्रकार रहे हैं। जब वे जागरण में थे तब भी और जब जनसत्ता में थे तब भी। इसके बाद रविवार और आब्जर्बर के संपादक होने तक उनकी रिपोर्ट्स लोकसभा में हंगामा मचाया करती थीं। आजकल की पीढ़ी को शायद नहीं पता हो कि किसान आंदोलन से जुड़ी उनकी कुछ रिपोर्ट्स ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के तमाम पुराने ताल्लुकेदारों और राजा रजवाड़ों की पोल खोल कर रख दी थी। राजनीति में जाने के बाद भी राजीव शुक्ला ने पत्रकारिता नहीं छोड़ी। वे आज भी लिखते हैं और बहुत अच्छा लिखते हैं। लेकिन चूंकि आज वे राजनीति के शिखर पर हैं इसलिए उनके आलोचक फौरन उनको बतौर पत्रकार देखने की कोशिश नहीं करते। जबकि वे जितने सफल राजनेता हैं उतने ही सफल और मेहनती पत्रकार भी।
 
    Naveen Nigam  like
   
    Kr Ashok S Rajput  God bless Rajeev Shukla
    
    Saroj Kumar Tewari  As far as I know Rajeev ji and Anuradha ji are Very nice as a person also.They have a kind and considerate temperament devoid of any pride…
 
    Ramesh Kumar Singh  Informative story about Sri Rajeev Shukla , however beyond Hindi journalism he was known as a great loyalist of a particular political family.
   
    Astrologer Viveka Nand Tewari unlike

    Mangaldas Yadav Rajeev is not only a great Poletician a great jounolist too.

    Deepu Nasir कांग्रेस ने उन्हें अपना प्रवक्ता क्यों नहीं बनाया जबकि पत्रकार होने के नाते उनकी तर्कशक्ति जबरदस्त है. कांग्रेस के कई प्रवक्ता तो उनके सामने बच्चे नज़र आते हैं.

    Shambhunath Shukla मैं अपने अनुभव लिख रहा हूं। इससे किसी को सहमति असहमति हो सकती है लेकिन कुतर्क न करें।See Translation
    
    Rajendra Rao राजीव जब पत्रकार थे तब बेहतरीन पत्रकार थे,हमेशा तेज तर्रार रिपोर्टिंग की।
   
    शिवानन्द द्विवेदी सहर एक व्यक्ति जीवन में कोई गुनाह नहीं किया मगर अंत में एक गुनाह कर दिया , उसे क्या कहेंगे ? गुनाहगार या बेगुनाह ?See Translation
 
    Janardan Singh chuninda patrkar hi patrakaro ke bare me galat dharna ko galt sabit kar nai misal gadhte hain
    
    Shambhunath Shukla कम पत्रकार होंगे जिन्हें राजीव की तरह राजनीतिक पत्रकारिता में महारत हासिल रही हो। हम दोनों साथ-साथ दिल्ली आए या कहना चाहिए कि राजीव ही मुझे यहां लाए। लेकिन जल्द ही वे यहां की राजनीतिक गलियारों की वे खबरें लाने लगे जो उस समय तक बड़े-बड़े धुरंधर नहीं ला …See More
 
    Sanjay Mishra दिलचस्पी बढ़ी होगी आज के लोगों को… पर पत्रकारों के लिए कांग्रेस में जनार्दन द्विवेदी की बाईट या उनके कहे पर खबर बनाने में न्यूनतम एडिटिंग की जरूरत होती है… द्विवेदी के शब्दों का चयन हिन्दी टीवी मीडिया की स्क्रिप्ट शैली के अनुकूल होती है… इस मामले में राजीव पिछड़ते हैं…
   
    Shambhunath Shukla जर्नादन द्विवेदी दिल्ली में हिंदी के प्रोफेसर रहे हैं इसलिए हिंदी में उनको महारत तो होगी ही। लेकिन राजीव शुक्ला के शब्दों का चयन कैसा है यह मुद्दा नहीं है बल्कि मेरा मानना है कि राजीव ने पत्रकारों की पुरानी छवि को बदला और पत्रकारिता में अपने श्रम व लगन के बूते वे राजनीति कवर करने वाले अच्छे पत्रकार बने तथा बाद में एक सफल राजनेता।
   
