Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

पांचवां बर्थडे : क्या होता अगर जो भड़ास नहीं होता?

भड़ास के पांचवें जन्मदिन का न्यौता मिलने के बाद से ही दिमाग में यह वैचारिक मंथन जारी है कि अगर भड़ास नहीं होता तो आज हिन्दुस्तान खासकर हिन्दी पत्रकारिता के हालात क्या होते? विकल्प विहीन शहरों के पत्रकारों को हमेशा यही लगता था कि जो हालात उसके शहर की पत्रकारिता के हैं, वैसे शायद और किसी शहर के नहीं है? पत्रकारों के साथ जो शोषण और अन्याय होता है, वह और किसी अखबार और शहर में नहीं होता है? जिन पत्रकारों को एक से दूसरे अखबारों में जाने का मौका आसानी से उपलब्ध है उनको छोड़ दीजिए तो बाकी को शायद ही अहसास रहा होगा कि भारतीय पत्रकारिता के कुएं में भांग घुली होने की कहावत पुरानी हो चुकी है और अब तो भांग की बारिश हो रही है।

भड़ास के पांचवें जन्मदिन का न्यौता मिलने के बाद से ही दिमाग में यह वैचारिक मंथन जारी है कि अगर भड़ास नहीं होता तो आज हिन्दुस्तान खासकर हिन्दी पत्रकारिता के हालात क्या होते? विकल्प विहीन शहरों के पत्रकारों को हमेशा यही लगता था कि जो हालात उसके शहर की पत्रकारिता के हैं, वैसे शायद और किसी शहर के नहीं है? पत्रकारों के साथ जो शोषण और अन्याय होता है, वह और किसी अखबार और शहर में नहीं होता है? जिन पत्रकारों को एक से दूसरे अखबारों में जाने का मौका आसानी से उपलब्ध है उनको छोड़ दीजिए तो बाकी को शायद ही अहसास रहा होगा कि भारतीय पत्रकारिता के कुएं में भांग घुली होने की कहावत पुरानी हो चुकी है और अब तो भांग की बारिश हो रही है।

एक बड़ा संकट यह भी था कि दूसरों के अन्याय, अत्याचार, आर्थिक शोषण, श्रम कानूनों की अवहेलना की खबरें छापने वाले पत्रकार अपने साथ बीत रहे इनसे भी बदतर हालात कहां बयां करें? कौन है, सुनने वाला। अदालत जा नहीं सकते, क्योंकि सबूत और गवाहियों के साथ पैसे का भी टोटा रहता है। लड़ाई कानूनी हो या और किसी तरह की, लड़ें तो कैसे लड़े? मामूली तनख्वाह के साथ हजारों किलोमीटर दूर तबादला, या फिर नई नौकरी की तलाश, पत्नी, बच्चों के अरमान, मां-बाप, बहन की जिम्मेदारी, उपर से यह नसीहत और तोहमत कि बाकी भी तो नौकरी कर रहे हैं, गलती तेरी ही होगी? कहीं सेठजी या लालाजी या उनका कोई आदमी देख ना ले, इस डर से संगी साथी भी साथ छोड़ देते हैं? एक बार को मुकदमा कर जीत लो तो दूसरा संस्थान लेने को तैयार नहीं। आदतन मुकदमेबाज की डिग्री जो मिल चुकी होती है। महिला पत्रकारों के हालात भी कहां पता चल पाते। संपादक से लेकर संगी साथी तक लार टपकाए रहते हैं।