    Satish Chander Sharma But opportunist also
   
    Shambhunath Shukla Satish Chander Sharma: जो अवसर को पहचान लेता है वही सफल हो सकता है। जिसने अवसर को नहीं पहचाना वह जहां का तहां पड़ा रहता है। लेकिन सफल होने के बाद भी जिसके अंदर गुरूर नहीं आए उसे अवसरवादी नहीं कहा जा सकता।See Translation

    Vikash Mishra आपकी पोस्ट की चार पंक्तियाँ कानपुर में हमारे बड़े भाई दिलीप भाई जी की पत्रिकारिता का चित्रण है , बाकी राजीव भाई कोSee Translation
   
    Mahesh Tiwari ek patrakar se rajneta tak ka safar ,khak se falak tak bahut lambi udaan hai sirji ,vakey me salute to rajivji for achieving lots of in his life with honesty….?
    
    Shambhunath Shukla जीवन में किसी भी बुलंदी को छूने के लिए जो श्रम करना पड़ता है उसे भी याद कर लेना चाहिए। राजीव आज जिस मुकाम पर हैं उसके लिए उनकी अनथक यात्रा को मैने काफी करीब से देखा है। दिन-रात राजीव को भागते हुए और अनवरत संघर्ष करते हुए देखा है। कानपुर में भी और दिल्ली में भी। एक सफल राजीव के पीछे एक ऐसी संघर्ष भरी गाथा है जिसे भुलाया नहीं जा सकता।
   
    Mahesh Tiwari patrakarita me gadey hue jhando ka hi kamaal hai jo woh aaj rajniti ke shikhar ki aur agrasar hai,salute to his honesty and his hardwork…?
   
    Shambhunath Shukla अपने समकालीन पत्रकारों में मैने राजीव शुक्ला जैसे जीवंत और ऊर्जावान लोगों को कम ही देखा है। साथ ही राजीव की विनम्रता भी बेमिसाल है। हालांकि एक अरसे से मैं उनसे नहीं मिला पर पुराने साथी जो उनके पास आया जाया करते है वे बताते हैं कि राजीव जरा भी नहीं बदले।
   
    Mahesh Tiwari jeevant urjawan aur nispaksh nirbhay pramanik patrakarita ke uttam udaharn shree rajiv shukla ji ?
    
    Sunil Sharma He is a very fine MANAGER too

    Habib Akhtar sahi kaha…ve ek lajwab insan bhi hain….puranane doston aur sathiyon ko ve aaj bhi manate hain…
 
    Jagmohan Phutela हद कर दी आप ने!
 
    चन्द्रशेखर करगेती Jagmohan Phutela सर इसे क्या कहेंगे….हमें तो राजीव शुक्ला के इस रूप का तो पता ही नहीं था, हाँ ये जरूर देखा कि वे पत्रकार थे, जो सेटिंग गेंटिंग में माहिर थे…..जिनके पास साम -दंड -भेद सभी सहजता से उपलब्ध थे..See Translation
 
    Jagmohan Phutela चाटुकारिता के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं आप ने, शुक्ला जी. मेरे जैसे सैंकड़ों लोगों के मुंह पे चपत मार के जैसे कह रहे हो आप कि आप का सम्मान हम कर ही क्यों रहे थे? और अगर राजीव जी इतने महान पत्रकार थे तो उन की याद आज क्यों आ रही है आप को, रिटायरमेंट के बाद. तब क्यों नहीं आई जब वे लिखने और आप लिखवा सकने की हालत में थे?
 
    Jagmohan Phutela शुक्ला सर, आप से पूछने को जी चाहता है कि राजीव जी प्रियंका के पीआरओ के रूप में गांधी परिवार के करीब आये थे, कभी उनका भेजा कोई प्रेसनोट देखा या छापा आप ने? और दो कि – राजीव आईपीएल के चेयरमैन, डीएलएफ आईपीएल का स्पांसर और राबर्ट वाड्रा डीएलएफ के ब्याज मुक्त 'क़र्ज़' से डीएलएफ की ही प्रापर्टियां खरीद के आज पांच साल से भी कम समय में पचास लाख की से बढ़ कर अरबपति क्यों हैं? क्या ये भी पत्रकारिता, परिश्रम और पराक्रम है?
   