कोई भी अखबार दूसरे अखबार का नाम या उसकी कमी तभी छापता हैं जब पाठक संख्या ज्यादा होने या खुद के नंबर वन होने की खबर हो। वरना तो प्रतिद्वन्द्वी अखबार का पत्रकार भले ही भूख से मर जाए, उसके लिए खबर नहीं है। कैसी विडम्बना है कोई भिखारी भूख से मर जाए तो खबर है परंतु पत्रकार का भूखा मरना अखबारों के लिए खबर नहीं है। फिर अखबारों का रुतबा भी ऐसा कि डॉक्टर भूख की जगह बीमारी से मरने का फर्जी मेडिकल बना दे और उसे आधार मानकर पुलिस अपनी कार्रवाई को विराम लगा दे। अखबारों से संपादक नाम की संस्था खत्म हो गई है। एक अभियान की तरह सभी अखबारों में एक साथ ऐसा हुआ। ऐसी खबरों से पत्रकार ही महरूम हो चले थे। दूर के ढोल सुहावने की तरह भास्कर के पत्रकार को लगता था राजस्थान पत्रिका ज्यादा अच्छा है, राजस्थान पत्रिका के पत्रकार को लगता था जागरण इससे सही हैं और जागरण वाला सोचता था अमर उजाला इससे बेहतर है और अमर उजाला वाला सोचता नई दुनिया……!

अखबारों के अंदरूनी हालात जैसे रोचक विषय पर कोई शोध करता तो ना कोई मुंह खोलने वाला था, ना शोध के लिए सामग्री उपलब्ध करवाने वाला। किसी तरह शोध हो भी जाती तो कोई चार लाइन की खबर भी नहीं छापता। सोचिए दोस्तों अगर भड़ास नहीं होता तो क्या होता? कितनी कैसी जानकारियां, अन्याय गाथाएं, चालें-कुचालें सामने नहीं आ पाती और अपने ही क्षेत्र के ज्ञानार्जन के अभाव में पत्रकार मूर्ख साबित हो रहे होते। क्या भड़ास का अहसानमंद नहीं होना चाहिए हम सबको! बदले में हमने भड़ास को दिया क्या है? भड़ास के पांचवें जन्मदिन पर हम निष्पक्ष सिंहावलोकन और आत्मचिंतन कर सकें और फिर भड़ास के दीर्घायु होने का संकल्प ले सकें तो मानिए हमारी जन्मदिन की बधाई या शुभकामनाएं तहे दिल, ईमानदारी से दी गई हैं और सच्ची है।

यशवंत जी के बारे में

भाई यशवंत जी के बारे में क्या कहा जाए। जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ। कहावत हैं मुसीबत आने पर साया भी साथ छोड़ जाता हैं। साथ खड़ा होना तो दूर, मौन सहमति देने वाले नहीं मिलते। ऐसे में किसी का साथ जुबान से नहीं कलम से देने का साहस कितनों में है। लोग सच बोलने वाले को फटे में टांग अड़ाने वाला कहते हैं। उम्मीद करते हैं कि बीच में ना बोले अपने काम से काम रखे। अरबपति, रसूखदार और माफिया अखबार मालिकों का सामना करने की हिम्मत सिर्फ यशवंत में है तो इसलिए क्योंकि वह यशवंत है। बड़ा होना बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है अच्छा होना। चाहते तो या आज भी चाहें तो यशवंत बड़ा पत्रकार यानि अरबपति, किसी अखबार समूह के मालिक बन सकते हैं परंतु उन्होंने बड़े की जगह अच्छा पत्रकार बनने का मार्ग चुना। कबीर, रैदास, बाबा फरीद, बुल्ले शाह, मिर्जा गालिब और दुष्यंत कुमार जैसी हस्तियों का अस्तित्व आज भी दुनिया में हैं तो इसलिए क्योंकि उन्होंने जो कहा खरा कहा और सच कहा। ना-ना मैं भाई यशवंत को इन हस्तियों के बराबर नहीं रख रहा परंतु यह कामना जरूर कर रहा हूं कि यशवंत इनके बराबर बहुत

राजेंद्र हाड़ा

शीघ्र पहुंचे।  

अजमेर से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. राजेंद्र जी से संपर्क  09549155160 या 09829270160 या [email protected] के जरिए कर सकते हैं. राजेंद्र हाड़ा करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं.


tag- b4m 5thbday

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...