    Shambhunath Shukla श्री जगमोहन फुटेला जी, आपने लिखा है कि मैने चाटुकारिता के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं। पहले तो आप यह बताइए कि मैने चाटुकारिता कब और किसकी की है? जब नौकरी में रहते हुए नहीं की तो अब चाटुकारिता का मतलब क्या है? मुझे अब नौकरी करनी नहीं है दूसरे अब मेरा किसी से न तो राग-द्वेष है और न ही किसी के प्रति अतिरिक्त सनेह। अब तो मैं वही लिख रहा हूं जीवन के सफर में जिसको जैसा पाया। मैने पहले लिख दिया था कि ये मेरे विचार हैं आपको सहमति या असहमति हो सकती है लेकिन कृपया कुतर्क नहीं करें। यह खुला मंच है आप स्वतंत्र हैं जिसको जी चाहे जो कहें लेकिन मेरे ऊपर टिप्पणी का अधिकार आपको नहीं है।
   
    Jagmohan Phutela ये ठीक है कि आप को अपने विचार रखने का हक़ है. मगर तभी तक जब आप उन्हें अपने तक रखें. आप उन को पब्लिक डोमेन में लायेंगे तो पब्लिक को आप से सहमत, असहमत होने, तर्क करने या पूछने का हक़ है. मेरा केवल ये निवेदन है कि कृपया, मेरे सवालों के जवाब तो दीजिए. ताकि मैं भी आज तक राजीव शुक्ला को भगवान् न मानने के अपराध बोध से मुक्त हो सकूं.
   
    Jagmohan Phutela Zara ye bhi padh leejiyega…. http://www.facebook.com/l.php?u=http%3A%2F%2Fsarokarnama.blogspot.in%2F2012%2F01%2Fblog-post_5171.html&h=pAQFPN_qv
    
    Manoj Upadhyay राजीव शुक्ला जैसे मैनेजर की तारीफ एक अच्छे पत्रकार के रूप में उचित नहीं.
   
    Shambhunath Shukla ठीक है तर्क करिए। हर आदमी को हक है कि किसी चीज के बारे में वह अपना नजरिया रखे। आप को हक है कि आप राजनीति या निजी जीवन में किसी का समर्थन करिए। मैने ऊपर जिन-जिन बातों को लिखा है उन पर अगर आपत्ति हो तो ठीक है बाकी के जीवन में अमुक आदमी ने क्या किया यह उसका अपना चिंतन था। मैने राजीव शुक्ला की पत्रकारीय निष्ठाओं और उनकी तेज तर्रार रिपोर्टिंग का जिक्र किया है और मैं उस पर कायम हूं।
 
    Jagmohan Phutela शुक्ला सर, मैं आज अगर दाउद इब्राहिम, हाफ़िज़ सईद या छोटा राजन का गुणगान करूं. उसे अपनी निजी राय भी बताऊं तो भी क्या आप मेरा सम्मान करेंगे? क्या इस का कोई महत्त्व नहीं है कि किस के बार में मेरी सोच और राय कैसी है? और कि मैं लोगों को भी वो मनवाने का प्रयास क्यों कर रहा हूँ?
 
    Jagmohan Phutela Mere aur aap ke mitra Dayanand Pandey ne ye likha kabhi un ke baare mei…ye bhi padhiye…शुरू शुरू में तो सब कुछ ठीक रहा पर जल्दी ही इलाहाबाद की राजनीति में अमिताभ बच्चन और विश्वनाथ प्रताप सिंह आमने-सामने हो गए. बाद में बोफ़ोर्स भी आ गया. लपेटे में अमिताभ बच्चन भी आ चले. सांसद पद से उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया और राजनीति को प्रणाम किया. इसी बीच एक और घटना घटी. इधर उत्तर प्रदेश में मुलायम भी विश्वनाथ प्रताप सिंह से किसी बात पर खफ़ा हुए. और उनके डहि्या ट्र्स्ट में घपले की खबर लेकर दिल्ली के अखबारों में घूमने लगे. किसी ने भाव नहीं दिया तो उन्होंने लगभग साइक्लोस्टाईल करवा कर इसे सभी अखबारों और राजनीतिक गलियारों में भी बंटवा दिया. तब भी किसी ने इसे बहुत तरजीह नहीं दिया. पर अचानक रविवार के एक अंक में राजीव शुक्ला के नाम से डहि्या ट्र्स्ट पर कवर स्टोरी छपी मिली. लोग हैरान थे. कि यह राजीव शुक्ला तो विश्वनाथ प्रताप सिंह का बड़ा सगा, बड़ा खास था. फिर भी एक साइक्लोस्टाइल बंटे कागज को कवर स्टोरी लिख दिया?

बहरहाल, राजीव शुक्ला की 'सफलता' में रविवार की यह डहि्या ट्र्स्ट की कवर स्टोरी मील का पत्थर साबित हुई. नतीज़ा यह हुआ कि अमिताभ बच्चन को राजीव शुक्ला बड़े काम की चीज़ लगे. और अपने पास बुलवाया. जल्दी ही राजीव शुक्ला को उन्होंने राजीव गांधी से भी मिलवा दिया. कहते हैं कि राजीव गांधी ने ही अपनी मित्र अनुराधा प्रसाद से राजीव शुक्ला को मिलवाया. बाद में शादी भी करवा दी. इसके बाद राजीव शुक्ला ने जो उड़ान भरी वह लगातार जारी है. उन्हीं दिनों राजीव गांधी एक बार कानपुर आए तो खुली जीप में उन के साथ एक तरफ अनुराधा प्रसाद खडी थीं हाथ जोड़े तो दूसरी तरफ राजीव शुक्ला. बाकी नेता आगे-पीछे.
 
    Shambhunath Shukla ये सब मिथ हैं और सुनी सुनाई व गढ़ी गढ़ाई बातें हैं। दूसरे मैने पहले ही कहा था कि कृपया कुतर्क नहीं करें। दाउद और हाफिज सईद जैसे लोग देश के दुश्मन हैं और राजीव शुक्ला हमारे लोकतांत्रिक प्रतिनिधि।
    
    Shambhunath Shukla राजीव शुक्ला ने राजा डैया चैरिटेबल ट्रस्ट के बारे में जो कुछ लिखा था वह सब मुलायम ङ्क्षसह ने विधानसभा में उठाया था।
   
    Jagmohan Phutela लोकतांत्रिक प्रतिनिधि?….अगर संसद या विधानसभा में चुन के आ जाने से सब के सब गुनाह माफ़ हो जाते हैं तो फिर अतिंदर पाल सिंह के भी हो जाने चाहिए थे, पप्पू यादव के भी और सज्जन कुमार के भी हो ही जाने चाहिए. नहीं?

    Shambhunath Shukla सज्जन कुमार या पप्पू यादव से राजीव शुक्ला की तुलना नहीं की जा सकती। सज्जन कुमार और पप्पू यादव ने अपने राजनैतिक कैरियर की शुरुआत बाहुबल से की थी उसकी सजा उन्हें मिलनी ही चाहिए। राजीव ने न तो पत्रकारिता की शुरुआत किसी छल छद्म से की न ही राजनीति की। दयानंद पांडेय ने लिखा ही है कि राजीव जनसत्ता में टेस्ट व इंटरव्यू पास कर के ही आए थे। यानी राजीव शुक्ला बतौर पत्रकार योग्य थे। और अपनी पत्रकारीय पारी उन्होंने बेहतर खेली। आज भी वे लिखते हैं और अच्छा लिखते हैं।
   
    Shambhunath Shukla राजीव शुक्ला का एक बड़ा ही पसंदीदा जुमला रहा है- पिन्नी किन पकवानन मां। राजीव अब राजनीति में है तो कोई भी उन पर अंगुली उठाने लगा है वर्ना बड़े-बड़े दिग्गज पत्रकार उनकी कृपा से ही शिखर पर पहुंचे। किसी की अच्छाई न स्वीकार करने की हमारी परंपरा भला कैसे मानेगी कि राजनीति की बुलंदियों पर पहुंचा एक शख्स कभी हमारे जैसा था पर अपनी मेहनत व लगन के बूते उसने शिखर को छुआ। और जरा ऐसे पत्रकारों को बताया जाए जिनने रत्ती भर भी अतिरिक्त पाने के लिए अपनी ईमानदारी और निष्ठा को गिरवी नहीं रखा हो।
   
    Jagmohan Phutela सर, आप के जीवन के सफ़र के ज़िकर में भी कोई ऐसा आदमी वर्णन के योग्य कैसे हो जाता है जो पत्रकारिता को लगातार कलंकित करता आया है. उसे जो मिला है वो अगर पत्रकारिता का प्रसाद या परिश्रम का परिणाम है तो फिर वो प्रभाष जोशी को मिलना चाहिए था, कमलेश्वर, अज्ञेय या मंगलेश डबराल को. मैं केवल और केवल आप को ये समझाने का प्रयास कर रहा हूँ कि एक पत्रकार या लेखक के रूप में आप के शब्दों ही नहीं, आप के विचारों और छवि का भी एक बड़ा महत्त्व होता है और आज राजीव के कसीदे पढ़ के आप ने उन लोगों को बहुत निराश किया है जो आप में कुछ अच्छा होने के लिए देखते थे. ये कुछ यूं है कि जिसे आप सचिन तेंदुलकर को किसी ढाबे के बाहर ठर्रा पीते देख लें या लता मंगेशकर को अपनी नौकरानी को पीटते हुए. लोग कुछ लोगों से कुछ चीज़ों की उम्मीद नहीं किया करते. आप से भी ऐसी उम्मीद कभी नहीं थी.
    6
    Saurabh Misra बहुत महीन गोट , ब्राह्मण विरोध लेकिन बी. एस . पी. का समर्थन , पत्रकार से नेता का महिमा मंडान ………. दिल का पेंडुलम हिलोरे मार रहा है …
 
    Amrish Trivedi good inspiration

    Jagmohan Phutela सर, आपने लिखा ….सज्जन कुमार और पप्पू यादव ने अपने राजनैतिक कैरियर की शुरुआत बाहुबल से की थी उसकी सजा उन्हें मिलनी ही चाहिए। …. लेकिन राजीव शुक्ला राजनीति में क्या लोकसभा का चुनाव लड़ के आये थे? या किसी क्षेत्र में ऐसा कोई चमत्कार कर के कि उन्हें राज्यसभा में लाना देश का सौभाग्य समझ लिया गया था….आप को नहीं पता राज्यसभा में वे किस पार्टी के कोटे से और कैसे आये थे? लेकिन मूल सवाल तो ये है कि क्या लोकतांत्रिक प्रतिनिधि हो जाने सारे गुनाह माफ़ हो जाते हैं? आप ने मेरे डीएलएफ आईपीएल वाड्रा वाले सवाल का जवाब भी अभी तक नहीं दिया.
    
    Shambhunath Shukla वैसे मुझे अपनी किसी महानता या बड़प्पन का भ्रम नहीं है। संपादक कब कैसे समझौते करता है यह अब कोई ढकी छुपी बात नहीं है। एक अदना सा एडवरटीजमेंट मैनेजर उसको पेड न्यूज छापने के लिए कहता है और संपादक सारे लाव लश्कर के साथ उम्मीदवारों से सीधे फोन कर पैसे मांगने लगता है। सिंगल के इतने डबल के इतने और पहले पेज के लिए इतना तो देना ही होगा। यह हरकत कोई छोटे मोटे अखबार नहीं दिल्ली के वे अखबार भी करते हैं जिनसे पाठक को लगता है कि वह तो सच कहेगा ही। हम सिर्फ सुनते आए हैं और सम्मोहित होकर उन संपादकों को महान बताते आए हैं जिनकी इंसानियत और हैवानियत में बस इतना ही फर्क था कि बंधी मुठ्ठी लाख की खुल गई तो खाक की।

    Jagmohan Phutela अब आप राजीव शुक्ला से हट कर पेड न्यूज़ पे चले आए हैं. कृपा कर के पहले राजीव शुक्ला के महिमामंडन के कारण बताएं.
    
    Shambhunath Shukla राजीव संसद में राज्यसभा के जरिए आए लेकिन उसके लिए भी एक चुनाव होता है। हमें लोकतंत्र में राजनीतिकों को यह छूट देनी चाहिए कि देश वही चलाएं। और बात सिर्फ राजीव के पत्रकारीय योगदान की हो रही थी।
   
    Jagmohan Phutela अब आप राजीव शुक्ला से हट कर पेड न्यूज़ पे चले आए हैं. कृपा कर के पहले राजीव शुक्ला के महिमामंडन के कारण बताएं.लोकसभा चैनल में कुछ पद खली हैं. सरकार का चुनाव से पहले 24 घंटे का एक खबरिया रेडियो स्टेशन भी और आने वाला है. लेकिन इस के बावजूद आप को भी ''रत्ती भर भी अतिरिक्त पाने के लिए अपनी ईमानदारी और निष्ठा को गिरवी'' रखने के बावजूद नौकरी नहीं मिलेगी, देख लेना.
    
    Shambhunath Shukla री जगमोहन फुटेला जी,
मैने पहले ही कह दिया था कि मैने नौकरी बहुत कर ली अब न तो मुझे नौकरी करनी है और न ही अपना समय बरबाद करते हुए किसी चैनल में बतौर विशेषज्ञ बुत होकर बैठना है। इसिलए ये सारी बातें आपकी अपनी कल्पना की उपज हैं। राजीव के साथ मैने काम किया है और बतौर पत्रकार तथा बतौर इंसान मैं राजीव की इज्जत करता रहा हूं इसलिए ऐसे सवाल उठाना बेमानी हैं। आप अपनी असहमति जताने के लिए स्वतंत्र हैं। पर कृपया ऐसी बातें न करें जो सहज ईष्र्यावश कही गई हों।
    
    Jagmohan Phutela सर, एक सज्जन हैं केडी सिंह. बताएँगे कि वे किस चुनाव से राज्यसभा में आए. ये चुनाव इतना ही लोकसमर्पित होता है तो कैसे मूल रूप से पंजाब के केडी सिंह पहले तो झारखंड से राज्यसभा से चुने गए और कैसे फिर अपना वो कार्यकाल पूरा होने से भी पहले बंगाल से. अब वे हरियाणा में मुख्यमंत्री होने को फिरते हैं. ये करने पाने के लिए उन का एक चैनल है. सुना है, उन्हें ऐसे पत्रकारों की ज़रूरत भी है जो हर तरह की मक्कारी को अपनी कलम से कलाकारी साबित कर सकते हों.
 
    Shambhunath Shukla ऐसे तो अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी असम से संसद में पहुंचते रहे हैं। इसलिए इस पर बहस करने का कोई मतलब नहीं है। दूसरे मेरा मानना है कि जीवन में जो कुछ मुझे सही लगा उसे मैने साझा किया। हां नौकरी करने या कहीं फिट होने के चक्कर में मैने आज तक किसी की भी चापलूसी नहीं की। केडी ङ्क्षसह के चैनलों के लिए पंजाब में ही पत्रकारों की कमी नहीं होगी। आप मेरी फिक्र नहीं करिए। अब न तो मैं नौकरी करूंगा और न ही किसी की औकात है मुझे नौकरी देने की।
    
    Jagmohan Phutela मैंने आप के समक्ष कुछ कुछ जिज्ञासाएं रखीं मान्यवर. एक कि राजीव जी, आईपीएल, डीएलएफ और वाड्रा में क्या पत्रकारिता कोण है. दो- कि क्या कोई अपने प्रशंसकों (या पाठकों) के प्रति अपनी निजी सोच के लिए भी जिम्मेवार नहीं है और तीन- कि आज नौकरी से रिटायर हो जाने के बाद आप को ये अचानक राजीव शुक्ला के गुणगान की क्या सूझी है? राजीव शुक्ला को महान, भगवान् साबित करने की धुन में आप ने मेरी तीनों ही जिज्ञासाओं का निदान,समाधान नहीं दिया.
    
    Shambhunath Shukla डीएलएफ व वाड्रा राजनीति की उपज हैं। विरोधी दलों को मुद्दा चाहिए और उन्होंने वाड्रा विवाद खड़ा किया। हालांकि यही लोग रंजन भट्टाचार्य के समय मुंह सिए रहते थे। दूसरे, किसी के बारे में अपनी राय रखना एक लोकतांत्रिक सोच व पद्धति है आप असहमत हैं तो दर्ज कराइए। तीसरे, रिटायर होने के बाद इसलिए कि रिटायर होने के बाद आदमी दुनिया को एक निष्पक्ष नजर से देखता है जिसमें न राग-द्वेष होता है न ही कोई अतिरिक्त मोह भाव।
 
    Jagmohan Phutela अच्छा? तो राजीव-आईपीएल-डीएलएफ और वाड्रा प्रकरण जांच के लायक भ्रष्टाचार का कोई कांड नहीं राजनीति है तो फिर जांच का आदेश देने आईएएस अफसर अशोक खेमका के चार महीने में तीन तबादले आप की नज़र में सज़ा नहीं, प्रभु का प्रसाद होंगे. नहीं?
 
    Shridhar Dwivedi par guru ji patrkar ki sambedna unke bhitar se mar gyi hea ab we khajur ke ped ke saman hi hean mea bhi janta hun.
   
    Astrologer Viveka Nand Tewari rajeev sukla se jada ham apko pasand karte he .kahe makhamal me tat ka paiband laga rahe ho .wo ek acche business man he .
   
    Jagmohan Phutela आप अगर इतने साल पत्रकारिता में ऐसे ही संस्कार, विचार ले के चलते रहे तो अब रिटायरमेंट के बाद सुधर के करोगे भी क्या. ये प्रशंसा है, चाटुकारिता, स्तुतिगान या उम्र के इस पड़ाव पे कुछ पाने की कोई कोशिश आप जानें. लेकिन मैं अब इस बहस के (अपनी ओर से) अंत में, इतना बता दूं आप को कि राजीव शुक्ला ने मेरे साथ भी काम किया है. मेरे भी कुछ अनुभव हैं उन के बारे में. मैंने लिखा भी उन के बारे में. उन का सब से बड़ा गुण (या दोष) ये है कि वे कभी किसी के सगे नहीं रहे हैं. अपने फायदे के लिए जिस किसी की भी पीठ में छुरा घोंपने की ज़रूरत उन्हें महसूस हुई है तो उन्होंने मारा है. मुझे उन का स्वाभाव, उन का व्यक्तित्व और उन की इंसानियत इस लिए भी अच्छी नहीं लगती कि जिस राजीव गांधी ने उन्हें फर्श से अर्श पे बिठाया उसकी मौत के बाद अखबारों में ''सोनिया अपने बच्चों को ले कर इटली भाग जाएगी'' वाली खबर यही राजीव शुक्ला प्लांट करते फिरते थे.
निदा फाजली साहब का ये शे'र उन पे बहुत फिट बैठता है कि
'ये सिखाया है दोस्ती ने हमें, दोस्त बन कर कभी वफ़ा न करो.'
   
    Shambhunath Shukla आप अपने अनुभव बताने के लिए स्वतंत्र हैं। मैने अपने अनुभव लिखे हैं। मुझे उन पर आपकी मुहर नहीं चाहिए। दूसरे अगर मैं बिगड़ैल था तो आपको पहले ही पता होना चाहिए था। मुझे इसके लिए भी आपके प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है। तीसरे पत्रकार अपनी किसी नौकरी से रिटायर हो सकता है लेकिन लिखता तो वह जिंदगी भर ही है। इसिलए मैं तो वही लिखूंगा जो मुझे पसंद आया दूसरे किसी की मुंहजोई करने से मुझे क्या फर्क पड़ता है।
    
    Shridhar Dwivedi jagmohan phutela ji chuki yah post fb par hea isliye mea bhi likh diya barna mera koi matlab nhi. chamchagiri chatukarita ke bina rajniti nhi chamkti.
   
    Ramniwas Chaturvedi राजीव शुक्लाजी अच्छे पत्रकार न होते तो राजनीति में दखल कैसे देते.हाँ अब जरा सरकारी पक्ष को सभालना पड़ता है.जो कभी कभी जनमानस के गले नहीं उतरता.क्रिकेट को भी सभाल रहे हैं.आलोचनाएँ,समीक्षाएं जब प्रहार कराती है और सत्य के निकट होती हैं तो जनप्रिय होती हैं और ऊँचाई प्राप्त होती है .जब बचाव,मरहम पट्टी करनी पड़ती है तो कठिनाई तो आती है लोकप्रियता भी प्रभावित होती है.

    Virendra Rishi great efforts

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के एफबी वॉल से साभार.

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